Wednesday, July 24, 2024

जाने क्यों 90% लकवाग्रस्त व्यक्ति की रिहाई की अर्जी को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘शरीर नहीं, दिमाग ही सब कुछ है’!

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AIN NEWS 1: वो 55 साल का है। 8 साल से जेल में है। शरीर का 90 फीसदी हिस्सा काम नहीं करता है। व्हीलचेयर पर चलता है। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व प्रोफेसर है। लेकिन इसके बावजूद उसे हाईकोर्ट से मिली रिहाई को सुप्रीम कोर्ट ने निलंबित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज करते हए कहा है कि आतंकी या नक्सली गतिविधियों में शामिल होने के लिए शरीर की नहीं, बस दिमाग की जरूरत होती है जो सबसे खतरनाक बात है। आतंकवादियों या नक्सलियों के लिए दिमाग ही सब कुछ है। उच्चतम न्यायलय ने यह कहते हुए माओवादियों से रिश्तों के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और बाकियों को बरी करने के बॉम्बे उच्च न्यायलय के आदेश को सस्पेंड कर दिया।

 

जानिए किस संदर्भ में की ‘शरीर नहीं, दिमाग ही सब कुछ है’ की टिप्पणी

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने यह भी कहा कि इस टिप्पणी का इस मामले से संबंध नहीं है, ऐसा आमतौर पर देखा गया है। इससे पहले, साईबाबा के वकील आर बसंत ने दलील दी थी कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साईबाबा बीते 8 साल से जेल में बंद हैं। उनकी उम्र 55 साल है। इसलिए उन्हें अब जेल से रिहा किया जाए। उन्हें घर में नजरबंद किया जाए और वह कोर्ट की हर शर्त को मानेंगे। वहीं महाराष्ट्र सरकार की
तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अर्बन नक्सल को नजरबंद किए जाने का चलन बढ़ा है, लेकिन घर के अंदर से सब कुछ किया जा सकता है, यहां तक कि फोन से भी सब मुमकिन है। किसी को नजरबंदा करना कभी विकल्प नहीं हो सकता। दोनों पक्षों को सुनने के बाद बेंच ने नजरबंदा की गुजारिश को खारिज कर दिया।

जमानत अर्जी दाखिल कर सकते हैं साईबाबा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सभी दोषी अब जेल में ही कैद रहेंगे। बेंच ने कहा कि वह केवल हाईकोर्ट के फैसले और आदेश को निलंबित कर रही है लेकिन आरोपी जमानत अर्जी दाखिल कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर साईबाबा और दूसरे दोषियों से 8 दिसंबर तक जवाब देने को कहा है। बेंच ने कहा, कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध काफी गंभीर किस्म के हैं। ये समाज के साथ ही देश की अखंडता और संप्रभुता के भी खिलाफ हैं। आरोपियों को सबूतों की विस्तृत समीक्षा के बाद दोषी सिद्ध किया
गया था। हाईकोर्ट ने इसकी योग्यता पर विचार नहीं किया।

2013 में घर पर छापा पड़ा था

2013 में गढ़चिरौली और दिल्ली पुलिस ने माओवादियों से संबंध के आरोप में साईबाबा के घर पर छापा मारा था। इसके बाद अगले साल 2014 में महाराष्ट्र पुलिस ने साईबाबा को दिल्ली स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया था। DU के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा और बाकियों को बरी करने के बॉम्बे उच्च न्यायलय के आदेश मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस एमआर शाह ने कहा, हम मामले के गुण-दोष में नहीं जाने और (मंजूरी के
आधार पर) फैसले लेने के लिए एक शॉर्टकट खोजने की वजह से हाईकोर्ट के आदेश में गलती ढूंढ रहे हैं। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 386 के मुताबिक अपीलीय अदालत निचली अदालत के निष्कर्षों को पलटने के बाद ही बरी कर सकती है। हमारा मानना है कि यह धारा 390 सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) के तहत शक्ति के इस्तेमाल के लिए एक उपयुक्त मामला है और हाईकोर्ट के आदेश को निलंबित करने की
जरुरत है। हाईकोर्ट ने उन्हें सिर्फ इस आधार पर आरोपमुक्त किया कि मंजूरी अमान्य थी और कुछ सामग्री उपयुक्त प्राधिकारी के सामने उसी दिन मंजूर की गई थी।

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AIN NEWS 1https://ainnews1.com
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
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