मौत आने से पहले क्यों घर ‘खाली’ कर रहे हैं बुजुर्ग? क्या संभव है कि मौत के बाद की तैयारी जीवित रहते कर ली जाए!

वैसे तो हर कोई अपने तरीके से जिंदगी जीता है। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने बाद बच्चों की भी चिंता सताती है और इसलिए वो रकम या संपत्ति जोड़कर रखते हैं।

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बुजुर्ग अपना रहे हैं डेथ क्लीनिंग पद्धति

60-70 की आयु के बाद सामान हटाते हैं बुजुर्ग

मौत के बाद घरवालों को दिक्कत से बचाने की कोशिश

AIN NEWS 1: वैसे तो हर कोई अपने तरीके से जिंदगी जीता है। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने बाद बच्चों की भी चिंता सताती है और इसलिए वो रकम या संपत्ति जोड़कर रखते हैं। लेकिन 83 वर्ष की दादी चित्रा विश्वनाथन की सोच सबसे कई कदम आगे है। वो नहीं चाहती हैं कि उनके जाने के बाद उनकी अलमारी को उनके बच्चे खाली करें। वो कहती हैं, ‘मैं तो अपना सब कुछ खाली करके संसार से जाना चाहती हूं।’ हो सकता है ये पढ़ने में थोड़ा आपको अजीब लगे लेकिन चित्रा ने फेसबुक पेज पर बिलकुल यही लिखा है। वो कहना चाहती हैं कि मौत आने से पहले वो अपने हर सामान को बांट देना चाहती हैं। उनके पास जो सामान हैं, अवॉर्ड या संग्रह हैं, वो सब कुछ अपने सामने ही खाली कर देना चाहती हैं। उनका इरादा है कि जिन लोगों को वो ये सब देंगी वो इसका महत्व समझें और बाद में भी उपयोग करें।

बुजुर्गों ने शुरु किया नया चलन 

उन्होंने लिखा, ‘यह पोस्ट खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए है। कृपया इसे गलत या बीमार मानसिकता ना समझें। ये तो तार्किक बात है।’ उन्होंने इसी तरह की स्वीडिश अवधारणा का भी जिक्र किया जिसे ‘dostadning’ कहते हैं। ये दो शब्दों से मिलकर बना है डेथ (do) और क्लीनिंग (stadning) यानी जब कोई व्यक्ति निधन से पहले घर में रखी अपनी चीजों को हटा दे जिससे उसके घरवालों को बाद में इस बड़े काम में हाथ ना लगाना पड़े।

जीवन के अंतिम पड़ाव का ख्याल

मेरी कोंडो को आज के समय में इस प्रक्रिया (Decluttering यानी अनावश्यक चीजों को हटाने) का मास्टर कहा जाता है। कई बुजुर्गों ने उनकी इस प्रक्रिया को निभाया है। हालांकि डेथ क्लीनिंग का चलन 2017 में एक पुस्तक से आया था। मार्गरेटा मैगनसन ने स्वीडिश डेथ क्लीनिंग नाम से पुस्तक लिखी थी और इसके बाद ये पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। भारत में भी अब बड़ी संख्या में बुजुर्ग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में घर खाली कर देते हैं।

गुलाब की सूखी पंखुड़ी हो या बचपन के कपड़े

जीवनभर लोग तमाम चीजें अपनी अलमारी, बक्से में रखते हैं। पुरानी पुस्तक में गुलाब की सूखी पंखुड़ी हो या बच्चे के पहने पहले कपड़े, ऐसे सामान घर में जमा रहते हैं। क्या किसी ने कभी सोचा है कि उसके जाने के बाद उन सब सामान का क्या होगा? अब 60 साल से ज्यादा आयु के लोग इस पर गंभीरता से विचार करने लगे हैं। चित्रा कहती हैं, ’60 साल के बाद मेरी मां ने नए कपड़े खरीदने बंद कर दिए थे क्योंकि वो कहा करती थीं कि ये दिखाता है कि आप और ज्यादा ज़िंदगी जीना चाहती हैं और उसका उपयोग करना चाहती हैं।’ उन्होंने कहा कि जब मैं 70 वर्ष की हुई तो मैंने हैंडीक्राफ्ट प्रदर्शनी में जाना बंद कर दिया। वहां जाकर मैं साज सज्जा के सामान लेकर आती थी और वो फूड शो में देखने को मिलता था।

पति की मौत के बाद बच्चों के संग रहती हैं दादी

पति की मौत के बाद वो अपने बच्चों के पास रहने लगीं। उन्होंने बच्चों से भी कहा कि वो जो भी चाहें, घर से ले सकते हैं। इसके बाद उन्होंने अपने ग्लासवेयर संग्रह को खाली कर दिया। बहुत कम सामान अपने पास रखा। कई गैजेट और जरूरी सामान परिवारवालों और दोस्तों में बांट दिया। उन्होंने कहा, ‘ये फैसला मुश्किल था लेकिन अपनी पसंदी की चीज देने में भी अलग खुशी मिली।’ इतिहासकार नंदिता कृष्णा के मुताबिक कोरोना के दौरान 70 साल की आयु होने पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कई बदलाव किए हैं। हां, डेथ क्लीनिंग का मतलब ये नहीं है कि हम हर उस सामान से छुटकारा पा लें, जिसे हम पसंद करते हैं।

कैसे होती है डेथ क्लीनिंग?

सबसे पहले तो शुरूआत करने का निर्णय लेना है। ज्यादातर लोग 60 या 70 साल की आयु के बाद ऐसा करते हैं। पहले बड़े सामान से शुरूआत करें जैसे फर्नीचर और फिर फोटो जैसे भावनात्मक सामान को भी शामिल करें। परिवार के लोगों से कहें कि वो जिस सामान को रखना चाहें रख लें। बाकी दोस्तों में बांट दें।

जरूरतमंदों को दान करना है एक विकल्प 

बाकी बची ज़िंदगी के लिए कुछ सामान दान कर सकते हैं। एक नोट भी बना लीजिए कि मौत के बाद कौन से सामान को हटाना है जिससे घरवालों को बाद में उसे फेंकने या दान करने में अपराध बोध ना हो।

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