पत्नी के होते हुए किसी दूसरी महिला के साथ मे रह रहा था शादीशुदा मर्द, HC ने इसे नहीं माना किसी तरह का अपराध; जाने जज ने बताया?

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AIN NEWS 1: राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक बेहद अहम फैसले में कहा है कि किसी भी व्यक्ति का द्विविवाह (दो शादी) का अपराध तब तक किसी जगह दर्ज नहीं हो सकता जब तक दूसरी महिला के साथ रह रहा शादीशुदा मर्द उससे कानूनन दूसरी शादी ना कर ले। जस्टिस कुलदीप माथुर ने यह अपनी टिप्पणी एक उस केस का निपटारा करते हुए की जिसमें एक पहले से शादीशुदा मर्द पर उसकी पत्नी ने ही द्विविवाह के अपराध का गम्भीर आरोप लगाया था क्योंकि वह किसी दूसरी महिला के साथ मे ही रह रहा था।बार एंड बेंच की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान जज ने कहा कि आईपीसी की धारा 494 के तहत कोई सजा योग्य अपराध तब तक नहीं होता है जब तक कि पहली शादी के कायम रहते हुए किसी ने दूसरी शादी ना कर ली जाए। सिर्फ इसलिए कि एक शादीशुदा व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी और के साथ मे रह रहा है, यह द्विविवाह का अपराध नहीं होगा, जब तक कि वह कानूनन दूसरी शादी ना रचा ले। कोर्ट ने इस दौरान कहा, ‘एक पुरुष और महिला पति- पत्नी की तरह रह रहे हैं तो इसे आईपीसी की धारा 494 के तहत सजा योग्य अपराध नहीं माना जाएगा यदि उन्होंने कानूनी रूप से विवाह ना कर लिया हो।’

इस मौजूदा केस में याचिकाकर्ता पर उसकी पत्नी ने ही द्विविवाह, क्रूरता और अन्य कई सारे आरोप लगाए थे। ट्रायल कोर्ट के सामने लंबित आपराधिक मामले को भी चुनौती देते हुए इस शख्स ने हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। इस याचिकाकर्ता के वकील ने अपनी दलील दी कि यह आरोप नहीं लगाया गया है कि इस याचिकाकर्ता ने दूसरी महिला के साथ मे जरूरी धार्मिक रीतियों के साथ मे विवाह कर लिया है। इसमें पत्नी (शिकायतकर्ता) ने भी कहा है कि उनका पति किसी दूसरी महिला से विवाहित तो नहीं है। वकील ने यह भी दलील दी कि इनकी पत्नी ने अपराध के 20 साल बाद यह शिकायत की है।पत्नी के वकील ने इस मामले मे पति के दावे को यह कहकर खारिज किया कि यदि यह मान भी लिया जाए कि उसका पति किसी दूसरी महिला के साथ नाता प्रथा (जब एक महिला पुरुष बिना शादी पति-पत्नी की तरह संबंध में रहते हैं) में रह ही रहा था, तो वह द्विविवाह का का दोषी है। हालांकि, कोर्ट ने इस दौरान कहा कि ऐसा कोई भी सबूत नहीं है जो बताए कि याचिकाकर्ता ने दूसरी महिला के साथ मे किसी भी प्रकार से विवाह किया। कोर्ट ने आगे कहा कि इससे द्विवाविह का अपराध साबित नहीं होता इसलिए ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक केस को पूरी तरह रद्द किया जाता है।

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