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अकोला में ऐतिहासिक शंखनाद: श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर गूंजा रामनाम!

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AIN NEWS 1: अकोला शहर में नए वर्ष के स्वागत से पहले एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर श्रद्धालु के मन को भावविभोर कर दिया। अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ और तिथि के अनुसार 10 लाख 19 हजार 520 पावन सेकंड पूर्ण होने के शुभ अवसर पर अकोला में एक भव्य और अभूतपूर्व धार्मिक आयोजन का आयोजन किया गया। यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि नई पीढ़ी की सहभागिता ने इसे ऐतिहासिक भी बना दिया।

सुबह 9 बजे शुरू हुआ ऐतिहासिक क्षण

कार्यक्रम की शुरुआत आज सुबह ठीक 9 बजे हुई। जैसे ही घड़ी की सुइयों ने निर्धारित समय को छुआ, अकोला शहर के एक प्रमुख स्थान पर 100 से अधिक छात्र-छात्राएं एक साथ शंख लेकर खड़े हो गए। इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वह अकोला के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया था।

करीब 50 मिनट तक चला यह विराट शंखनाद, जिसने पूरे शहर को राममय वातावरण में बदल दिया। चारों दिशाओं में गूंजती शंखध्वनि के साथ “जय श्रीराम” के उद्घोष से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

छात्रों की सहभागिता बनी आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता

इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। आधुनिक दौर में जहां युवा पीढ़ी को अक्सर धर्म और संस्कृति से दूर बताया जाता है, वहीं इस आयोजन ने उस धारणा को पूरी तरह तोड़ दिया।

शंखनाद में शामिल विद्यार्थियों का कहना था कि श्रीराम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के आदर्श हैं। अनुशासन, मर्यादा और कर्तव्य का जो संदेश भगवान राम ने दिया, वह आज के समय में युवाओं के लिए बेहद प्रासंगिक है।

रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा से जुड़ा विशेष संयोग

कार्यक्रम का आयोजन अयोध्या में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर किया गया। आयोजकों के अनुसार, तिथि के अनुसार इस दिन 10,19,520 पावन सेकंड पूरे होना अपने आप में एक विशेष आध्यात्मिक संयोग है।

इसी शुभ गणना को आधार बनाकर इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई, ताकि श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल को सामूहिक रूप से अनुभव कर सकें।

पूरे शहर में दिखा भक्तिमय माहौल

शंखनाद की गूंज सिर्फ आयोजन स्थल तक सीमित नहीं रही। शहर के अलग-अलग इलाकों में लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। कई श्रद्धालुओं ने दीप जलाए, तो कई ने अपने घरों में भजन-कीर्तन शुरू कर दिए।

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स्थानीय नागरिकों का कहना था कि ऐसा लग रहा था मानो पूरा अकोला एक साथ प्रभु श्रीराम के चरणों में नतमस्तक हो गया हो।

धार्मिक आयोजन और नए साल का आध्यात्मिक संदेश

इस आयोजन को नए साल के स्वागत से भी जोड़ा गया। आयोजकों का कहना था कि 2025 को विदाई और आने वाले वर्ष का स्वागत अगर आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ किया जाए, तो समाज में सकारात्मकता और सद्भाव बढ़ता है।

इस शंखनाद के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें आज भी मजबूत हैं और नई पीढ़ी उन्हें आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

आयोजकों और समाजसेवियों की प्रतिक्रिया

कार्यक्रम से जुड़े आयोजकों ने बताया कि इस आयोजन की तैयारी कई दिनों से चल रही थी। छात्रों को शंखनाद का अभ्यास कराया गया, समय-सारणी बनाई गई और पूरे कार्यक्रम को अनुशासन के साथ संपन्न किया गया।

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समाजसेवियों और धार्मिक संगठनों ने भी इस पहल की सराहना की। उनका कहना था कि ऐसे आयोजनों से समाज में एकता और सांस्कृतिक चेतना मजबूत होती है।

अकोला के इतिहास में दर्ज हुआ नया अध्याय

यह पहला मौका था जब अकोला में इतने बड़े स्तर पर सामूहिक शंखनाद का आयोजन किया गया। स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि यह कार्यक्रम आने वाले समय में एक मिसाल बनेगा और भविष्य में और भी बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों का मार्ग प्रशस्त करेगा।

श्रद्धा, संस्कृति और युवाओं का संगम

इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब श्रद्धा, संस्कृति और युवा शक्ति एक साथ आती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। अकोला का यह शंखनाद सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति बन गया।

 

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