AIN NEWS 1 नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब भारत में किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस को यह बताना अनिवार्य होगा कि उसकी गिरफ्तारी क्यों की जा रही है — और यह जानकारी लिखित रूप में दी जानी चाहिए।
पहले तक यह नियम केवल कुछ विशेष कानूनों जैसे यूएपीए (UAPA) या पीएमएलए (PMLA) के मामलों में लागू होता था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे सभी अपराधों पर लागू कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला — नागरिकों के अधिकारों की जीत
यह ऐतिहासिक फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस एगस्टीन जॉर्ज मसीह की दो-न्यायाधीशों वाली पीठ ने सुनाया। यह निर्णय 52 पन्नों के विस्तृत आदेश में जारी किया गया, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित रूप में दी जानी चाहिए।
अगर पुलिस किसी कारण से तुरंत ऐसा नहीं कर पाती, तो मजिस्ट्रेट के सामने पेशी से कम से कम दो घंटे पहले गिरफ्तारी का लिखित कारण देना अनिवार्य होगा।
यदि पुलिस इस नियम का पालन नहीं करती है, तो ऐसी गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी और अभियुक्त को रिहाई का अधिकार होगा।
यह मामला कैसे शुरू हुआ
यह फैसला 2024 के मुंबई बीएमडब्ल्यू हिट एंड रन केस के आरोपी मिहिर राजेश शाह की याचिका से जुड़ा है।
मिहिर ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी, यह कहते हुए कि पुलिस ने उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए थे।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि प्रक्रिया में कुछ त्रुटियां हुई थीं, लेकिन अपराध की गंभीरता को देखते हुए गिरफ्तारी को सही ठहराया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि—
“कानूनी प्रक्रिया का पालन किसी अपराध की गंभीरता से कम महत्वपूर्ण नहीं है।”
अदालत ने कहा कि अगर गिरफ्तारी के समय अभियुक्त को कारण नहीं बताया गया, तो गिरफ्तारी वैध नहीं मानी जा सकती।
गिरफ्तारी के समय लिखित कारण क्यों ज़रूरी है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह मौलिक अधिकार है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी का कारण बताया जाए।
यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय का आधार है।
जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसकी स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
ऐसे में अभियुक्त को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसे क्यों पकड़ा गया।
लिखित कारण मिलने से वह अपने वकील से सलाह ले सकता है, गिरफ्तारी को चुनौती दे सकता है और उचित कानूनी कदम उठा सकता है।
दो घंटे की सीमा का महत्व
अदालत ने गिरफ्तारी के कारण बताने के लिए दो घंटे की समय सीमा तय की है।
इसका उद्देश्य है कि अभियुक्त या उसका वकील पेशी से पहले कानूनी तैयारी कर सके।
अगर गिरफ्तारी का कारण बहुत देर से बताया जाता है, तो अभियुक्त को अपने बचाव का अवसर नहीं मिल पाता।
इसलिए, दो घंटे की यह सीमा व्यवहारिक और न्यायसंगत मानी गई है।
संविधान और पुलिस जांच के बीच संतुलन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह व्यवस्था संविधान के अधिकारों और पुलिस जांच की प्रक्रिया के बीच एक संतुलन बनाएगी।
यानि, पुलिस अपनी जांच कर सकेगी, लेकिन नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए, तो ऐसी गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया जा सकता है और व्यक्ति को तुरंत रिहा किया जा सकता है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में बड़ा कदम
अदालत ने माना कि अब तक गिरफ्तारी के आधार को लिखित रूप में बताने की कोई स्पष्ट बाध्यता नहीं थी, जिससे कई बार मनमानी गिरफ्तारियां होती थीं।
लेकिन अब यह फैसला पुलिस प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगा।
यह नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करेगा और पुलिस को कानून के दायरे में काम करने के लिए बाध्य करेगा।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में कहा —
“गिरफ्तारी का कारण बताना पुलिस की औपचारिकता नहीं, बल्कि अभियुक्त का अधिकार है। यह लोकतांत्रिक समाज की नींव है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नियम तुरंत प्रभाव से लागू किया जाए ताकि भविष्य में सभी गिरफ्तारियों में पारदर्शिता बनी रहे।
फैसले का व्यापक असर
यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि भारत की न्याय प्रणाली में समानता और अधिकारों की भावना को मजबूत करने वाला कदम है।
अब कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी अपराध में शामिल क्यों न हो, अपनी गिरफ्तारी के पीछे का कारण लिखित रूप में जानने का हकदार होगा।
यह व्यवस्था न केवल निर्दोषों की सुरक्षा करेगी, बल्कि पुलिस को भी कानूनी जवाबदेही के प्रति सतर्क रखेगी।
यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था में मील का पत्थर साबित होगा।
अब किसी भी नागरिक की गिरफ्तारी केवल “आदेश पर” नहीं हो सकेगी, बल्कि उसके पीछे का कारण स्पष्ट रूप से लिखा और बताया जाएगा।
यह कदम देश में न्याय, पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता को और मज़बूत करेगा — और यह संदेश देगा कि भारत में कानून से ऊपर कोई नहीं।


















