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आईपीएस लोकेश्वर सिंह दोषी करार: व्यक्ति को ऑफिस में प्रताड़ित करने और फर्जी केस में जेल भेजने का आरोप साबित!

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AIN NEWS 1: उत्तराखंड के चर्चित आईपीएस अधिकारी लोकेश्वर सिंह पर लगे गंभीर आरोपों की जांच अब पूरी हो चुकी है। राज्य पुलिस प्राधिकरण ने अपनी निष्पक्ष जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह ने कार्यालय में बुलाकर एक व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार किया, उसे कपड़े उतरवाकर पीटा और उसके खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कर जेल भिजवाया। प्राधिकरण ने गृह विभाग को उनके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने की संस्तुति भेज दी है।

मामला कैसे शुरू हुआ

यह पूरा मामला पिथौरागढ़ जिले से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2023 में पिथौरागढ़ निवासी लक्ष्मी दत्त जोशी ने राज्य पुलिस प्राधिकरण में एक शिकायत दर्ज करवाई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय के एसपी लोकेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया, जहां पहले तो धमकाया, फिर विरोध करने पर छह पुलिसकर्मियों को बुलाकर उनके कपड़े उतरवा दिए और बेरहमी से पीटा।

जोशी का कहना था कि इस मारपीट में उन्हें गंभीर चोटें आईं। इतना ही नहीं, इससे पहले भी एसपी उन पर दबाव बनाते रहे और एक झूठा मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भिजवा दिया।

प्राधिकरण की जांच और फैसला

लक्ष्मी दत्त की शिकायत पर कई महीनों तक जांच चली। इसमें अधिकारियों ने सभी पक्षों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, शपथ पत्र और अन्य दस्तावेजों को बारीकी से जांचा।

पूर्व एसपी लोकेश्वर सिंह ने अपने शपथ पत्र में सभी आरोपों को पूरी तरह झूठा और निराधार बताया। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता का आपराधिक बैकग्राउंड है और वह उन्हें झूठे मामले में फंसा रहा है।

लेकिन राज्य पुलिस प्राधिकरण को एसपी के बयानों और दस्तावेजों में कई विरोधाभास मिले। जांच टीम ने पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों के कई हिस्से सबूतों से मेल खाते हैं। इसके बाद प्राधिकरण ने फैसला सुनाते हुए लोकेश्वर सिंह को दोषी करार दे दिया।

इस्तीफा और मौजूदा स्थिति

गौर करने वाली बात यह है कि लोकेश्वर सिंह इस साल अक्टूबर में अपनी सेवा से इस्तीफा दे चुके हैं। उनका चयन संयुक्त राष्ट्र (UN) में हो गया था, जिसके बाद उन्होंने उत्तराखंड पुलिस विभाग से विदाई ले ली।

हिमाचल प्रदेश के निवासी लोकेश्वर सिंह लगभग 11 साल तक उत्तराखंड में कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने बागेश्वर, चम्पावत, पिथौरागढ़ और पौड़ी जैसे जिलों में एसपी की जिम्मेदारी निभाई। पौड़ी जिले में तैनाती के दौरान ही उनका चयन संयुक्त राष्ट्र में हो गया था। अब वे अगले पांच साल UN में सेवाएं देंगे।

ईमानदार छवि, लेकिन आरोपों ने छोड़ दिए सवाल

यह पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह है कि आईपीएस लोकेश्वर सिंह अपनी ईमानदार छवि के लिए जाने जाते रहे हैं। बागेश्वर में एसपी रहते हुए उन्होंने रिश्वत देने आए लोगों को तुरंत गिरफ्तार कर बड़ा संदेश दिया था। अवैध खनन पर उनकी कड़ी कार्रवाई भी चर्चा में रही थी।

स्थानीय लोग अक्सर उन्हें एक कड़े और निष्पक्ष अधिकारी के रूप में देखते थे। लेकिन पिथौरागढ़ की इस घटना ने उनकी छवि पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

कई लोग मानते हैं कि हर बार रिश्वत न लेने वाला अधिकारी जरूरी नहीं कि आरोपों से परे हो। वहीं, कुछ लोग इस फैसले को जल्दबाजी बताते हुए कहते हैं कि उन्हें और मौका मिलना चाहिए था।

आगे क्या होगा?

प्राधिकरण की संस्तुति अब गृह विभाग के पास पहुंच चुकी है। अब विभाग को यह तय करना है कि लोकेश्वर सिंह के खिलाफ किस प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

हालांकि वह अब पुलिस सेवा में नहीं हैं, परंतु विभागीय कार्रवाई का रिकॉर्ड भविष्य में उनके सरकारी दायित्वों पर प्रभाव डाल सकता है।

पुलिस विभाग के कई अधिकारियों का कहना है कि यह मामला पुलिस छवि के लिए एक सीख है—दफ्तर में की गई छोटी-सी गलती भी वर्षों बाद किसी अधिकारी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है।

This article covers the detailed case of IPS Lokeshwar Singh, who has been convicted by the State Police Authority for assault, torture, and framing a man in a fake case. Important keywords include IPS Lokeshwar Singh, police torture case, Uttarakhand IPS convicted, fake case allegations, and Pithoragarh police controversy. The report also highlights his UN selection, professional background, and contradictions found in his sworn statements.

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