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आरएसएस में बड़ा संगठनात्मक बदलाव: अब प्रांत प्रचारकों की जगह होगा एक राज्य प्रचारक, संघ की कार्यप्रणाली में नया मॉडल!

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AIN NEWS 1: देश के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक Rashtriya Swayamsevak Sangh (आरएसएस) अपने संगठनात्मक ढांचे में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। संघ के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, अब तक प्रचलित प्रांत प्रचारक व्यवस्था को बदलकर राज्य प्रचारक प्रणाली लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

इस बदलाव का उद्देश्य संगठन की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना, समन्वय बढ़ाना और तेजी से निर्णय लागू करना बताया जा रहा है। संघ के पास वर्तमान में लगभग 40 लाख से अधिक स्वयंसेवक और 83 हजार से ज्यादा दैनिक शाखाएं हैं, जो देश के लगभग हर राज्य और जिले में सक्रिय हैं। इतने बड़े नेटवर्क को अधिक व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए यह नई व्यवस्था लाई जा सकती है।

संघ के मौजूदा ढांचे में क्या है व्यवस्था

अभी तक आरएसएस का संगठनात्मक ढांचा प्रांतों के आधार पर काम करता है। देश को अलग-अलग प्रांतों में बांटा गया है और हर प्रांत के लिए एक प्रांत प्रचारक नियुक्त होता है।

प्रांत प्रचारक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी उस क्षेत्र में संघ की गतिविधियों को आगे बढ़ाना, शाखाओं का विस्तार करना और स्वयंसेवकों के साथ समन्वय बनाए रखना होती है।

इनके ऊपर क्षेत्र स्तर और राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी होते हैं, जो पूरे संगठन की रणनीति और दिशा तय करते हैं।

लेकिन समय के साथ संघ का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। कई राज्यों में अब शाखाओं की संख्या इतनी बढ़ गई है कि प्रांत आधारित संरचना में समन्वय बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।

क्यों जरूरी महसूस हुआ बदलाव

संघ के भीतर यह महसूस किया जा रहा है कि मौजूदा ढांचा अब उतना प्रभावी नहीं रह गया जितना पहले था। संगठन के तेजी से विस्तार के कारण कई स्तरों पर समन्वय की जरूरत बढ़ गई है।

सूत्रों के मुताबिक, नई व्यवस्था में राज्य स्तर पर एक केंद्रीय जिम्मेदार व्यक्ति यानी राज्य प्रचारक होगा। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी और विभिन्न प्रांतों के बीच बेहतर तालमेल बन सकेगा।

यह बदलाव खासतौर पर उन राज्यों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां संघ की गतिविधियां बहुत अधिक फैल चुकी हैं।

राज्य प्रचारक प्रणाली कैसे काम करेगी

नई योजना के तहत प्रत्येक राज्य में एक राज्य प्रचारक होगा जो पूरे राज्य में संघ की गतिविधियों की निगरानी करेगा।

इसके तहत:

राज्य स्तर पर एक केंद्रीय नेतृत्व रहेगा

शाखाओं और स्थानीय इकाइयों के बीच बेहतर समन्वय होगा

निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज हो सकती है

संगठन के कार्यक्रमों को लागू करना आसान होगा

हालांकि यह भी संभव है कि राज्य प्रचारक के अधीन अलग-अलग क्षेत्रों के लिए सहायक जिम्मेदारियां भी तय की जाएं ताकि स्थानीय स्तर पर काम प्रभावित न हो।

संघ का तेजी से बढ़ता नेटवर्क

आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी और तब से लेकर आज तक यह संगठन लगातार विस्तार करता गया है।

वर्तमान में संघ के पास:

लगभग 40 लाख सक्रिय स्वयंसेवक

83 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं

हजारों सेवा परियोजनाएं

शिक्षा, सामाजिक कार्य और राष्ट्र निर्माण से जुड़े कई संगठन

संघ के साथ जुड़े संगठनों में छात्र, श्रमिक, किसान, महिला और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले कई मंच शामिल हैं।

संघ का दावा है कि उसका मुख्य उद्देश्य समाज में संगठन, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करना है।

नेतृत्व की भूमिका

संघ के सर्वोच्च पद पर सरसंघचालक होते हैं। वर्तमान में यह जिम्मेदारी Mohan Bhagwat निभा रहे हैं।

उनके नेतृत्व में संघ ने पिछले कुछ वर्षों में कई नए प्रयोग किए हैं। इनमें युवाओं को जोड़ने, समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच बढ़ाने और संगठन को आधुनिक जरूरतों के मुताबिक ढालने की कोशिशें शामिल हैं।

संघ के भीतर होने वाला यह संभावित ढांचा परिवर्तन भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

क्या होगा इसका असर

अगर यह बदलाव लागू होता है तो इसका असर संघ की कार्यप्रणाली पर कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है।

1. बेहतर समन्वय

राज्य स्तर पर एक केंद्रीय नेतृत्व होने से अलग-अलग क्षेत्रों के बीच तालमेल मजबूत हो सकता है।

2. तेज निर्णय प्रक्रिया

जब जिम्मेदारी एक व्यक्ति के पास होगी तो फैसले लेने और उन्हें लागू करने में कम समय लग सकता है।

3. विस्तार को मिलेगा बढ़ावा

नई प्रणाली से शाखाओं का विस्तार और नए स्वयंसेवकों को जोड़ने में आसानी हो सकती है।

बहु-स्तरीय व्यवस्था के बजाय राज्य स्तर पर स्पष्ट जिम्मेदारी तय होने से प्रशासनिक ढांचा सरल हो सकता है।

संगठनात्मक बदलाव संघ के लिए नया नहीं

आरएसएस के इतिहास में समय-समय पर संगठनात्मक बदलाव होते रहे हैं।

संघ अपनी कार्यशैली को परिस्थितियों के अनुसार ढालने के लिए जाना जाता है। पिछले वर्षों में भी संघ ने कई क्षेत्रों में नई पहल की है, जैसे:

डिजिटल माध्यमों का उपयोग

युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम

सामाजिक समरसता अभियान

सेवा कार्यों का विस्तार

इसी कड़ी में यह नया ढांचा भी संगठन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।

अंतिम फैसला कब होगा

फिलहाल इस प्रस्ताव पर संघ के भीतर विचार-विमर्श चल रहा है। आमतौर पर ऐसे बड़े फैसले संघ की उच्च स्तरीय बैठकों में व्यापक चर्चा के बाद ही लागू किए जाते हैं।

संभव है कि आने वाले समय में संघ की किसी बड़ी बैठक या अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इस पर अंतिम निर्णय लिया जाए।

अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो यह संघ के संगठनात्मक इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।

The Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) is reportedly planning a significant organizational restructuring to improve administrative efficiency across India. According to reports, the Sangh may replace the existing system of multiple provincial pracharaks with a new model featuring a single state pracharak responsible for coordination within an entire state. With more than 40 lakh members and over 83,000 daily shakhas, this structural change aims to streamline communication, strengthen organizational discipline, and enhance the implementation of RSS activities under the guidance of RSS chief Mohan Bhagwat.

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