AIN NEWS 1: कर्नाटक के कलबुर्गी ज़िले के सेडम नगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पथ संचलन को लेकर रविवार को बड़ा विवाद खड़ा हो गया। प्रशासन ने आखिरी वक्त में संचलन पर रोक लगाते हुए कई स्वयंसेवकों को हिरासत में ले लिया। यह कदम स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप और अनुमति को लेकर प्रशासन और संघ के बीच चल रहे टकराव को उजागर करता है।

संचलन की योजना और प्रशासनिक रोक
संघ का पथ संचलन शाम 4 बजे से प्रारंभ होना तय था। कार्यक्रम के तहत संचलन दो अलग-अलग मार्गों से होते हुए पुनः एक स्थान पर मिलकर समाप्त होना था। इसके लिए कुल आठ वाहिनियाँ और चार घोष पथक (बैंड टोली) पूरी तैयारी में थीं।
लेकिन जैसे ही संचलन शुरू होने का समय आया, प्रशासन ने अचानक मैदान के पास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया। लगभग 3:30 बजे के आसपास पांच बसों को संचलन मार्ग पर खड़ा करके रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया। पुलिस ने संघ के पदाधिकारियों को सूचित किया कि बिना औपचारिक अनुमति के संचलन नहीं निकाला जा सकता।
संघ की दलील — “सूचना पहले ही दी गई थी”
संघ के प्रतिनिधियों ने प्रशासन को बताया कि हर साल की तरह इस वर्ष भी संचलन की सूचना एक सप्ताह पहले ही दी गई थी। संघ का कहना है कि उन्होंने 13 अक्टूबर को लिखित सूचना दी थी, लेकिन प्रशासन ने कोई लिखित अनुमति पत्र जारी नहीं किया। यानी प्रशासन ने अनुमति देने से परोक्ष रूप से इनकार कर दिया।
स्वयंसेवकों ने लिया निर्णय — संचलन जारी रहेगा
संघ के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने तय किया कि कार्यक्रम पूर्व निर्धारित समय पर ही शुरू किया जाएगा। शाम 5 बजे जैसे ही संचलन शुरू हुआ और मुख्य मार्ग पर पहुंचा, पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कई स्वयंसेवकों को बसों में बैठाकर पुलिस स्टेशन ले गई।
हालांकि, पुलिस ने औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज नहीं की और मौखिक चेतावनी देने के बाद स्वयंसेवकों को छोड़ दिया गया।
संचलन का दूसरा हिस्सा — पुराने कस्बे में हुआ आयोजन
उधर, संघ की अन्य वाहिनियों ने रणनीति बदलते हुए संकरे मार्गों वाले पुराने कस्बे की गलियों में संचलन जारी रखा। इन रास्तों पर पुलिस की बसें और भारी वाहन नहीं पहुंच पाए, जिससे कार्यक्रम आधे शहर में सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
रोक-टोक और देरी के बावजूद स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में संचलन का स्वागत करने के लिए सड़कों पर मौजूद रहे। कई स्थानों पर लोगों ने पुष्पवर्षा कर स्वयंसेवकों का अभिनंदन किया।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और आरोप
सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र एवं कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे के निर्देश पर की गई। प्रियंक खड़गे इस क्षेत्र के प्रभारी माने जाते हैं और लंबे समय से संघ की गतिविधियों को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए हैं।
संघ समर्थकों का आरोप है कि सरकार संघ की वैचारिक गतिविधियों को रोकने के लिए प्रशासनिक दवाब बना रही है। वहीं, कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बिना अनुमति सार्वजनिक स्थल पर कोई भी संगठन कार्यक्रम नहीं कर सकता।
न्यायालय की शरण में संघ
घटना के बाद संघ की ओर से राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ न्यायालय में याचिका दायर की गई है। इस मामले की सुनवाई 24 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जिसमें सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा गया है।
राज्य सरकार ने हाल ही में आदेश जारी कर कहा है कि किसी भी सार्वजनिक पार्क, मैदान, स्कूल या कॉलेज परिसर में बिना अनुमति किसी संगठन को कार्यक्रम करने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा, ऐसे सरकारी कर्मचारी जो किसी राजनीतिक या वैचारिक संगठन की गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं, उन्हें सेवा से निलंबित किया जा सकता है।
सामाजिक प्रतिक्रिया और विवाद का असर
सेडम की इस घटना ने पूरे कर्नाटक में राजनीतिक बहस छेड़ दी है। संघ समर्थक इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन” बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे “कानून और व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता” कह रही है।
कई सामाजिक संगठनों ने प्रशासनिक कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण बताया है। वहीं, राज्य सरकार का कहना है कि कानून के तहत अनुमति प्रक्रिया का पालन जरूरी है, और यह किसी एक संगठन के खिलाफ कदम नहीं है।
कुल मिलाकर, यह घटना केवल एक संचलन की रोक से कहीं आगे जाकर वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गई है — जहां प्रशासनिक नियंत्रण, लोकतांत्रिक अधिकार और राजनीतिक विचारधाराएं एक-दूसरे से टकराती दिखाई दे रही हैं।
The RSS Path Sanchalan in Sedam, Karnataka, faced a major disruption when police halted the rally citing lack of permission. RSS volunteers were briefly detained, sparking a political controversy involving Congress minister Priyank Kharge and his father Mallikarjun Kharge. The RSS claims it had submitted prior written notice, while the government insists on strict compliance with event permissions. The matter is now heading to court on October 24, raising questions about freedom of assembly and political influence in Karnataka.




















