AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के गढ़मुक्तेश्वर में गंगा नदी के तट पर लगने वाला कार्तिक पूर्णिमा मेला न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद गहरा है। यह मेला महाभारत काल से जुड़ा बताया जाता है और सदियों से यहां श्रद्धालु गंगा स्नान और दीपदान करने आते रहे हैं।
आस्था और इतिहास से जुड़ा मेला
कहा जाता है कि इस मेले की शुरुआत उन दिनों में हुई जब गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र को “हस्तिनापुर का प्रवेश द्वार” कहा जाता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए यहां गंगा में स्नान किया था, और तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान की परंपरा शुरू हुई। यही वजह है कि इस मेले को “मोक्षदायिनी गंगा मेला” भी कहा जाता है।
समय के साथ यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मिलन स्थल के रूप में भी विकसित हुआ। पुराने समय में जब संचार के साधन सीमित थे, तब यह मेला लोगों के मिलने-जुलने, व्यापार करने और विचार साझा करने का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।
सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र
बीसवीं सदी के मध्य तक यह मेला राजनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम था। कई बड़े नेताओं ने इस मेले को जनता से संवाद का माध्यम बनाया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की आवाज़ माने जाते थे, इस मेले में आकर अपनी नीतियों पर चर्चा करते थे। यहाँ होने वाली जनसभाओं में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे।
सालों पहले जब प्रचार-प्रसार के साधन सीमित थे, तब मेले के दौरान राजनीतिक घोषणाएँ और योजनाएँ लोगों तक सीधे पहुँचती थीं। यह मेला एक तरह से जनसंपर्क और लोकसंवाद का जीवंत मंच बन गया था।
विभाजन के समय दंगों की लपटों में झुलसा गढ़ गंगा मेला
देश के विभाजन के दौरान साल 1947 में जब पूरे उत्तर भारत में सांप्रदायिक दंगे फैले, तब गढ़मुक्तेश्वर का यह शांत और पवित्र मेला भी उस आग से अछूता नहीं रहा। ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि उस समय मेले में देश की सबसे बड़ी लकड़ी की मंडी लगती थी, जहाँ किसान कृषि उपकरण, बैलगाड़ी और अन्य सामान खरीदते थे।
दंगों के दौरान यही मंडी सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई। कई व्यापारियों की दुकानें जल गईं और जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन इस त्रासदी के बीच इंसानियत की मिसालें भी देखने को मिलीं। स्थानीय लोगों ने बताया कि उस कठिन समय में हिंदू परिवारों ने अपने मुस्लिम परिचितों को घरों में छिपाकर उनकी जान बचाई।
गढ़मुक्तेश्वर के प्राचीन गंगा मंदिर के कुल पुरोहित पंडित संतोष कौशिक बताते हैं कि विभाजन के समय “गढ़ खादर मेला” भी दंगों की चपेट में आया था। हिंसा की लपटें मेले से शहर तक फैल गई थीं, लेकिन लोगों ने आपसी भाईचारे की मिसाल कायम रखी।
बदलते दौर में मेले की परंपरा
समय के साथ इस मेले का स्वरूप बदलता गया है। पहले यह मेला मुख्य रूप से ग्रामीण और कृषि समाज के लोगों के लिए केंद्र था, लेकिन अब यहाँ शहरी और बाहरी राज्यों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। आधुनिकता के इस दौर में भी गंगा स्नान, दीपदान और धार्मिक प्रवचनों की परंपरा वैसी ही बनी हुई है।
अब मेले में सुरक्षा, सफाई और यातायात व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रशासन हर साल लाखों श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए बड़े पैमाने पर इंतज़ाम करता है।
मेलों का सांस्कृतिक महत्व
गढ़मुक्तेश्वर का यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक है। यहां हर धर्म, जाति और वर्ग के लोग एक साथ गंगा स्नान करते हैं, जिससे सामाजिक एकता और सद्भाव का संदेश मिलता है।
यह मेला हर वर्ष आस्था, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। गंगा किनारे जलते दीपकों की कतारें, श्रद्धालुओं की भीड़ और भक्ति की भावना इस पर्व को एक अद्भुत दृश्य में बदल देती हैं।
गढ़मुक्तेश्वर का कार्तिक मेला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह बताता है कि भारत की परंपराएँ चाहे कितनी भी पुरानी हों, उनकी जड़ें आज भी समाज के दिलों में जीवित हैं।
The Kartik Mela in Garhmukteshwar, located on the banks of the holy Ganga River in Hapur district, is one of the most ancient and culturally significant fairs in North India. Believed to date back to the Mahabharata era, this festival blends faith, spirituality, and community spirit. Devotees from across India gather for Ganga Snan and Deepdan, symbolizing purity and devotion. Historically, it was also a center for political and social activities, visited by leaders like Chaudhary Charan Singh. Despite challenges during the Partition riots, the fair stands today as a symbol of unity, peace, and living heritage.


















