AIN NEWS 1: ज्ञानवापी मस्जिद विवाद एक बार फिर चर्चा में है, और इसके केंद्र में हैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व अधिकारी केके मुहम्मद। अपने स्पष्ट और निर्भीक बयानों के लिए जाने जाने वाले केके मुहम्मद ने अब ज्ञानवापी मामले पर एक बार फिर बड़ी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि इस पुरातन विवाद का समाधान तभी संभव है, जब दोनों समुदाय—हिंदू और मुस्लिम—एक संतुलित, व्यवहारिक और शांतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएं।

केके मुहम्मद ने साफ कहा कि मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वे ज्ञानवापी मस्जिद पर अपना दावा छोड़ दें, क्योंकि इतिहास और पुरातात्विक प्रमाण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि वहां पहले एक मंदिर मौजूद था। साथ ही उन्होंने हिंदू समुदाय को भी संदेश दिया कि वे पुरानी मांगों को लेकर लगातार नए विवाद न खड़े करें। उनके अनुसार, समाधान का रास्ता तभी निकलेगा जब दोनों पक्ष अपने-अपने रुख में लचीलापन दिखाएं और आगे बढ़ने की इच्छा रखें।
कम्युनिस्ट इतिहासकारों पर गंभीर आरोप
अपने बयान में केके मुहम्मद ने यह भी कहा कि भारत में मंदिर–मस्जिद से जुड़े कई विवाद वर्षों तक इसलिए खिंचते रहे, क्योंकि कुछ इतिहासकारों ने तथ्यों को राजनीति के अनुसार ढालने की कोशिश की। उन्होंने खास तौर पर कम्युनिस्ट इतिहासकारों का जिक्र किया और आरोप लगाया कि इन इतिहासकारों ने मुस्लिम समुदाय को यह यकीन दिलाया कि मंदिरों के अस्तित्व से जुड़े प्रमाणों को स्वीकार न करें।
वे कहते हैं कि यही वजह थी कि अयोध्या विवाद वर्षों तक उलझा रहा। एएसआई द्वारा बार–बार साक्ष्य प्रस्तुत करने के बावजूद, कई इतिहासकारों ने मंदिर के पुरातात्विक अवशेषों को स्वीकारने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, यह मुद्दा कानूनी और सामाजिक स्तर पर और अधिक जटिल होता चला गया।
केके मुहम्मद का मानना है कि ज्ञानवापी मुद्दे में भी वही गलती दोहराई जा रही है। उनका कहना है कि जब ऐतिहासिक प्रमाण एक दिशा की ओर इशारा कर रहे हों, तो उन्हें समझदारी और तथ्यों के आधार पर स्वीकार करना चाहिए, न कि राजनीतिक आग्रह के कारण उन्हें खारिज कर देना चाहिए।
ज्ञानवापी में मंदिर होने के संकेत
एएसआई के पूर्व अधिकारी ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कई बार ऐसे पुरातात्विक संकेतों की पुष्टि की है जो यह बताते हैं कि ज्ञानवापी परिसर में कभी एक भव्य हिंदू मंदिर मौजूद था। उनका बयान एएसआई की पुरानी रिपोर्टों और शोध कार्यों का हवाला देता है, जिसमें मंदिर के अवशेषों का उल्लेख मिलता है।
मुहम्मद ने कहा कि इन ऐतिहासिक और पुरातात्विक तथ्यों को नकार देना न तो वास्तविकता को बदल सकता है और न ही इससे कोई समाधान निकलता है। उनका संदेश साफ था—इतिहास को राजनीति के चश्मे से देखने के बजाय पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर समाधान तलाशना चाहिए।
हिंदू समुदाय के लिए सलाह
जहां उन्होंने मुस्लिम समुदाय से पुराना दावा छोड़ने को कहा, वहीं हिंदू समुदाय को भी संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी। उन्होंने चेताया कि यदि हर धार्मिक स्थल को लेकर नई मांगें उठने लगेंगी, तो समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होगा। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक सह-अस्तित्व तभी संभव है जब हर समुदाय कुछ समझौते करे।
केके मुहम्मद का कहना है कि हिंदू समुदाय को भी ध्यान रखना चाहिए कि पुराने विवादों के समाधान के बाद अब एक नए दौर की शुरुआत होनी चाहिए, जहां समाज आगे बढ़े और नए विवाद न खड़े हों। उनका संदेश था कि मंदिर–मस्जिद विवादों की लंबी कड़ी को वहीं समाप्त कर देना चाहिए, जहां ऐतिहासिक और कानूनी रूप से संभव हो।
संतुलित दृष्टिकोण से ही समाधान
केके मुहम्मद ने जोर दिया कि ज्ञानवापी का मामला धार्मिक भावनाओं, राजनीति, इतिहास और कानूनी पहलुओं के कारण लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आवश्यक है कि समाधान किसी एकतरफा निर्णय से नहीं, बल्कि संवाद, समझदारी, और तथ्यों के आधार पर निकले।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत का इतिहास केवल धार्मिक संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक साझेदारी और पारस्परिक सम्मान का भी इतिहास है। ऐसे में ज्ञानवापी जैसे मामलों पर दोनों समुदायों को मिलकर समाधान खोजने की दिशा में बढ़ना चाहिए।
समाप्ति की ओर संकेत
केके मुहम्मद के इस बयान ने एक बार फिर बहस को गति दे दी है। उनका साफ संदेश यह है कि अतीत के विवादों को लंबा खींचने के बजाय उनसे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उनका विश्वास है कि यदि मुस्लिम समुदाय ऐतिहासिक तथ्यों को मानकर अपना दावा छोड़ दे और हिंदू समुदाय नई मांगें न बढ़ाए, तो यह विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से खत्म हो सकता है।
उनका बयान न सिर्फ ज्ञानवापी विवाद पर एक विशेषज्ञ की राय है, बल्कि भारतीय समाज को एक दिशा देने की कोशिश भी है—जहां इतिहास को स्वीकार कर भविष्य के लिए रास्ता बनाया जा सके।
Former ASI archaeologist KK Muhammed has reiterated that the Gyanvapi dispute must be resolved through a balanced approach where Muslims drop their claim over the mosque structure and Hindus avoid raising new demands. Highlighting past controversies like the Ayodhya issue, he emphasized that political narratives and communist historians’ denial of temple evidence complicated the case. His statement adds a significant perspective to the ongoing Gyanvapi case debate, making it crucial for anyone following updates on the Gyanvapi dispute, KK Muhammed’s views, archaeological findings, and the broader Hindu-Muslim temple–mosque controversies.


















