AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में घटित एक घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि 21वीं सदी में भी समाज दहेज जैसी कुरीतियों से पूरी तरह मुक्त क्यों नहीं हो पाया है।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की है जो अब भी “लड़की के घरवालों” से अपेक्षाओं की बोझिल परंपरा को ढो रही है।
विवाह की तैयारियों के बीच अचानक उठा तूफ़ान
1 नवंबर को होने वाली शादी के लिए सब कुछ तय था — हल्दी, मेंहदी, संगीत की रस्में पूरी हो चुकी थीं।
दुल्हन अपने सपनों के जोड़े में मंडप में बैठी थी, रिश्तेदारों के बीच हंसी-खुशी का माहौल था।
लेकिन इसी बीच खबर आई कि दूल्हे अमनदीप के परिवार ने बारात लाने से पहले थार कार की मांग कर दी है।
दुल्हन के परिवार ने बताया कि वे पहले से ही अपनी हैसियत से ज़्यादा खर्च कर चुके थे।
उन्होंने दहेज में बुलेट मोटरसाइकिल और अन्य सामान देने की तैयारी की थी, लेकिन अचानक थार कार की मांग ने सबको झकझोर दिया।
परिवार ने दूल्हे पक्ष को समझाने की कोशिश की — “हमने जितना बन पड़ा, सब कुछ दिया है, आप शादी होने दीजिए।”
लेकिन दूल्हे पक्ष अपने फैसले पर अड़ गया।
उनका कहना था कि बिना थार कार के बारात नहीं आएगी।
मंडप में इंतज़ार करती रह गई दुल्हन
शाम तक जब बारात नहीं पहुंची, तब मंडप में बैठे सभी लोग बेचैन हो उठे।
घड़ी की सुई आगे बढ़ती रही और उम्मीदें टूटती चली गईं।
दुल्हन की आंखें बारात के रास्ते पर टिकी रहीं — लेकिन वहां से कोई नहीं आया।
कुछ ही घंटों में खुशियों से भरे उस घर में सन्नाटा छा गया।
रिश्तेदारों ने ढांढस बंधाने की कोशिश की, पर टूटे हुए दिलों के लिए शब्द भी कम पड़ गए।
दुल्हन के पिता ने बताया,
“हमने अमनदीप और उसके परिवार पर पूरा भरोसा किया था। बेटी की शादी के लिए हर चीज़ में कोई कमी नहीं छोड़ी। लेकिन थार कार की मांग ने सब कुछ खत्म कर दिया।”
पुलिस में दी गई शिकायत, जांच शुरू
घटना की सूचना स्थानीय नकुड़ थाना पुलिस को दी गई।
पुलिस ने दुल्हन के पिता की तहरीर पर दूल्हे अमनदीप और उसके परिजनों के खिलाफ शिकायत दर्ज की है।
शिकायत में लिखा गया है कि अमनदीप के परिवार ने दहेज में थार कार की मांग की और मांग पूरी न होने पर शादी से इनकार कर दिया।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि
“मामला दहेज मांगने से जुड़ा है, जांच चल रही है। दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
सामाजिक नज़रिया: दहेज प्रथा का जहर अब भी जीवित
भारत में दहेज प्रथा कोई नई बात नहीं, लेकिन यह जितनी पुरानी है, उतनी ही घातक भी।
समाज में “लड़की वालों की जिम्मेदारी” का जो बोझ है, वही आज भी कई परिवारों को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से तोड़ रहा है।
सहारनपुर की यह घटना याद दिलाती है कि दहेज की मांग सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी भी है।
यह उन भावनाओं का अंत है जो दो परिवारों को जोड़ने के लिए होती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता नीलम चौधरी कहती हैं,
“थार कार हो या नकदी — दहेज की हर मांग अपराध है। कानून बने हैं, लेकिन समाज में मानसिक बदलाव अब भी बाकी है।
जब तक लोग ‘लड़की देना’ और ‘लड़की लेना’ को लेन-देन की तरह देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।”
कानूनी दृष्टिकोण: क्या कहता है दहेज कानून
भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961) के तहत दहेज लेना, देना या मांगना अपराध है।
कानून के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति शादी के पहले, दौरान या बाद में दहेज मांगता है, तो उसे 5 साल तक की सजा और ₹15,000 या दहेज की रकम (जो भी अधिक हो) का जुर्माना हो सकता है।
इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता की धारा 498A में भी ऐसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है।
इसके बावजूद समाज में इस कानून का डर उतना प्रभावी नहीं दिखता, जितना होना चाहिए।
मानवता के नजरिए से: एक बेटी का सपना टूटा, पर हिम्मत नहीं
इस घटना में सबसे बड़ी पीड़ा उस युवती को झेलनी पड़ी जो अपने नए जीवन की शुरुआत के सपने देख रही थी।
शादी का जोड़ा पहनने के बाद, मंडप में बैठकर बारात का इंतजार करना — और फिर यह एहसास होना कि वह बारात अब नहीं आएगी —
यह किसी भी लड़की के लिए जीवनभर का सदमा बन सकता है।
लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस युवती ने हिम्मत नहीं हारी।
उसने कहा,
“अगर किसी को मेरे माता-पिता की मेहनत की कीमत थार कार से चाहिए, तो ऐसी शादी मुझे नहीं चाहिए।”
उसके इस बयान ने सोशल मीडिया पर भी कई लोगों को प्रेरित किया।
लोगों ने लिखा — “ऐसी बेटियां समाज की असली ताकत हैं।”
समाज को क्या करना चाहिए?
यह घटना केवल पुलिस केस नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक आईना है।
जरूरत है कि लोग दहेज के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाएं,
लड़कों के परिवार यह समझें कि सम्मान और प्यार कभी पैसों में नहीं तौले जा सकते।
स्कूलों और कॉलेजों में ‘दहेज विरोधी शिक्षा’ को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए ताकि नई पीढ़ी यह समझ सके कि दहेज सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि नैतिक अपराध है।
सामाजिक संगठनों और पंचायतों को भी ऐसे मामलों में सख्ती दिखानी चाहिए।
अगर किसी परिवार पर दहेज मांगने का आरोप साबित होता है, तो समाज को उन्हें बहिष्कृत करने का साहस दिखाना चाहिए।
सहारनपुर की यह घटना एक गहरी सीख देती है —
शादी दो आत्माओं का मिलन है, कोई सौदेबाज़ी नहीं।
थार कार जैसी मांगें न केवल इंसानियत को शर्मसार करती हैं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के सपनों को रौंद देती हैं।
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि जब बेटियाँ हिम्मत दिखाती हैं, तो समाज को बदलने की ताकत उनके भीतर होती है।
जरूरत है कि ऐसी हिम्मत हर घर की पहचान बने।
A heart-wrenching case from Saharanpur, Uttar Pradesh, exposes the persistence of dowry practices in India. A wedding was called off after the groom’s family demanded a Thar car as dowry, even though the bride’s family had arranged a Bullet bike. When the demand wasn’t met, the groom refused to bring the baraat, leaving the bride waiting in the mandap. The brave bride later declared she wouldn’t marry a man who valued a car over respect. A police complaint was filed against the groom Amandeep and his family. This case has reignited discussions on dowry laws, women’s dignity, and social reform in India.


















