AIN NEWS 1 | हर साल सर्दियों के आते ही दिल्ली और आसपास का इलाका धुंध और धुएं से भर जाता है। इस मौसम में सड़कों पर चलना मुश्किल और सांस लेना भारी हो जाता है। आँखों में जलन और गले में खराश आम हो चुकी है।
ताज़ा रिपोर्ट्स के मुताबिक, वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली-एनसीआर के लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 8 साल कम हो गई है।
यह निष्कर्ष वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित है, जिनमें बताया गया है कि इस क्षेत्र में खराब वायु गुणवत्ता अब सिर्फ पर्यावरण नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर संकट बन चुकी है।
वर्तमान प्रदूषण की स्थिति
2025 की Air Quality Life Index (AQLI) रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर की हवा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सुरक्षित सीमा से कई गुना ज़्यादा प्रदूषित है।
PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण हवा में इतने अधिक हैं कि ये फेफड़ों में जाकर रक्त प्रवाह तक पहुँच जाते हैं।
WHO की सीमा के मुताबिक हवा में PM2.5 का स्तर 5 µg/m³ से ज़्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन दिल्ली में यह करीब 100 µg/m³ तक पहुँच गया है — यानी लगभग 20 गुना अधिक।
इससे यहां के लोगों की औसत उम्र में 8.2 वर्ष तक की कमी देखी जा रही है।
प्रदूषण के प्रमुख कारण
वाहनों से निकलता धुआँ
दिल्ली की सड़कों पर हर साल लाखों नई गाड़ियाँ उतरती हैं। पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले इन वाहनों से कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और PM2.5 जैसे ज़हरीले कण निकलते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली के कुल प्रदूषण में लगभग 50% योगदान वाहनों का है।पराली जलाना
पंजाब और हरियाणा में हर साल अक्टूबर-नवंबर के दौरान किसान फसल के अवशेष जलाते हैं। इस धुएं की मोटी परत हवा के साथ दिल्ली तक पहुँचती है और पूरे एनसीआर को घना स्मॉग ढक लेता है।
हवा की दिशा उत्तर-पश्चिम होने से यह धुआँ दिल्ली में जम जाता है और सांस लेना मुश्किल कर देता है।निर्माण की धूल
लगातार चल रहे निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल भी प्रदूषण का बड़ा कारण है। खुले में उड़ती धूल, बिना ढके ट्रक और सड़कों की मिट्टी हवा में मिलकर PM10 और PM2.5 कणों को बढ़ाती है।औद्योगिक धुआँ
कई छोटी-बड़ी फैक्ट्रियाँ अब भी पुराने ईंधनों का इस्तेमाल करती हैं। इनसे निकलने वाला धुआँ सल्फर डाइऑक्साइड और हानिकारक गैसों से भरा होता है, जो फेफड़ों और दिल की बीमारियों को जन्म देता है।कचरा जलाना
खुले में कचरा जलाने की प्रथा दिल्ली में अब भी जारी है। इसमें प्लास्टिक और रबर जैसी चीज़ें जलने से हवा में जहरीले रसायन और डाइऑक्सिन्स फैलते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं।
स्वास्थ्य पर असर
दिल्ली की हवा अब हर व्यक्ति की सांसों पर सीधा वार कर रही है।
तीन में से चार परिवारों में कोई न कोई सदस्य खांसी, गले की खराश या सांस लेने में परेशानी का शिकार है।
बच्चों में अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
बुजुर्गों में दिल की बीमारियाँ और सांस की तकलीफें आम हो चुकी हैं।
गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर भी इसका दीर्घकालिक असर देखा गया है।
एक हालिया सर्वे में 42% परिवारों ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में किसी न किसी सदस्य को लगातार खांसी या गले की समस्या रही।
डॉक्टरों के अनुसार, लंबे समय तक इस स्तर का प्रदूषण झेलने से फेफड़ों का कैंसर, COPD और हृदय रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
सरकार के प्रयास और चुनौतियाँ
सरकारें लगातार प्रदूषण नियंत्रण के उपाय कर रही हैं।
GRAP (Graded Response Action Plan) के तहत हवा की गुणवत्ता बिगड़ने पर चरणबद्ध सख्त कदम उठाए जाते हैं — जैसे स्कूल बंद करना, निर्माण कार्य रोकना, डीज़ल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाना आदि।
पुराने वाहनों को हटाने की प्रक्रिया जारी है।
सड़कों पर एंटी-स्मॉग गन और पानी का छिड़काव किया जा रहा है।
उद्योगों में प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों पर रोक लगाई गई है।
लेकिन इसके बावजूद, निगरानी और लागू करने की सीमाएँ अब भी सबसे बड़ी चुनौती हैं।
प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों में 33% की वृद्धि दर्ज हुई है, लेकिन आधे मामलों में अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
क्या हो सकते हैं समाधान
सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और निजी वाहनों का उपयोग कम करना।
किसानों को पराली प्रबंधन के बेहतर विकल्प और आर्थिक सहायता देना।
शहरों में वृक्षारोपण अभियान को बड़े स्तर पर चलाना।
लोगों में जागरूकता बढ़ाना ताकि कोई भी घरों या सड़कों पर कचरा न जलाए।
उद्योगों और निर्माण स्थलों पर प्रदूषण नियंत्रण तकनीक अनिवार्य करना।
अगर ये उपाय सख्ती और निरंतरता से लागू किए जाएँ, तो दिल्ली-एनसीआर फिर से अपनी हवा को स्वच्छ बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं बल्कि स्थायी स्वास्थ्य संकट बन चुका है।
यह सिर्फ हवा को नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
अगर समय रहते सख्त और ईमानदार कदम नहीं उठाए गए, तो यह महानगर जल्द ही “गैस चैंबर” में तब्दील हो जाएगा।
हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपने हिस्से का योगदान दे — चाहे वाहन कम चलाकर, पेड़ लगाकर या कचरा न जलाकर।
क्योंकि हवा सरकार की नहीं, हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।



















