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महाराष्ट्र में आरक्षण सीमा पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी, 50% से ऊपर नहीं जाएगा कोटा!

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AIN NEWS 1: महाराष्ट्र में होने वाले अगले महीने के स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को बेहद स्पष्ट और सख्त चेतावनी दी है। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी कीमत पर 50% आरक्षण की संवैधानिक सीमा को पार नहीं किया जा सकता। यदि राज्य सरकार ने इस तय सीमा का उल्लंघन करने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर चुनाव रोकने का आदेश देने में भी पीछे नहीं हटेगी।

सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक टिप्पणी

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की दो-सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव तभी कराए जा सकते हैं, जब आरक्षण की व्यवस्था वही हो जो 2022 में जे.के. बांठिया आयोग की रिपोर्ट आने से पहले लागू थी। अदालत ने याद दिलाया कि यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, सरकार आरक्षण प्रतिशत में कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकती।

पीठ ने यह भी कहा कि अगर राज्य चुनाव आयोग या सरकार किसी भी तरह से 50% सीमा से ऊपर का आरक्षण लागू करने की कोशिश करती है, तो चुनाव प्रक्रिया को तुरंत रोका जा सकता है। अदालत का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव लंबे समय से टलते आए हैं, और अब चुनाव की तैयारी तेज होने की उम्मीद की जा रही थी।

ओबीसी आरक्षण पर विवाद क्यों बढ़ा?

महाराष्ट्र में ओबीसी आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस लगातार गर्म है। 2022 में जे.के. बांठिया आयोग ने ओबीसी वर्ग के लिए स्थानीय निकाय चुनावों में 27% आरक्षण की अनुशंसा की थी। इसके बाद राज्य सरकार ने इस रिपोर्ट को आधार बनाकर ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण देने का फैसला किया था। लेकिन यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के बाद अटक गया।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि जब तक आयोग की सिफारिशों, उनके डेटा और तरीके की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक राज्य सरकार और चुनाव आयोग पुराने नियमों के अनुसार ही चुनाव कराएं। न्यायालय ने याद दिलाया कि संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता जब तक इसके लिए ठोस, वैज्ञानिक और अद्यतन डेटा मौजूद न हो।

राजनीतिक माहौल में बढ़ी बेचैनी

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। एक तरफ ओबीसी नेताओं और दलों का दबाव है कि समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। दूसरी तरफ न्यायालय की सख्त टिप्पणी के बाद सरकार पर संवैधानिक व्यवस्था का पालन करने का दबाव भी बढ़ गया है।

स्थानीय निकाय चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में बेहद अहम होते हैं, क्योंकि नगर निगम, नगर परिषद और जिला परिषद जैसे निकायों के जरिए स्थानीय स्तर पर सत्ता की पकड़ मजबूत होती है। ऐसे में कोई भी पार्टी इन चुनावों को हल्के में नहीं लेना चाहती।

अदालत ने क्यों दिखाई सख्ती?

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि आरक्षण व्यवस्था किसी राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं चल सकती। इसे तय करने के लिए ठोस आंकड़े और वैज्ञानिक पद्धति जरूरी है। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को भी कहा कि आयोग की रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए डेटा कितने विश्वसनीय और अद्यतन हैं।

पीठ ने सवाल उठाया कि अगर आयोग की अनुशंसाएं अभी विवादित हैं, तो राज्य कैसे उस आधार पर चुनाव करवाने का दावा कर सकता है? इसलिए अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि चुनाव केवल उन्हीं शर्तों पर होंगे, जो पहले से तय थीं—यानी 50% आरक्षण की सीमा के भीतर।

चुनावों पर क्या असर पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी का मतलब यह है कि यदि राज्य सरकार या चुनाव आयोग ने 50% से ज्यादा आरक्षण लागू किया, तो चुनाव तुरंत रोक दिए जाएंगे। इससे चुनाव कार्यक्रम फिर से प्रभावित हो सकता है, क्योंकि अभी तक स्थानीय निकाय चुनाव कई महीने से टलते चले आ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार अब या तो आयोग की रिपोर्ट पर कोर्ट में उचित सफाई देगी या फिर सीमा के भीतर रहते हुए चुनाव कराने की तैयारी शुरू करेगी। यदि कोई भी राजनीतिक दल संशोधित आरक्षण के बिना चुनाव से नाखुश होता है, तो यह एक नया विवाद खड़ा कर सकता है।

आगे क्या?

अब सबकी नजरें अगली सुनवाई पर हैं, जहां यह तय हो सकता है कि आयोग की रिपोर्ट पर अदालत क्या रुख अपनाती है। यदि कोर्ट इसे अमान्य मानती है, तो राज्य को पुरानी आरक्षण व्यवस्था के तहत चुनाव करवाने होंगे। लेकिन अगर अदालत आयोग की रिपोर्ट को उचित मानती है, तो सरकार को संशोधित आरक्षण लागू करने का रास्ता मिल सकता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों को सावधान कर दिया है कि कोई भी कदम संविधान के दायरे में रहकर ही उठाया जाए।

The Supreme Court has firmly warned Maharashtra that the upcoming local body elections cannot exceed the 50 percent reservation limit, emphasizing strict adherence to constitutional guidelines. The court insisted that the state must follow the rules that existed before the JK Bhatia Commission submitted its report recommending 27% OBC reservation. As the OBC reservation issue remains pending, the Supreme Court stated that any attempt to violate the reservation cap will lead to a halt in the Maharashtra local body elections, making this a crucial turning point for the state’s political landscape.

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