AIN NEWS 1: स्कूल की घंटी बजने के बाद जब बच्चे घर लौटते हैं, तो माता-पिता यह मानकर चलते हैं कि वे अब सुरक्षित माहौल में हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि आज बच्चों के हाथ में रखा मोबाइल फोन ही उनके लिए डर और तनाव की सबसे बड़ी वजह बन चुका है। Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस हक़ीक़त को बेहद साफ़ तरीके से सामने रखा है। रिपोर्ट कहती है कि यूरोप के 29 देशों में साइबर बुलीइंग तेजी से बढ़ रहा है और बच्चों की मानसिक सेहत को बुरी तरह नुकसान पहुँचा रहा है।
लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया जैसे छोटे बाल्टिक देशों से लेकर ब्रिटेन और आयरलैंड जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं तक, लगभग हर चौथा या पाँचवाँ बच्चा रोज़ ऑनलाइन परेशान किया जा रहा है। किसी को चैट में गाली दी जाती है, किसी को धमकाया जाता है, किसी की फ़ोटो के साथ छेड़छाड़ कर वायरल किया जाता है। बच्चों का मज़ाक उड़ाना, उनका सोशल मीडिया पर अपमान करना और उन्हें ब्लैकमेल करना यहाँ आम हो चुका है। यह समस्या जितनी बड़ी दिखती है, असल में उससे कहीं अधिक खतरनाक है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि डिजिटल रूप से जितना ज़्यादा विकसित देश है, वहाँ साइबर बुलीइंग की घटनाएँ उतनी ही ज़्यादा सामने आ रही हैं। इसका मतलब साफ है—टेक्नोलॉजी तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य उससे कहीं पीछे छूट रहे हैं। स्मार्टफोन, टैबलेट और इंटरनेट के बिना पढ़ाई-लिखाई तो संभव नहीं, लेकिन इन उपकरणों के कारण होने वाला मानसिक दबाव बच्चों को चौबीसों घंटे घेरे रहता है।
लड़कियाँ इस ऑनलाइन हिंसा की सबसे बड़ी पीड़ित बन रही हैं। उन पर बॉडी-शेमिंग, उनकी तस्वीरों पर गंदी टिप्पणियाँ, और उनकी दिखावट का मज़ाक उड़ाने जैसी घटनाएँ आम हैं। वहीं लड़कों के मामले में हिंसक धमकियों, लड़ाई के लिए उकसाने और डराने-धमकाने की घटनाएँ ज़्यादा दर्ज की गई हैं। यानी ऑनलाइन दुनिया बच्चों के लिए अलग-अलग, लेकिन बेहद गंभीर तरह का मानसिक बोझ बन रही है।
माता-पिता अपने बच्चों के बदलते व्यवहार को देखकर परेशान हैं, लेकिन वे यह समझ ही नहीं पाते कि असली समस्या कहाँ से शुरू हो रही है। बच्चे डर या शर्म की वजह से घर पर माता-पिता के साथ यह बातें साझा नहीं कर पाते। स्कूलों की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। कई स्कूलों ने माना है कि उनके पास ऑनलाइन बुलीइंग से निपटने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। बच्चे जब तक किसी घटना की शिकायत करते हैं, तब तक उन्हें मानसिक रूप से काफी नुकसान हो चुका होता है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जिन पर ये घटनाएँ सबसे ज़्यादा होती हैं, वे इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम उठाते हुए दिखाई नहीं देते। उनकी प्राथमिकता बच्चों की सुरक्षा के बजाय विज्ञापनों और मुनाफ़े पर ज़्यादा टिकी हुई है। OECD ने अपनी रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी है कि अगर डिजिटल प्लेटफॉर्म, सरकारें, स्कूल और माता-पिता सब मिलकर अभी कदम नहीं उठाते, तो आने वाले वर्षों में बच्चों की मानसिक समस्याओं में खतरनाक इजाफ़ा देखने को मिलेगा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि साइबर बुलीइंग सिर्फ एक डिजिटल समस्या नहीं है, बल्कि यह एक गहरी मानसिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है। लगातार ऑनलाइन अपमान झेलने वाले बच्चों में डिप्रेशन, नशे की लत, आत्मसम्मान में गिरावट और गंभीर मामलों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तक बढ़ सकती है। OECD के मुताबिक, बच्चों की ऑनलाइन दुनिया ऐसी जगह बन गई है जहाँ वे रोज़ाना डर और असुरक्षा का सामना करते हैं।
इस पूरी स्थिति का सबसे दर्दनाक सवाल यही है—क्या हम बच्चों को स्मार्टफोन दे रहे हैं, या अनजाने में उनकी जिंदगी में ज़हर घोल रहे हैं? क्या डिजिटल विकास के चक्कर में हमने एक पूरी पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य को जोखिम में डाल दिया है?
बच्चों को ऑनलाइन दुनिया में सुरक्षित महसूस कराना सिर्फ सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं है। यह माता-पिता, स्कूलों और सोशल मीडिया कंपनियों की संयुक्त जिम्मेदारी है। डिजिटल शिक्षा को पढ़ाई का हिस्सा बनाना, बच्चों को ऑनलाइन व्यवहार के नियम समझाना, और प्लेटफॉर्म्स पर सख्त निगरानी जरूरी है। अगर समाज के सभी स्तर मिलकर इस समस्या को गंभीरता से लें, तभी साइबर बुलीइंग के इस तूफान को रोका जा सकता है।
OECD की चेतावनी साफ है—अगर हम आज नहीं चेते तो कल बहुत देर हो जाएगी। डिजिटल दुनिया को सुरक्षित बनाना ही आने वाली पीढ़ी को बचाने का एकमात्र रास्ता है।
The OECD report on cyberbullying in Europe reveals a growing mental health crisis among children and teenagers. Countries across the Baltic region, the UK, and Ireland are witnessing rising cases of online harassment, body shaming, threats, and digital abuse. As technology expands, cyberbullying in Europe is becoming a major challenge, demanding urgent action to ensure digital safety, protect young users, and promote healthier online environments.



















