AIN NEWS 1: भारत में हाल के वर्षों में कई बड़े सरकारी भवनों, परिसरों और संस्थानों के नाम बदले जा रहे हैं। यह बदलाव केवल नामों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि सरकार के अनुसार यह देश के शासन-तंत्र को “सेवा” और “जनता-केंद्रित प्रशासन” की ओर ले जाने का प्रतीक है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से लेकर राज्यों के राजभवनों तक—कई महत्वपूर्ण स्थलों को नए नाम दिए गए हैं। इन बदलावों को लेकर जनता, राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।
यह लेख इन्हीं नाम-परिवर्तनों, उनके कारणों और उनके राजनीतिक-सामाजिक प्रभावों को सरल भाषा में समझाता है।
🔶 PMO परिसर का नया नाम: “सेवा तीर्थ”
सबसे ज्यादा चर्चा में रहा बदलाव प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर का नाम बदलकर “सेवा तीर्थ” रखना है। प्रधानमंत्री कार्यालय भारत सरकार का सबसे महत्वपूर्ण कार्यस्थल माना जाता है, जहाँ देश की नीतियाँ तय होती हैं और प्रमुख फैसले लिए जाते हैं।
सरकार ने इसके नए नाम को इस तर्क के साथ समझाया कि प्रशासन “सत्ता का केंद्र” नहीं, बल्कि “सेवा का केंद्र” होना चाहिए। “तीर्थ” शब्द के उपयोग को सरकार ने ऐसे स्थल के रूप में बताया है जहाँ “राष्ट्रहित के महत्वपूर्ण निर्णय” लिए जाते हैं — यानी निर्णय-प्रक्रिया को पवित्रता और ज़िम्मेदारी से जोड़कर देखने की पहल।
इसके समर्थकों का मानना है कि यह बदलाव एक नई विचारधारा को दर्शाता है, जिसके तहत सरकार अपने कार्य को “जनसेवा” के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।
लेकिन आलोचकों के अनुसार, बड़े-बड़े नाम परिवर्तन वास्तविक प्रशासनिक सुधारों की जगह नहीं ले सकते। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे “ब्रांडिंग” बताते हुए कहा कि इससे शासन में पारदर्शिता और दक्षता अपने-आप नहीं बढ़ेगी।
🔶 राजभवन बन गए “लोक भवन”: राज्यों में बड़ा बदलाव
सरकार ने देश के कई राज्यों में गवर्नर और उपराज्यपाल के आधिकारिक आवासों — यानी राजभवन — का नाम बदलकर “लोक भवन” कर दिया है।
राजभवन शब्द ब्रिटिश काल से चला आ रहा था। आलोचकों का मानना था कि इस शब्द में “राजशाही” की छवि है।
सरकार का कहना है कि नया नाम लोकतंत्र की भावना का प्रतीक है। “लोक भवन” शब्द यह दर्शाता है कि यह भवन जनता से जुड़े संवैधानिक दायित्व निभाते हैं, न कि किसी राजा या उपनिवेशकालीन शक्ति का केंद्र हैं।
कुछ राज्यों में इसे “लोक निवास” नाम दिया गया है, जो और भी ज्यादा जन-संबंधित शब्द लगता है।
🔶 केंद्रीय सचिवालय का नाम “कर्तव्य भवन”
केंद्रीय सचिवालय (Central Secretariat), जहाँ कई मंत्रालयों और प्रमुख विभागों के कार्यालय हैं, उसे अब “कर्तव्य भवन” नाम दिया गया है।
“कर्तव्य” शब्द को सरकार ऐसे गुण के रूप में प्रस्तुत करती है जिसमें प्रशासनिक तंत्र को “जवाबदेही” और “कर्तव्यनिष्ठा” को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह नाम प्रधानमंत्री द्वारा पहले दिए गए उस संदेश से भी जुड़ा है जिसमें उन्होंने कहा था कि “कर्तव्य ही राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति है।”
🔶 पुराने समय में हुए नाम बदलने की कड़ी
यह पहली बार नहीं है कि ऐसे बदलाव किए गए हैं। पिछले दशक में कुछ और नाम भी बदले गए:
रेसकोर्स रोड → लोक कल्याण मार्ग
यह वह सड़क है जहाँ प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास है।
राजपथ → कर्तव्य पथ
यह बदलाव दिल्ली के केंद्रीय भाग में हुए बड़े पुनर्विकास के दौरान किया गया।
इन दोनों बदलावों का तर्क भी “लोकहित” और “कर्तव्य” को केंद्र में रखने के रूप में दिया गया था।
🔶 सरकार के अनुसार क्यों ज़रूरी थे ये बदलाव?
सरकार का कहना है कि—
1. पुराने नामों में “औपनिवेशिक छाप” थी
2. नए नाम शासन को “सेवा-मुखी” और “जनता-प्रथम” दिखाते हैं
3. प्रशासन में मूल्य आधारित पहचान को बढ़ावा मिलता है
4. सरकारी इमारतें आधुनिक भारत की सोच को दर्शाएँ
सरकार के अनुसार, नाम प्रतीक होते हैं, और प्रतीक विचारों को प्रभावित करते हैं। इसी कारण नामों का “भारतीयकरण” और “लोकतांत्रिक मूल्य आधारित” पहचान बनाना आवश्यक है।
🔶 विरोध क्या कहता है?
विपक्ष और कई सामाजिक कार्यकर्ता इस कदम को लेकर कुछ सवाल उठाते हैं:
क्या नाम बदलना वास्तविक सुधारों से ध्यान भटकाने का तरीका है?
क्या प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही अधिक महत्वपूर्ण नहीं?
क्या इन परिवर्तनों पर जनता की राय ली गई?
क्या इससे सरकारी खर्च बढ़ा है?
हालाँकि, नाम बदलना कानूनन सरकार का अधिकार है और इसे लागू करने की प्रक्रिया भी पूरी तरह संवैधानिक है। मगर राजनीतिक बहस लगातार जारी है।
🔶 जनता की प्रतिक्रिया — मिली-जुली
आम लोगों की प्रतिक्रिया विविध है। कुछ लोग इसे सकारात्मक बदलाव बताते हैं और कहते हैं कि “नाम से ही भावनाओं और दिशा का संकेत मिलता है।”
लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि नाम बदलने से रोजमर्रा की समस्याएँ हल नहीं होतीं — जैसे बेरोज़गारी, महंगाई, ट्रैफिक, प्रशासनिक जटिलता आदि।
🔶 क्या आगे और नाम बदलेंगे?
केंद्रीय एजेंसियों और मंत्रालयों के कुछ अन्य परिसरों के नाम बदलने से जुड़ी फ़ाइलें भी सरकार के पास लंबित हैं।
संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में “Central Vista” क्षेत्र के कुछ और भवनों को भी नए नाम मिल सकते
नाम बदलना एक प्रतीकात्मक प्रक्रिया है। इससे सरकार अपनी कार्यशैली, विचारधारा और प्राथमिकताओं का संकेत देती है।
भारत में हाल के नाम परिवर्तन इसी दिशा का हिस्सा हैं, जहाँ “राज”, “पाथ”, “भवन”, “सत्ता” जैसे शब्दों की जगह “लोक”, “सेवा”, “कर्तव्य” और “कल्याण” जैसे शब्द रखे जा रहे हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ये बदलाव प्रशासनिक स्तर पर किस तरह के दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ते हैं—और क्या ये वास्तव में शासन को अधिक जनता-केंद्रित बनाने में सफल होते हैं या नहीं।
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