AIN NEWS 1 | सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह कई ऐसे विषयों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की, जो सीधे आम नागरिकों के अधिकारों, न्याय व्यवस्था और समाज की मूल संरचना को प्रभावित करते हैं। तलाक-ए-हसन, हिंदू महिलाओं की विरासत, न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति और राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग—इन चार मुद्दों पर अदालत ने बेहद स्पष्ट और निर्णायक रुख अपनाया। अदालत का संदेश साफ है—पुराने, भेदभावपूर्ण या आधुनिक समाज के अनुरूप न होने वाले कानून अब लंबे समय तक नहीं चल सकते।

मामला 1: तलाक-ए-हसन—क्या यह व्यवस्था आधुनिक समाज में सही है?
तलाक-ए-हसन की प्रथा पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। इस प्रथा में मुस्लिम पुरुष तीन महीनों में महीने में एक बार “तलाक” कहकर विवाह खत्म कर सकता है। जजों की बेंच—जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह—ने गहरा सवाल उठाया:
“साल 2025 में ऐसी प्रथा को जारी रहने की मंजूरी कैसे दी जा सकती है? क्या सभ्य समाज इसे स्वीकार कर सकता है?”
अदालत ने संकेत दिया कि यह केवल निजी विवाद नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हित का मामला है। इसलिए यह मुद्दा बड़ी संवैधानिक बेंच—पांच जजों की पीठ—को भेजा जा सकता है। अदालत ने पक्षकारों से संक्षिप्त लिखित जवाब मांग लिया है। उसके बाद निर्णय होगा कि इस प्रथा को खत्म करने या संशोधित करने के लिए मामला संवैधानिक पीठ को भेजा जाए या नहीं।
अदालत की चिंता साफ थी—महिलाओं की गरिमा और समानता पर प्रभाव डालने वाली किसी प्रथा को आधुनिक भारत में जगह नहीं दी जा सकती।
मामला 2: हिंदू महिलाओं की संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सलाह और टिप्पणी
याचिकाकर्ता स्निधा मेहरा ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) को चुनौती दी थी। इस प्रावधान के तहत, यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत (Will) के मरती है, तो उसकी संपत्ति सबसे पहले उसके पति के परिवार को मिलती है—न कि उसकी अपनी मां और पिता को।
याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान संविधान के मूल सिद्धांतों—समानता, गैर-भेदभाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता—के खिलाफ है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह मामला निपटाते हुए कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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महिलाओं को अपनी संपत्ति को लेकर जीवनकाल में वसीयत अवश्य बनानी चाहिए।
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यदि कोई महिला वसीयत के बिना मृत्यु को प्राप्त होती है, और संपत्ति को लेकर विवाद होता है, तो सबसे पहले:
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पूर्व-मुकदमा मध्यस्थता,
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या लोक अदालत का विकल्प अपनाया जाना चाहिए।
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यदि मध्यस्थता असफल रहती है, तब इस प्रावधान को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
यह टिप्पणी उन लाखों महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी संपत्ति के बंटवारे को लेकर जागरूक नहीं हैं, और जिनकी मृत्यु के बाद परिवार में बड़े विवाद खड़े हो जाते हैं।
मामला 3: जिला जज पद पर पदोन्नति—विशेष कोटा मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया
न्यायिक सेवा में जिला जज के पद पर पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर कई अधिकारियों द्वारा विशेष कोटा या अतिरिक्त लाभ देने की मांग उठाई गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ—जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई कर रहे थे—ने इस मांग को पूरी तरह खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा:
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उच्चतर न्यायिक सेवा (HJS) में अधिकारी चाहे किसी भी रास्ते से आए हों—सीधी भर्ती, नियमित प्रमोशन या विभागीय प्रतियोगी परीक्षा—उन्हें एक समान समझा जाना चाहिए।
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HJS में शामिल होने के बाद अलग-अलग श्रेणियों में बांटना सही नहीं।
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जिला जज के पद के लिए वरिष्ठता और योग्यता ही मुख्य आधार होंगे।
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निचली अदालतों में लंबे समय तक काम करना किसी विशेष कोटा का आधार नहीं हो सकता।
इस निर्णय से न्यायपालिका में पारदर्शिता और समान अवसर को बढ़ावा देने का स्पष्ट संदेश गया।
मामला 4: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग बनाने का निर्देश—सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
ट्रिब्यूनल सुधार कानून को लेकर चल रही बहस में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ा संदेश दिया। अदालत ने कहा कि:
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विभिन्न ट्रिब्यूनलों से जुड़े हजारों मामले अभी भी लंबित हैं।
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सरकार को ऐसे सुधार करने होंगे जो अदालत की चिंताओं को दूर करें।
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जब तक अदालत की बातों का सम्मान नहीं होता, संसद को इस विषय पर नया कानून लाने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण निर्देश:
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunal Commission) बनाने को कहा।
यह आयोग निम्न कार्य करेगा:
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ट्रिब्यूनलों में नियुक्तियों को पारदर्शी बनाएगा
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न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा
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उनके कामकाज की निगरानी करेगा
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सुधारों की दिशा तय करेगा
अदालत ने याद दिलाया कि इससे पहले भी 2021 में वित्त अधिनियम की कुछ धाराओं को असंवैधानिक घोषित किया था क्योंकि वे न्यायालयों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करती थीं।
सुप्रीम कोर्ट की इस सप्ताह की टिप्पणियां स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि भारत की शीर्ष अदालत समाज, न्याय और समानता को मजबूत करने की दिशा में गंभीर कदम उठाने को तैयार है। चाहे महिलाओं के अधिकार हों, तलाक की पुरानी प्रथाएं हों, या न्यायपालिका की पारदर्शिता—अदालत ने संकेत दिया है कि अब पुरानी व्यवस्थाओं की जगह आधुनिक और न्यायपूर्ण प्रणाली को देना ही समय की मांग है।


















