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स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी का संदेश: गोपाष्टमी पर गौमाता की सेवा, श्रद्धा और संरक्षण का आह्वान

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AIN NEWS 1 नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2025 — हिंदू जागरण मंच के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी जी महाराज ने गोपाष्टमी महोत्सव के पावन अवसर पर देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि —

“गोपाष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह गौमाता के प्रति हमारी श्रद्धा, सेवा और समर्पण का प्रतीक है। गौमाता हमारे धर्म, अर्थ, स्वास्थ्य और समृद्धि की मूल आधार हैं। उनके चरणों में अन्न, धन, सौभाग्य और कल्याण का वास है।”

उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से प्रार्थना की कि गौमाता की कृपा से हर हृदय में करुणा, शक्ति और समृद्धि का प्रकाश फैले।

गोपाष्टमी का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व

भारतीय पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी कहा जाता है। यह दिन गो दर्शन और गो पूजन के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है।
स्वामी आनंदेश्वरानंद जी ने बताया कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी तिथि को पहली बार गायों को चराने (गोचारण) का व्रत लिया था और अपने जीवन को “गो सेवा” के लिए समर्पित कर दिया था।

श्रीकृष्ण ने गायों से अपने गहरे प्रेम को व्यक्त करते हुए कहा था—

“गावो मे अग्रत: सन्तु, गावो मे सन्तु पृष्ठत:, गावो मे परित: सन्तु, गवां मध्यमे वसाम्यहम्।”

अर्थात् — “मेरे आगे, पीछे और चारों ओर केवल गायें हों; मैं गायों के मध्य ही निवास करता हूँ।”
इसी भाव के कारण भगवान श्रीकृष्ण को “गोपाल” कहा गया — “गां पालयति इति गोपालः” — अर्थात जो गौ की रक्षा करता है वही सच्चा गोपाल है।

गोपाष्टमी: सेवा और समर्पण का पर्व

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी ने कहा कि जब श्रीकृष्ण मात्र आठ वर्ष के थे, तब उन्होंने पहली बार गायों को चराने का कार्य आरंभ किया। तभी से प्रत्येक अष्टमी तिथि को गायों की पूजा और सेवा की परंपरा चल पड़ी।
भारतीय संस्कृति में गोपाष्टमी को “गो लक्ष्मी पूजन दिवस” के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि अष्ट लक्ष्मियों में से एक “गो लक्ष्मी” के रूप में गौमाता का उल्लेख मिलता है।

उन्होंने बताया कि इस दिन न केवल गायों की पूजा होती है, बल्कि ग्वालों (गोपालकों) — जो दिन-रात गौ सेवा में लगे रहते हैं — उनका भी सम्मान किया जाता है। यह परंपरा द्वापर युग से लेकर आज तक अक्षुण्ण रूप से चलती आ रही है।

कैसे करें गोपाष्टमी के दिन गौ सेवा और पूजन

स्वामी आनंदेश्वरानंद जी ने भक्तों को बताया कि इस दिन गायों का सच्चे मन से पूजन करना चाहिए।
उन्होंने कहा —

“गायों के माथे पर चंदन या तिलक लगाकर, उन्हें पुष्पमाला पहनाएं, उनके शरीर पर गंध लगाकर उनकी आरती करें। हरा चारा, गुड़, दलिया या हलुवा खिलाएं। यही गौमाता के प्रति हमारी सच्ची भक्ति है।”

उन्होंने यह भी कहा कि गायों की परिक्रमा करें, उन्हें पानी पिलाएं और गोशाला में सेवा का संकल्प लें। शास्त्रों में गो सेवा और गो पूजन के लाभों का विस्तृत वर्णन मिलता है —

“गवां कण्डूयनान्मर्त्य: सर्वं पापं व्यपोहति, तासां ग्रास प्रदानेन महत्पुण्यमवाप्नुयात्।”

अर्थात — जो व्यक्ति गौमाता को भोजन कराता है या उनकी सेवा करता है, वह महान पुण्य प्राप्त करता है और उसके सभी पाप दूर होते हैं।

‘गोग्रास’ की परंपरा को पुनर्जीवित करें

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी जी ने समाज से एक भावनात्मक अपील की —

“हम सबको प्रतिदिन भोजन करने से पहले गौमाता के लिए ‘गोग्रास’ निकालने की परंपरा को फिर से जीवित करना चाहिए। यह सनातन परंपरा हमारे घरों में फिर से जागृत होनी चाहिए।”

उन्होंने सुझाव दिया कि हर परिवार अपने घर में एक छोटा गुल्लक रखे, जिसमें रोज़ दस रुपये का सिक्का या नोट गौ सेवा के लिए डाला जाए।

“हम इस गोग्रास अभियान का शुभारंभ इसी गोपाष्टमी के दिन करें और इसे देशव्यापी संस्कार बनाएं।”

उन्होंने कहा कि यदि हर घर से प्रतिदिन थोड़ी-सी राशि गौ सेवा के लिए निकले, तो न केवल गोशालाओं की स्थिति सुधरेगी, बल्कि समाज में करुणा और एकता की भावना भी मजबूत होगी।

गोपाष्टमी का सांस्कृतिक संदेश

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी ने कहा कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि ‘विश्व की माता’ हैं —

“गावो विश्वस्य मातरः” — अर्थात गाय सम्पूर्ण विश्व की माता है।

उन्होंने कहा कि गोपाष्टमी हमें यह सिखाती है कि जब तक गौमाता सुरक्षित और सम्मानित हैं, तब तक भारतीय संस्कृति जीवित है। गो सेवा से न केवल धर्म की रक्षा होती है, बल्कि यह प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण का भी माध्यम है।

“गौमाता की सेवा से ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। गो सेवा के बिना धर्म अधूरा है।”

वंदे धेनु मातरम्

अंत में स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरी ने सभी गौभक्तों और देशवासियों से निवेदन किया —

“गौमाता का आशीर्वाद हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। आइए, हम सब मिलकर गौमाता की सेवा, संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लें। यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा का मार्ग है।”

उन्होंने अपना संदेश “वंदे धेनु मातरम्” के जयघोष के साथ समाप्त किया।

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