AIN NEWS 1: 1996 में हुए मोदीनगर–गाजियाबाद बस बम धमाके को देश आज भी दर्द और सदमे के साथ याद करता है। उत्तर प्रदेश में हुई इस भयावह वारदात में 18 निर्दोष लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह वह समय था जब आतंकवाद के नाम पर देश में लगातार दहशत का माहौल बना हुआ था, और इस हमले ने उस डर को और गहरा कर दिया था।

लेकिन इस घटना के 28 वर्ष बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरी कानूनी प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए। हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी बनाए गए मोहम्मद इलियास को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि किसी को सिर्फ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, और जब तक पुख्ता सबूत नहीं हों, तब तक कानून के तहत किसी आरोपी को सजा देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
घटना जिसने पूरे देश को हिला दिया
13 जून 1996 को मोदीनगर से गाजियाबाद जा रही एक सामान्य बस में अचानक जोरदार धमाका हुआ। बस यात्रियों से भरी हुई थी—दफ्तरों से लौटते लोग, घर वापसी कर रहे छात्र, और रोज़मर्रा के कामकाज के लिए आने-जाने वाले आम नागरिक।
धमाके में चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। बस के अंदर का दृश्य बेहद भयावह था—कुछ यात्रियों की मौके पर ही मौत हो गई, कई घायल लोगों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। बाद में आंकड़ों से पता चला कि इस विस्फोट में 18 लोगों की जान चली गई और दर्जनों लोग जिंदगी भर के लिए घायल हो गए।
यह धमाका अपनी क्रूरता और बड़े पैमाने पर हुए नुकसान के कारण तुरंत राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इसे आतंकवादी हमला माना और जांच तुरंत शुरू कर दी।
जांच और आरोपी इलियास की गिरफ्तारी
धमाके के बाद यूपी पुलिस की जांच टीमों ने कई संदिग्धों को हिरासत में लिया। इस प्रक्रिया में मोहम्मद इलियास नाम के शख्स का नाम सामने आया। पुलिस ने उन पर आरोप लगाया कि बस में लगाया गया बम उसी ने रखा था।
ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर इलियास को दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें सजा भी सुनाई। लेकिन इलियास लगातार खुद को बेकसूर बताते रहे और फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी।
28 साल बाद मिला फैसला
28 साल का लंबा इंतजार खत्म करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस केस की दोबारा गहराई से समीक्षा की। अदालत ने पाया कि—
अभियोजन पक्ष इलियास के खिलाफ ठोस, प्रत्यक्ष या तकनीकी सबूत पेश नहीं कर पाया।
गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे।
मौके से मिले कथित साक्ष्य अदालत में टिक नहीं पाए।
इलियास का नाम घटनास्थल से जोड़ने वाले सबूत ‘अनुमान’ अधिक और कम थे।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने कहा कि “किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक कि उसके खिलाफ भरोसेमंद और मजबूत सबूत न हों।”
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इसने पूरे समाज को झकझोर दिया था, लेकिन न्याय केवल भावनाओं के आधार पर नहीं दिया जा सकता।
फैसला सुनाते हुए जज ने लिखा कि वे ‘भारी मन से’ इलियास को बरी कर रहे हैं, क्योंकि अदालत की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह सिर्फ कानूनी सबूतों के आधार पर ही निर्णय दे।
इलियास को बरी किए जाने का मतलब क्या है?
इस फैसले का एक बड़ा कानूनी महत्व है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि—
आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में भी न्याय के सिद्धांत नहीं बदल सकते
केवल पुलिस की कहानी या संदेह पर्याप्त नहीं
अभियोजन पक्ष पर जिम्मेदारी है कि वह मजबूत, वैज्ञानिक और भरोसेमंद सबूत पेश करे
कानून कहता है कि यदि आरोपी के दोषी होने में ‘वाजिब शक’ भी हो, तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी सिद्धांत के आधार पर इलियास को राहत मिली।
पीड़ित परिवारों का दर्द फिर ताज़ा
इस फैसले ने जहां एक ओर इलियास और उसके परिवार के लिए राहत की सांस दी, वहीं इस हमले में अपनों को खो चुके परिवारों के जख्म फिर हरे कर दिए।
बहुत से परिवारों ने यह सवाल उठाया कि 18 लोगों की जान लेने वाले असली अपराधी आखिर कौन थे? क्या न्याय प्रणाली उन्हें कभी पकड़ पाएगी?
28 साल बाद बरी हो गया एक आरोपी—लेकिन पीड़ित परिवारों का दर्द आज भी वहीं का वहीं है।
न्याय बनाम सबूत—एक मुश्किल संतुलन
यह मामला यह भी दिखाता है कि न्याय सिर्फ ‘किसी को सजा देने’ का नाम नहीं, बल्कि ‘सही व्यक्ति को सजा देने’ का नाम है।
यदि बिना सबूत किसी को दोषी ठहराने की शुरुआत हो जाए, तो यह न्याय व्यवस्था की जड़ें कमजोर कर देगा। इसलिए अदालतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले से यह संदेश दिया कि न्याय व्यवस्था भावनाओं से नहीं, तथ्यों और सबूतों से चलती है।
The 1996 Modinagar-Ghaziabad bus bomb blast case, which killed 18 people and injured dozens, has taken a major legal turn after the Allahabad High Court acquitted Mohammad Ilyas due to lack of evidence. The judgement highlights the importance of strong proof in terror cases and reflects how the Indian justice system evaluates evidence before declaring guilt. This decision also brings renewed focus to the long-pending investigations related to the Modinagar blast, Ghaziabad terror attack, and other similar incidents.


















