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इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: नेहा सिंह राठौर की FIR रद्द करने की याचिका खारिज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गहरी बहस!

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AIN NEWS 1: भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि हर नागरिक को बोलने और लिखने की आज़ादी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आज़ादी पूरी तरह निरंकुश है? क्या कोई भी व्यक्ति किसी संवैधानिक पदाधिकारी या प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ कुछ भी लिख या बोल सकता है? इसी सवाल पर हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक बड़ा फैसला सामने आया है।

लोकप्रिय लोकगायिका नेहा सिंह राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने उनकी FIR रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स से जुड़ा है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल करने का आरोप है।

मामला कैसे शुरू हुआ?

अप्रैल 2025 में लखनऊ के हजरतगंज थाने में नेहा सिंह राठौर के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। उनका एक सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले के संदर्भ में राजनीतिक और धार्मिक टिप्पणियाँ की थीं।

एफआईआर में आरोप लगाया गया कि:

पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी का नाम अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल किया गया।

धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक मुद्दों को आपस में मिलाया गया।

बयान से समाज में असंतोष और भ्रम फैल सकता है।

नेहा सिंह राठौर की दलीलें

एफआईआर के खिलाफ नेहा सिंह राठौर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा:

उनका इरादा किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का नहीं था।

लोकतंत्र में सवाल पूछना और टिप्पणी करना हर नागरिक का अधिकार है।

यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Right to Freedom of Speech and Expression) से जुड़ा है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उन पर दर्ज FIR राजनीतिक दबाव में की गई कार्रवाई है क्योंकि वे अक्सर सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करती रही हैं।

हाईकोर्ट का आदेश

19 सितंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने सुनवाई पूरी करने के बाद स्पष्ट कहा कि:

नेहा सिंह राठौर ने अपने पोस्ट्स में प्रधानमंत्री मोदी का नाम “derogatory and disrespectful” तरीके से इस्तेमाल किया।

प्रथम दृष्टया (prima facie) अपराध के तत्व मौजूद हैं, इसलिए एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता।

सोशल मीडिया जैसे सार्वजनिक मंच पर संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणी करते समय जिम्मेदारी की आवश्यकता है।

कोर्ट ने आदेश दिया कि नेहा सिंह राठौर को 26 सितंबर 2025 को जांच अधिकारी के सामने पेश होना होगा और पूरी तरह से जांच में सहयोग करना होगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम कानूनी जिम्मेदारी

भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) में कुछ प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जैसे:

राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ बयान देना।

सार्वजनिक व्यवस्था (public order) भंग करना।

किसी की मानहानि करना।

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना।

नेहा सिंह राठौर का मामला इसी दायरे में आ गया क्योंकि उनके बयानों में प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद का उल्लेख अपमानजनक तरीके से किया गया था।

राजनीतिक असर

नेहा सिंह राठौर के गीत और बयान अक्सर सत्ताधारी दल की आलोचना करते रहे हैं। कई बार विपक्षी पार्टियाँ उनके गानों को हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं। इसलिए इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई।

समर्थक पक्ष: इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं कर रही।

विरोधी पक्ष: कह रहा है कि लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि प्रधानमंत्री या किसी भी संवैधानिक पद का अपमान किया जाए।

सामाजिक प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर लोगों में गहरी बहस छिड़ गई है।

कई लोग इसे एक “चेतावनी” मान रहे हैं कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय ज़िम्मेदारी ज़रूरी है।

वहीं, कुछ लोग मानते हैं कि यह लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ दबाने का तरीका है।

नेहा सिंह राठौर के फॉलोअर्स उन्हें “सत्ता से टकराने वाली आवाज़” मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें “प्रचार पाने के लिए विवाद खड़ा करने वाली शख्सियत” बताते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानून के जानकारों का कहना है कि यह मामला एक मिसाल बन सकता है।

अगर अदालत FIR को रद्द कर देती, तो भविष्य में कोई भी व्यक्ति संवैधानिक पदाधिकारियों के खिलाफ बेधड़क अपमानजनक बातें कर सकता।

वहीं, FIR को बरकरार रखकर अदालत ने यह संदेश दिया है कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की भी सीमाएँ हैं।

लोकतंत्र और सोशल मीडिया की चुनौती

सोशल मीडिया ने हर नागरिक को आवाज़ दी है। पहले जहाँ केवल पत्रकार या नेता अपनी बात रखते थे, अब कोई भी व्यक्ति कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुँच सकता है।

लेकिन यही आज़ादी कई बार गलत जानकारी फैलाने या व्यक्तिगत अपमान तक पहुँच जाती है। नेहा सिंह राठौर का मामला इसी चुनौती का हिस्सा है — कि लोकतंत्र और सोशल मीडिया में संतुलन कैसे बनाया जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला नेहा सिंह राठौर के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया, अदालत ने उसकी सीमाएँ स्पष्ट कर दीं।

यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि:

लोकतंत्र में आलोचना की आज़ादी होनी चाहिए।

लेकिन यह आज़ादी दूसरों का अपमान करने का अधिकार नहीं देती।

सोशल मीडिया पर हर शब्द का असर लाखों लोगों तक पहुँचता है, इसलिए ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

अब सभी की नज़रें पुलिस जांच और आगे की कानूनी कार्यवाही पर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि नेहा सिंह राठौर के इस विवादास्पद मामले का अंत किस रूप में होता है।

The Allahabad High Court’s refusal to quash the FIR against folk singer Neha Singh Rathore has sparked a heated debate across India. The FIR, linked to her controversial social media posts on the Pahalgam terror attack, accused her of using the name of Prime Minister Narendra Modi in a derogatory manner. While Neha Singh Rathore argued this falls under freedom of speech, the High Court stressed that derogatory remarks against constitutional figures cannot be overlooked. This article provides a detailed analysis of the legal, political, and social aspects of the Neha Singh Rathore case, exploring how free speech and accountability intersect in Indian democracy.

 

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