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80 साल के पिता ने बेटों को सिखाया अनमोल सबक – जब बेटे छोड़ गए, तो उन्होंने कर दिखाया ऐसा काम जो पीढ़ियों को याद रहेगा!

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AIN NEWS 1: भारत में परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा होता है। लेकिन समय बदल रहा है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, आत्मकेंद्रित सोच और लालच ने इन रिश्तों की आत्मा को जैसे कहीं छिपा दिया है।

इसी बदलती सोच का एक करारा जवाब दिया एक 80 साल के बुजुर्ग पिता ने, जिन्होंने अपने बेटों को ऐसा सबक सिखाया कि आने वाली पीढ़ियाँ भी उसे याद रखेंगी।

 पिता और उनके पांच बेटे

कहानी की शुरुआत एक छोटे से कस्बे से होती है, जहाँ एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। उम्र 80 के करीब थी। शरीर कमजोर, पर आत्मा अब भी मजबूत।

उनके पाँच बेटे थे — सभी शिक्षित, स्थापित, और अपनी-अपनी पत्नियों के साथ शहरों में बस चुके थे।

वो बेटे जिनके बचपन में इस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी थी — खेतों में मेहनत, दिन-रात काम, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और भविष्य सुरक्षित हो सके।

पर अब वही पिता अकेले थे।

बूढ़े हाथ कांपते थे, आंखों की रोशनी कमजोर हो चुकी थी, और खाना बनाना भी मुश्किल हो गया था।

पिता की गुहार और बेटों की बेरुखी

एक दिन पिता ने फोन करके अपने बेटों से कहा,

“बेटा, अब उम्र हो गई है… खाना बनाना, दवा लेना सब मुश्किल हो गया है। कोई मुझे अपने साथ रख ले, मैं ज़्यादा नहीं मांगता।”

लेकिन हर बेटे ने एक ही जवाब दिया —

“पापा, घर छोटा है, बच्चे हैं, पत्नी को दिक्कत होगी।”

पाँचों ने किसी न किसी बहाने से इनकार कर दिया।

कुछ ने कहा – “हम नौकरी में व्यस्त हैं।”

कुछ ने कहा – “पिताजी, आप किसी नौकर को रख लीजिए।”

और कुछ ने तो सीधे कहा – “हमारी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं।”

यह सुनकर पिता के दिल में एक अजीब सन्नाटा छा गया।

उन्होंने वो दिन याद किया जब किसी बेटे को बुखार आता था, तो वे सारी रात जागकर उसकी सेवा करते थे।

और आज, जब उन्हें सिर्फ थोड़ी सी देखभाल चाहिए थी — सब दूर चले गए।

मंदिर का रास्ता और एक निर्णय

कुछ दिन तक उन्होंने अकेले रहने की कोशिश की। लेकिन वृद्ध शरीर और टूटी आत्मा के साथ यह आसान नहीं था।

एक दिन वे पास के मंदिर गए — वही मंदिर जहाँ वे बचपन से पूजा करने जाया करते थे।

वहाँ उन्होंने पुजारी से कहा,

“अब लगता है, भगवान ही मेरे सच्चे सहारे हैं।”

धीरे-धीरे उन्होंने मंदिर में समय बिताना शुरू किया। वहीं बैठते, भगवान से बातें करते, और आने-जाने वाले लोगों की मदद करते।

लेकिन एक दिन उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया —

उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति — घर, खेत और जमा पूंजी — बेचकर उस मंदिर को दान कर दी।

कुल मूल्य लगभग 5 करोड़ रुपये था।

मंदिर समिति पहले तो हैरान रह गई, लेकिन जब उन्होंने पिता की कहानी सुनी, तो सभी की आंखें नम हो गईं।

जीवन का नया अध्याय

दान के बाद पिता ने कहा —

“जब मेरे अपने बेटों को मेरे लिए जगह नहीं मिली, तो अब भगवान का घर ही मेरा घर होगा।”

उन्होंने मंदिर परिसर में एक छोटा कमरा ले लिया।

अब वही उनका घर था।

सुबह आरती में हाथ जोड़ना, शाम को दीप जलाना, भक्तों को प्रसाद बांटना — यही उनकी नई दिनचर्या बन गई।

लोग दूर-दूर से उन्हें मिलने आने लगे।

कोई कहता, “बाबा, आपने बड़ा काम किया।”

कोई कहता, “आपने सबको सबक सिखा दिया।”

पर पिता हमेशा मुस्कुराकर जवाब देते,

“मैंने किसी को सज़ा नहीं दी, बस खुद को भगवान के हवाले कर दिया।”

बेटों की समझ बहुत देर से आई

समय बीता।

जब बेटों को पता चला कि पिता ने सारी संपत्ति मंदिर को दान कर दी है, तो वे गुस्से में आग-बबूला हो गए।

सभी मंदिर पहुंचे और पुजारी से पूछा,

“ये कैसे हो सकता है? वो तो हमारी विरासत थी!”

पुजारी ने शांति से उत्तर दिया,

“विरासत तो वह होती है जिसे आप संजोते हैं, न कि जिसे आप ठुकराते हैं। आपके पिता ने इसे समाज की सेवा में लगा दिया है।”

उस दिन बेटों के सिर झुक गए।

उन्होंने पिता को देखा — साधारण कपड़ों में, पर चेहरे पर गहरी शांति थी।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उन्होंने क्या खो दिया है।

एक पीढ़ी के लिए सबक

यह कहानी केवल एक पिता की नहीं है — यह उन सभी माता-पिता की कहानी है, जो अपने बच्चों के लिए सब कुछ कर देते हैं, पर वृद्धावस्था में उपेक्षित हो जाते हैं।

इस बुजुर्ग का निर्णय समाज के लिए एक आईना है।

उन्होंने न किसी से बदला लिया, न कटु शब्द बोले — बस अपनी अंतिम संपत्ति भगवान को समर्पित कर दी।

यह सिर्फ दान नहीं था, यह एक संदेश था —

“अगर तुम्हें अपने मां-बाप की कद्र नहीं है, तो उनकी मेहनत की कमाई की भी तुम्हें कोई हक नहीं।”

समाज की प्रतिक्रिया

जब यह घटना लोगों तक पहुँची, तो कई जगहों पर चर्चा हुई।

कई लोगों ने कहा — “यह तो हर उस बच्चे के लिए चेतावनी है जो अपने माता-पिता को बोझ समझते हैं।”

कुछ लोगों ने तो इसे एक जीवंत उदाहरण बताया कि भगवान का घर हमेशा खुला रहता है, जब इंसान का घर बंद हो जाता है।

समाज में इस कहानी के बाद कई परिवारों में बदलाव भी देखा गया।

लोग अपने वृद्ध माता-पिता को घर वापस लाने लगे।

कई मंदिरों ने वृद्ध लोगों के लिए सेवा केंद्र शुरू किए।

यह कहानी भले ही व्यक्तिगत हो, लेकिन इसका असर सामूहिक हुआ।

बुजुर्ग पिता का संदेश

अपने जीवन के अंतिम दिनों में जब किसी पत्रकार ने उनसे पूछा,

 “क्या आपको अपने बेटों से शिकायत है?”

वो मुस्कुराए और बोले —

 “नहीं बेटा, शिकायत क्यों करूँ? उन्होंने मुझे भगवान के करीब ला दिया।”

उनके शब्दों में इतनी गहराई थी कि सुनने वाले की आँखें भर आईं।

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माता-पिता सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आशीर्वाद होते हैं।

अगर हम उनका सम्मान नहीं करेंगे, तो हमारी अगली पीढ़ी भी हमसे वही व्यवहार सीखेगी।

कभी-कभी भगवान इंसान को सबसे कठिन रास्ते पर इसलिए भेजता है, ताकि वह दूसरों को सही राह दिखा सके।

इस बुजुर्ग पिता ने यही किया —

उन्होंने अपने दर्द को सबक में बदल दिया,

अपनी तन्हाई को सेवा में,

और अपनी संपत्ति को प्रेरणा में।

अंतिम पंक्तियाँ

जो लोग माता-पिता को बोझ समझते हैं, उन्हें यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए।

यह केवल भावनाओं की कहानी नहीं — यह जीवन दर्शन है।

क्योंकि संपत्ति खत्म हो सकती है, पर माता-पिता का आशीर्वाद अमूल्य होता है।

लेखक की टिप्पणी:

यह कहानी सिर्फ एक उदाहरण है, जो समाज में व्याप्त वास्तविक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है। यह जरूरी नहीं कि घटनाएँ पूरी तरह वास्तविक हों, लेकिन इससे मिलने वाला सबक निस्संदेह वास्तविक और प्रेरक है।

This emotional real-life story of an 80-year-old Indian father teaches a powerful life lesson about respect for parents and moral values in families. After being abandoned by his five sons, the elderly man decided to donate his property worth ₹5 crore to a temple, dedicating his life to spiritual service. This story highlights the growing issue of elder neglect, family disconnection, and the importance of gratitude and responsibility towards parents — a timeless message for modern Indian society.

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