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सहमति से बने संबंधों पर ब्रेकअप के बाद रेप केस दर्ज नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला!

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AIN NEWS 1: सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार से जुड़े मामलों पर एक बेहद अहम और साफ-सुथरा फैसला सुनाया है, जिसने कई ऐसे विवादित मामलों पर स्पष्टता ला दी है, जहां प्रेम संबंध टूटने के बाद पुरुषों पर रेप के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अदालत ने कहा कि अगर दो वयस्क अपनी मर्जी से, यानी पूरी सहमति के साथ, शारीरिक संबंध बनाते हैं और बाद में उनका रिश्ता किसी भी कारण से खत्म हो जाता है, तो इस स्थिति में पुरुष के खिलाफ बलात्कार का मामला नहीं बन सकता।

यह फैसला उन परिस्थितियों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां ब्रेकअप या रिश्ते में तनाव के बाद आरोप लगाए जाते हैं। अदालत ने साफ कहा है कि ऐसे मामलों को रेप की श्रेणी में रखना कानून का गलत उपयोग माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सहमति से बना संबंध, चाहे वह कितने भी समय तक चला हो, अगर वह दोनो पक्षों की इच्छा से हुआ है, तो बाद में उसी को अपराध बताकर किसी एक पक्ष को अपराधी नहीं बनाया जा सकता।

मामला क्या था?

यह फैसला उस मामले के दौरान आया जिसमें एक महिला ने अपने पूर्व साथी पर रेप का आरोप लगाया था। महिला का कहना था कि आरोपी ने शादी का वादा करके उसके साथ संबंध बनाए और बाद में शादी करने से मुकर गया। हालांकि जांच और केस की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए, जिनसे स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध थे और रिश्ते में आई दरार ही झगड़े की असली वजह थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि रिश्ते का टूटना किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता। प्रेम संबंध टूटना एक निजी और भावनात्मक मामला है, लेकिन इसे बलात्कार की कानूनी परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता।

सहमति की कानूनी समझ

अदालत ने सहमति (consent) की अवधारणा पर भी विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि सहमति तभी मानी जाती है जब दोनों पक्ष अपनी पूरी इच्छा और समझ के साथ किसी रिश्ते या शारीरिक संबंध में शामिल हों। अगर किसी ने बिना दबाव, लालच या धमकी के संबंध बनाए हों, तो उसे बाद में अपराध नहीं कहा जा सकता।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि हर ब्रेकअप के बाद पुरुष पर रेप का आरोप लगा देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसी शिकायतें न सिर्फ अदालत का कीमती समय खराब करती हैं, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के न्याय पर भी असर डालती हैं।

कोर्ट ने कहा—झूठे वादे और सहमति में अंतर समझना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “शादी का वादा” और “झूठा वादा देकर शारीरिक संबंध बनाना” दो अलग स्थितियाँ हैं।

अगर कोई व्यक्ति शुरुआत से ही शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन झूठा वादा देकर संबंध बनाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

लेकिन अगर दो लोग रिश्ते में थे और भविष्य में शादी की संभावना थी, लेकिन बाद में आपसी मतभेदों के कारण शादी नहीं हो पाई, तो इसे रेप नहीं कहा जा सकता।

यही अंतर इस मामले में भी देखा गया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने महिला को धोखा देने का कोई प्रमाण नहीं था, बल्कि रिश्ते में आई दूरियाँ ही ब्रेकअप का कारण थीं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

सालों से ऐसे कई मामले अदालतों में आते रहे हैं, जहां प्रेम संबंध टूटने के बाद पुरुषों पर रेप के आरोप लगाए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक व्यवस्था को संतुलित करेगा और कानून का सही उपयोग सुनिश्चित करेगा।

यह निर्णय:

रिश्तों में सहमति की अवधारणा को मजबूत करता है

झूठे या अतिशयोक्तिपूर्ण मामलों पर रोक लगाता है

पुरुषों के खिलाफ होने वाले गलत कानूनी उपयोग को भी पहचान देता है

अदालत के समय को वास्तविक मामलों के लिए बचाता है

कानून का दुरुपयोग भी गंभीर समस्या

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेप जैसे गंभीर अपराध का इस्तेमाल बदले की भावना से या निजी विवादों में हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अगर ऐसे मामले बढ़ते रहे, तो इससे वास्तविक रेप पीड़ितों की आवाज दब जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और अदालतों को प्रारंभिक जांच के दौरान ही यह समझना चाहिए कि मामला सहमति का है या जबरदस्ती का। इससे कई निर्दोष लोग अनावश्यक कानूनी झंझट से बच सकते हैं।

आरोपी को मिली राहत

अदालत के अंतिम फैसले में आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और केस को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में रेप का आरोप टिक ही नहीं सकता, इसलिए अभियुक्त को दोषी नहीं माना जा सकता।

यह फैसला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसे एक बड़े कानूनी सुधार के रूप में देखा जा रहा है।

The Supreme Court of India has delivered a significant judgment stating that a breakup after a consensual relationship cannot be treated as a rape case. This landmark ruling clarifies the legal meaning of consent, eliminates misuse of rape laws, and provides an important legal update for the Indian judiciary. The court emphasized that consensual relationships between adults cannot be criminalized simply because the relationship ends. This Supreme Court verdict strengthens clarity in Indian law and sets a crucial precedent for future rape case judgments.

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