एसआईआर विवाद: यूपी भाजपा में सरकार बनाम संगठन, पंकज चौधरी ने मतदाता कटौती का ठीकरा सरकार पर फोड़ा
AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर खड़ा हुआ है। यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक या चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने भारतीय जनता पार्टी के भीतर सरकार और संगठन के बीच छिपे तनाव को खुलकर सामने ला दिया है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के बयानों ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।
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🔹 SIR को लेकर खुला टकराव कैसे शुरू हुआ?
एसआईआर के दौरान उत्तर प्रदेश में लगभग चार करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटने की चर्चा सामने आई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके लिए पार्टी संगठन की भूमिका पर सवाल उठाए। उनका संकेत साफ था कि संगठन स्तर पर जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई गई।
लेकिन इस बयान के कुछ ही दिनों बाद, पंकज चौधरी ने सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री की लाइन से अलग रुख अपनाया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“एसआईआर की जिम्मेदारी सरकार की है। ड्राइविंग सीट पर सरकार बैठी है, संगठन केवल सहयोग कर सकता है।”
यह बयान 13 जनवरी को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में प्रदेशभर से आए भाजपा कार्यकर्ताओं के सामने दिया गया, और खास बात यह रही कि यह बयान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के तुरंत बाद सामने आया।
🔹 सरकार बनाम संगठन: संकेत क्या कहते हैं?
राजनीतिक गलियारों में इस बयान को केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं माना जा रहा। इसे भाजपा के भीतर ‘टीम योगी’ और ‘टीम गुजरात’ के बीच खींचतान के रूप में देखा जा रहा है।
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पंकज चौधरी का यह कहना कि “ताली एक हाथ से नहीं बजती” और बीएलओ-2 बनाए गए कुछ कार्यकर्ताओं की “लापरवाही और दगाबाजी” का जिक्र करना, इस बात का संकेत है कि संगठन खुद को पूरी तरह जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं है।
🔹 पंकज चौधरी का प्रदेश दौरा और जमीनी हकीकत
27 दिसंबर से पंकज चौधरी ने मथुरा से अपना प्रदेश दौरा शुरू किया।
उन्होंने—
ब्रज क्षेत्र
पश्चिमी उत्तर प्रदेश
गोरखपुर
काशी
अवध
जैसे क्षेत्रों का दौरा किया और जिलाध्यक्षों व क्षेत्रीय पदाधिकारियों से सीधा संवाद किया।
इस दौरान उन्हें जो सबसे बड़ी शिकायत सुनने को मिली, वह थी—
कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और प्रशासनिक फैसलों में संगठन की अनदेखी।
कई कार्यकर्ताओं ने बताया कि एसआईआर को लेकर प्रचार तो खूब हुआ, लेकिन स्थानीय स्तर पर समन्वय पूरी तरह नदारद रहा।
🔹 “मैं कार्यकर्ताओं के लिए लड़ूंगा भी और अड़ूंगा भी”
पंकज चौधरी लगातार एक पंक्ति दोहरा रहे हैं—
“मैं कार्यकर्ताओं के लिए लड़ूंगा भी और अड़ूंगा भी।”
यह नारा कार्यकर्ताओं में उत्साह तो भर रहा है, लेकिन साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है—
जब सरकार और संगठन दोनों भाजपा के ही हैं, तो यह लड़ाई किससे है?
यही सवाल पार्टी के भीतर बढ़ते भ्रम और असंतोष को दर्शाता है।
🔹 2024 लोकसभा चुनाव और मतदाता सूची की गड़बड़ियां
लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को उत्तर प्रदेश में उम्मीद से कम सीटें मिलीं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसकी एक बड़ी वजह थी—
मतदाता सूची में भारी अव्यवस्था।
कई लोकसभा क्षेत्रों में यह स्थिति सामने आई कि—
पोलिंग पार्टियों के पास मौजूद सूची में हजारों नामों के आगे “डिलीट” लिखा था
जबकि पार्टी और प्रत्याशियों की सूची में वही मतदाता मौजूद थे
इससे न केवल मतदान प्रतिशत प्रभावित हुआ, बल्कि चुनावी रणनीति और बूथ प्रबंधन भी पूरी तरह चरमरा गया।
🔹 भविष्य का डर और जिम्मेदारी तय करने की कोशिश
भाजपा नेतृत्व को आशंका है कि यदि एसआईआर में यही हाल रहा, तो आने वाले विधानसभा और निकाय चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसी वजह से पंकज चौधरी ने साफ कर दिया है कि—
प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकार की है
संगठन पर भविष्य में दोष न आए, इसके लिए अभी से स्थिति स्पष्ट की जा रही है
🔹 गोरखपुर और ‘टीम गुजरात’ की चर्चा
पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही यह चर्चा तेज है कि यह फैसला दिल्ली नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा है।
गोरखपुर से जुड़े कई नेताओं को—
राज्यसभा
केंद्रीय मंत्री
राज्यपाल
राष्ट्रीय संगठन
जैसे पदों पर भेजा गया है।
आलोचकों का कहना है कि एक कैडर आधारित पार्टी में गोरखपुर अब अपवाद बनता जा रहा है, और संगठनात्मक संतुलन बिगड़ रहा है।
🔹 प्रशासन बनाम पार्टी: बढ़ता तनाव
11 जनवरी को चुनाव आयोग ने सभी बूथों पर विशेष शिविर लगाए, लेकिन कई जगह—
भाजपा संगठन को समय पर जानकारी नहीं मिली
बीएलए (Booth Level Agent) मौजूद नहीं रहे
इसको लेकर कई जिलाध्यक्षों ने शिकायत दर्ज कराई है।
इसके अलावा—
एक ही परिवार के सदस्यों के नाम अलग-अलग बूथों पर
मृत, स्थानांतरित और गैरमौजूद मतदाताओं (ASD) की सूची में गंभीर त्रुटियां
जैसे मुद्दों ने विवाद को और गहरा कर दिया है।
🔹 सबसे ज्यादा नाराज़: भाजपा का आम कार्यकर्ता
इन सबके बीच सबसे ज्यादा हताश नजर आता है भाजपा का जमीनी कार्यकर्ता।
उनका कहना है—
2017 और 2022 में सत्ता आई, लेकिन
न सम्मान मिला
न निगम, बोर्ड, समितियों में हिस्सेदारी
कई कार्यकर्ता आज भी केवल आश्वासन के सहारे काम कर रहे हैं।
🔹 दिल्ली तक पहुंची शिकायतें
सूत्रों के मुताबिक, संगठन हित में काम करने वाले कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने—
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
गृहमंत्री अमित शाह
को ई-मेल के जरिए यूपी संगठन की जमीनी स्थिति और कुछ पदाधिकारियों की कार्यशैली से अवगत कराया है।
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में एसआईआर का मुद्दा संगठनात्मक पुनर्गठन और जवाबदेही तक जा सकता है।
🔹SIR बना असंतोष का आईना
एसआईआर ने उत्तर प्रदेश भाजपा में लंबे समय से दबे असंतोष को उजागर कर दिया है।
अब सवाल यह नहीं है कि गलती किसकी है, बल्कि यह है कि—
क्या सरकार और संगठन मिलकर समाधान निकाल पाएंगे?
या यह टकराव आने वाले चुनावों में और गहरा होगा?
फिलहाल, एसआईआर भाजपा के लिए सिर्फ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्ममंथन की चुनौती बन चुका है।
The SIR controversy in Uttar Pradesh has exposed deep internal tensions within the BJP, as state president Pankaj Chaudhary openly held the government responsible for voter list deletions during the Special Intensive Revision process. The clash between the BJP organization and the Yogi Adityanath government over voter list management, administrative accountability, and coordination has raised serious concerns ahead of upcoming elections. With memories of the 2024 Lok Sabha election setbacks still fresh, the voter list revision issue has become a critical factor influencing BJP’s political strategy, organizational unity, and electoral preparedness in Uttar Pradesh.


















