AIN NEWS 1: प्रयागराज में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आस्था और श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। कड़ाके की ठंड और शीतलहर के बावजूद देश-विदेश से आए 1.03 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम में स्नान कर पुण्य अर्जित किया। सूरज की पहली किरण के साथ ही संगम तट पर हर-हर गंगे और जय संगम के जयघोष गूंजने लगे, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
सर्दी पर भारी पड़ी श्रद्धालुओं की आस्था
जनवरी की सुबह प्रयागराज में तापमान बेहद नीचे था। ठंडी हवाएं चल रही थीं और संगम का जल बर्फ जैसा ठंडा महसूस हो रहा था, लेकिन श्रद्धालुओं की भक्ति के आगे यह सब गौण साबित हुआ। बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और युवा — सभी ने आस्था के साथ संगम में डुबकी लगाई। कई श्रद्धालु रात से ही घाटों पर मौजूद थे ताकि ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सकें।
श्रद्धालुओं का कहना था कि मकर संक्रांति पर संगम स्नान करने से जीवन के सभी पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए ठंड उनके उत्साह को रोक नहीं सकी।
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त्रिवेणी संगम का धार्मिक महत्व
प्रयागराज का संगम स्थल गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन के कारण विशेष धार्मिक महत्व रखता है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे इस दिन संगम में स्नान करने का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष इस अवसर पर लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचते हैं।
सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं का सैलाब
मंगलवार तड़के करीब 3 बजे से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। जैसे-जैसे सूरज निकला, संगम और आसपास के सभी घाटों पर भीड़ बढ़ती चली गई। प्रशासन के अनुसार, दोपहर तक ही स्नानार्थियों की संख्या करोड़ के पार पहुंच चुकी थी। शाम तक यह आंकड़ा 1.03 करोड़ को पार कर गया।
संगम के अलावा अरैल घाट, दारागंज, झूंसी और फाफामऊ जैसे क्षेत्रों में भी श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया।
प्रशासन की व्यापक तैयारियां
इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रयागराज प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए थे।
हजारों पुलिसकर्मी और PAC जवान तैनात रहे
घाटों पर CCTV कैमरों से निगरानी की गई
मेडिकल कैंप, एंबुलेंस और रेस्क्यू टीमें मुस्तैद रहीं
यातायात व्यवस्था के लिए विशेष रूट प्लान लागू किया गया
प्रशासन की सतर्कता के चलते किसी बड़ी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली, जिससे श्रद्धालुओं ने राहत की सांस ली।
कल्पवासियों और साधु-संतों की मौजूदगी
मकर संक्रांति के अवसर पर संगम क्षेत्र में कल्पवासियों और साधु-संतों की भी बड़ी संख्या मौजूद रही। अखाड़ों से जुड़े संतों ने पारंपरिक विधि-विधान से स्नान किया और धर्मोपदेश दिए। कई संतों ने कहा कि आज के समय में जब जीवन भागदौड़ से भरा है, ऐसे पर्व लोगों को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं।
श्रद्धालुओं की जुबानी अनुभव
संगम स्नान के बाद श्रद्धालुओं के चेहरे पर संतोष और शांति साफ दिखाई दे रही थी।
दिल्ली से आई एक महिला श्रद्धालु ने कहा,
“ठंड बहुत है, लेकिन जब संगम में डुबकी लगाई तो मन को अलग ही शांति मिली।”
वहीं बिहार से आए एक बुजुर्ग श्रद्धालु बोले,
“हम हर साल आते हैं। यह सिर्फ स्नान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का अनुभव है।”
स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मिला लाभ
इतने बड़े धार्मिक आयोजन से प्रयागराज की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा लाभ मिला। होटल, धर्मशाला, नाविक, फूल-माला विक्रेता, पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों की अच्छी कमाई हुई। संगम क्षेत्र में मेले जैसा माहौल रहा।
आस्था और परंपरा की जीवंत तस्वीर
मकर संक्रांति का यह आयोजन एक बार फिर यह साबित करता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय समाज की धार्मिक आस्था और परंपराएं पूरी तरह जीवंत हैं। कड़ाके की ठंड, लंबा सफर और भारी भीड़ — कुछ भी श्रद्धालुओं को संगम स्नान से रोक नहीं सका।
प्रयागराज में मकर संक्रांति पर हुआ यह महास्नान न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और परंपराओं की मजबूती को भी दर्शाता है। 1.03 करोड़ श्रद्धालुओं की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि संगम आज भी करोड़ों लोगों के विश्वास का केंद्र बना हुआ है।
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