AIN NEWS 1: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े एक प्रश्न पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा कि देश में बने कानूनों का सम्मान और पालन सभी को करना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि किसी को किसी कानून से आपत्ति है या वह उसे उचित नहीं मानता, तो उसके सुधार या बदलाव का रास्ता भी संविधान के भीतर से ही निकलना चाहिए।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के कई हिस्सों में UGC से जुड़े कुछ नियमों और दिशा-निर्देशों को लेकर बहस चल रही है। छात्र संगठनों, शिक्षकों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। ऐसे माहौल में डॉ. भागवत का यह बयान चर्चा का विषय बन गया है।
कानून का सम्मान ही लोकतंत्र की मजबूती
डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव कानून के शासन पर टिकी होती है। यदि समाज में हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार कानून को मानने या न मानने लगे, तो अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए, जब तक कोई कानून लागू है, तब तक उसका पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। किसी भी कानून या नीति से असहमति रखना गलत नहीं है, लेकिन उसका विरोध भी संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। अदालत, संसद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं इसी उद्देश्य के लिए बनी हैं कि जरूरत पड़ने पर बदलाव संभव हो सके।
UGC और शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को दिशा देने वाली प्रमुख संस्था है। इसके नियम और दिशानिर्देश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लागू होते हैं। हाल के समय में कुछ नए प्रावधानों और नियमों को लेकर शिक्षाविदों और छात्रों के बीच चर्चा तेज हुई है।
इसी संदर्भ में जब डॉ. भागवत से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए कानून के पालन की बात कही। उन्होंने किसी विशेष प्रावधान पर विस्तार से टिप्पणी करने के बजाय सिद्धांत की बात की—कि व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना जरूरी है।
असहमति का अधिकार, लेकिन मर्यादा के साथ
डॉ. भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है। यदि किसी कानून में कमी लगती है, तो उसके खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है। लेकिन यह आवाज हिंसा, अव्यवस्था या कानून तोड़ने के रूप में नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज में संवाद की परंपरा मजबूत होनी चाहिए। बातचीत, विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से ही समाधान निकाला जा सकता है। किसी भी प्रकार की उग्र प्रतिक्रिया से समस्या सुलझने के बजाय और जटिल हो जाती है।
सामाजिक सद्भाव पर भी दिया जोर
अपने संबोधन के दौरान डॉ. भागवत ने केवल UGC के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सद्भाव पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज को जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर विभाजित करने के बजाय एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए।
उनका मानना है कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और जागरूक नागरिक तैयार करना भी है। ऐसे में शिक्षण संस्थानों में अनुशासन, संवाद और कानून के प्रति सम्मान की भावना जरूरी है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और बहस
डॉ. मोहन भागवत के बयान के बाद विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने उनके बयान को कानून व्यवस्था के समर्थन के रूप में देखा, तो कुछ ने इसे वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में एक संदेश के तौर पर लिया।
हालांकि, उन्होंने अपने वक्तव्य में किसी विशेष राजनीतिक दल या विचारधारा पर टिप्पणी नहीं की। उनका जोर मूल रूप से इस बात पर था कि लोकतंत्र में नियम और प्रक्रियाएं सर्वोपरि होती हैं।
शिक्षा और संविधान का संबंध
भारत का संविधान नागरिकों को अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। डॉ. भागवत का बयान इसी संतुलन की ओर इशारा करता है। जहां एक ओर नागरिकों को विरोध और असहमति का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर कानून का पालन करना भी उनकी जिम्मेदारी है।
UGC जैसे संस्थान शिक्षा के स्तर को बनाए रखने और सुधारने के लिए नियम बनाते हैं। यदि इन नियमों पर सवाल उठते हैं, तो उनका समाधान भी वैधानिक प्रक्रिया से ही संभव है।
युवाओं के लिए संदेश
डॉ. भागवत के इस बयान को युवाओं के लिए एक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है। आज का युवा वर्ग सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों के माध्यम से अपनी बात तेजी से रखता है। ऐसे में यह जरूरी है कि विचारों की अभिव्यक्ति जिम्मेदारी के साथ हो।
उन्होंने संकेत दिया कि देश की प्रगति के लिए युवाओं को सकारात्मक सोच और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ना चाहिए। कानून का सम्मान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास ही देश को मजबूत बनाता है।
कुल मिलाकर, UGC से जुड़े सवाल पर डॉ. मोहन भागवत का बयान कानून के पालन और संवैधानिक प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी कानून से असहमति हो सकती है, लेकिन उसका समाधान भी लोकतांत्रिक दायरे में ही तलाशा जाना चाहिए।
आज जब देश में शिक्षा, नीति और कानून को लेकर बहसें तेज हैं, ऐसे समय में यह संदेश महत्वपूर्ण है कि संवाद, संयम और संवैधानिक मार्ग ही स्थायी समाधान का रास्ता है।
RSS Chief Mohan Bhagwat recently addressed the controversy surrounding UGC regulations, emphasizing that the law must be followed by all citizens and any amendments should be made through constitutional and democratic processes. His statement on the UGC issue has sparked discussions across political and educational circles, highlighting the importance of law, governance, and higher education policy in India.


















