लखनऊ में पत्रकार सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। गाजियाबाद के वरिष्ठ पत्रकार आकाश गौड़ को कथित तौर पर मिली जान से मारने की धमकी के मामले ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है। इस मुद्दे को लेकर एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन (ट्रस्ट) का प्रतिनिधिमंडल राजधानी लखनऊ पहुंचा और राज्य के शीर्ष नेताओं व अधिकारियों से मुलाकात कर तत्काल कार्रवाई की मांग उठाई।

पत्रकार संगठनों का कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा बड़ा सवाल है।
लखनऊ में उच्च स्तर पर उठाई गई शिकायत
एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने संगठन की अध्यक्ष अपूर्वा चौधरी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और भाजपा संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने पूरे घटनाक्रम से संबंधित एक विस्तृत शिकायत पत्र सौंपा और मामले में निष्पक्ष जांच तथा सख्त कार्रवाई की मांग की।
संगठन ने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश की राज्यपाल को भी पत्र भेजकर मामले से अवगत कराया गया है, ताकि पत्रकार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके।
प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि पत्रकारों को डराने या दबाव बनाने की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत हैं।
अपूर्वा चौधरी का बयान — ‘सच लिखने वालों को डराया जा रहा’
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एसोसिएशन की अध्यक्ष अपूर्वा चौधरी ने मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि आज के समय में सच लिखने वाले पत्रकारों को धमकियां मिलना बेहद गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
उन्होंने कहा,
“जो पत्रकार समाज के मुद्दों को सामने ला रहा है, उसे डराने की कोशिश की जा रही है। यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। हम किसी भी दबाव में चुप नहीं बैठेंगे।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर पीछे हटने वाला नहीं है और जरूरत पड़ने पर देशभर में आवाज उठाई जाएगी।
क्या है पूरा मामला?
पीड़ित पत्रकार आकाश गौड़ के अनुसार, 10 फरवरी 2026 को उन्हें गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र से विधायक नंदकिशोर गुर्जर की ओर से व्हाट्सएप कॉल पर कथित तौर पर धमकी दी गई। पत्रकार का आरोप है कि बातचीत के दौरान अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई।
आकाश गौड़ का कहना है कि यह विवाद उनकी एक प्रकाशित खबर के बाद शुरू हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि फोन कॉल के दौरान कहा गया — “आते ही तुझे मार दूंगा… जहां भागकर जान बचानी है, बचा ले।”
पत्रकार ने विधायक को “तानाशाही मानसिकता वाला” बताते हुए कहा कि यह पहली बार नहीं है जब उनके व्यवहार को लेकर विवाद सामने आया हो। उन्होंने दावा किया कि इससे पहले भी विधायक पर विभिन्न मामलों में विवाद और आरोप लग चुके हैं, जिनमें सरकारी अधिकारियों से विवाद और पत्रकारों के साथ टकराव जैसी घटनाएं शामिल हैं।
पंकज शर्मा का बयान — ‘लोकतंत्र की आवाज दबाने नहीं देंगे’
एसोसिएशन के महासचिव पंकज शर्मा ने इस पूरे मामले को लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता से जुड़े लोग पत्रकारों पर दबाव बनाते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
उन्होंने कहा,
“हम लोकतंत्र की बेड़ियां नहीं सहेंगे। पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन हम चुप नहीं बैठेंगे। हम लड़ेंगे और न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा।”
उनका कहना था कि संगठन का उद्देश्य किसी राजनीतिक टकराव को बढ़ाना नहीं, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
पहले भी दिया गया था ज्ञापन
एसोसिएशन ने बताया कि लखनऊ आने से पहले गाजियाबाद पुलिस आयुक्त को भी ज्ञापन सौंपा गया था। हालांकि, संगठन का मानना है कि अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, जिसके कारण उन्हें राज्य स्तर पर मामला उठाना पड़ा।
प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से मांग की कि पत्रकार और उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा मामले की निष्पक्ष जांच कर उचित कार्रवाई की जाए।
7 दिन का अल्टीमेटम
लखनऊ में मुलाकात के बाद एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने प्रशासन को 7 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। संगठन ने कहा है कि यदि इस अवधि के भीतर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पत्रकार समुदाय सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेगा।
प्रदर्शन केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गाजियाबाद और दिल्ली तक आंदोलन किए जाने की चेतावनी दी गई है।
अपूर्वा चौधरी ने कहा कि यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो पूरे देश को बताया जाएगा कि उत्तर प्रदेश में प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में है।
पत्रकारों की बड़ी मौजूदगी
इस दौरान पीड़ित पत्रकार आकाश गौड़ के साथ संगठन के कई पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। इनमें उपाध्यक्ष सुमन मिश्रा, पत्रकार महेश त्यागी, ब्रजभूषण शर्मा, पवन चौधरी, पंकज तोमर, विकास कुमार, संजय कुमार, सूरज, कृष्ण कुमार तोमर, सुशील शर्मा, रवि भारद्वाज, विनीत महेश्वरी, सोनी जी सहित दो दर्जन से अधिक लोग शामिल रहे।
संगठन के सदस्यों ने एकजुटता दिखाते हुए कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं बल्कि लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ा विषय है।
प्रेस स्वतंत्रता पर उठे बड़े सवाल
यह मामला एक बार फिर इस बहस को सामने लेकर आया है कि क्या पत्रकार बिना दबाव के अपना काम कर पा रहे हैं। मीडिया संगठनों का कहना है कि लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका सत्ता और जनता के बीच सेतु की होती है। यदि पत्रकार खुद असुरक्षित महसूस करेंगे, तो समाज तक सही जानकारी पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में त्वरित और पारदर्शी जांच लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी होती है।
आगे क्या?
अब सभी की नजर सरकार और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है। यदि शिकायतों पर त्वरित निर्णय लिया जाता है, तो इससे पत्रकार समुदाय में विश्वास बढ़ेगा। वहीं कार्रवाई में देरी होने पर आंदोलन तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
यह मामला फिलहाल केवल एक विवाद नहीं, बल्कि पत्रकार सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है।


















