AIN NEWS 1: हरियाणा सरकार के हालिया फैसले ने उत्तर प्रदेश के हजारों शिक्षकों की धड़कनें तेज कर दी हैं। 16 फरवरी को जारी एक आदेश में हरियाणा सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य के सभी शिक्षकों को मार्च 2027 तक हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा (HTET) पास करनी होगी। यदि वे निर्धारित समय-सीमा तक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करते हैं, तो उनकी सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं।

इस फैसले का असर सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश के लगभग 1.86 लाख ऐसे शिक्षकों पर भी पड़ रहा है, जिन्होंने अब तक शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास नहीं की है। हालांकि यह आदेश हरियाणा के लिए है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव यूपी में भी महसूस किए जा रहे हैं, क्योंकि यहां भी TET को लेकर कानूनी और प्रशासनिक विवाद जारी है।
हरियाणा सरकार का आदेश क्या कहता है?
16 फरवरी को जारी निर्देश में हरियाणा सरकार ने साफ कहा है कि राज्य के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को मार्च 2027 तक HTET पास करना अनिवार्य होगा।
आदेश में यह भी चेतावनी दी गई है कि जो शिक्षक तय समय तक परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे, उनकी सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का तर्क है कि शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पात्रता परीक्षा अनिवार्य है।
यह कदम शिक्षा व्यवस्था को मानकों के अनुरूप लाने के उद्देश्य से उठाया गया बताया जा रहा है, लेकिन इससे हजारों शिक्षकों के सामने असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई है।
यूपी में क्यों बढ़ी चिंता?
यूपी में स्थिति और भी जटिल है। यहां लगभग 1.86 लाख शिक्षक ऐसे हैं, जिन्होंने अभी तक TET पास नहीं किया है। इनमें से करीब 50 हजार शिक्षक ऐसे बताए जा रहे हैं, जिनके पास TET में बैठने की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी नहीं है।
यानी एक तरफ परीक्षा पास करने की समय-सीमा का दबाव है, तो दूसरी तरफ कई शिक्षक ऐसे हैं जो नियमों के अनुसार परीक्षा देने के पात्र ही नहीं हैं। ऐसे में उनके सामने भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का क्या है आदेश?
TET को लेकर मामला पहले ही अदालत तक पहुंच चुका है। Supreme Court of India ने शिक्षकों को सितंबर 2027 तक TET पास करने का समय दिया है।
अदालत का यह फैसला उन शिक्षकों के लिए राहत की तरह आया था, जो लंबे समय से परीक्षा को लेकर अनिश्चितता में थे। लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल की है, जिस पर अभी सुनवाई बाकी है।
यानी फिलहाल अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं है। जब तक रिव्यू पिटीशन पर फैसला नहीं आता, तब तक शिक्षकों के भविष्य पर संशय बना रहेगा।
RTE-2009 और TET की अनिवार्यता
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि Right to Education Act (RTE-2009) के तहत TET की अनिवार्यता जुलाई 2011 से लागू हुई थी।
उनका कहना है कि जो शिक्षक जुलाई 2011 से पहले नियुक्त हुए हैं, उन पर TET की शर्त लागू नहीं की जा सकती। क्योंकि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब यह नियम प्रभाव में नहीं था।
शिक्षक संगठन इसे ‘पूर्व प्रभाव’ (Retrospective effect) से लागू करने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नियम लागू होने की तारीख से पहले नियुक्त कर्मचारियों पर नया नियम थोपना न्यायसंगत नहीं है।
शिक्षकों की दुविधा
इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षकों को दोराहे पर ला खड़ा किया है।
जो शिक्षक TET पास नहीं कर पाए हैं, वे समय-सीमा को लेकर चिंतित हैं।
जिनके पास न्यूनतम योग्यता नहीं है, वे असमंजस में हैं कि वे परीक्षा दें भी तो कैसे?
जो 2011 से पहले नियुक्त हुए हैं, वे कानूनी सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं।
कई शिक्षक यह सवाल उठा रहे हैं कि वर्षों की सेवा के बाद अचानक सेवा समाप्ति की चेतावनी देना कितना उचित है। उनका कहना है कि यदि सरकार गुणवत्ता सुधारना चाहती है तो प्रशिक्षण और विशेष अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।
सरकार का पक्ष
सरकारी सूत्रों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना प्राथमिकता है। पात्रता परीक्षा का उद्देश्य यही है कि बच्चों को योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक मिलें।
सरकार का मानना है कि TET और HTET जैसी परीक्षाएं न्यूनतम मानक तय करती हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सके।
हालांकि यह भी माना जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों पर एक साथ कड़ी कार्रवाई करना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं होगा।
आगे क्या?
अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिव्यू पिटीशन की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि अदालत राज्य सरकार के पक्ष में फैसला देती है, तो हजारों शिक्षकों की नौकरी पर संकट गहरा सकता है।
वहीं यदि अदालत शिक्षकों को राहत देती है, तो यह उनके लिए बड़ी राहत साबित होगी।
फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना तय है कि मार्च 2027 और सितंबर 2027 की समय-सीमाएं शिक्षा जगत में एक बड़ा मुद्दा बन चुकी हैं।
हरियाणा सरकार के HTET संबंधी आदेश ने देशभर में शिक्षक पात्रता परीक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश में पहले से चल रहे कानूनी विवाद और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बीच हजारों शिक्षकों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों के अधिकार—इन दोनों के बीच संतुलन बनाना सरकार और न्यायपालिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाले महीनों में यह मामला शिक्षा नीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
The recent Haryana government HTET order directing teachers to clear the eligibility test by March 2027 has intensified concerns among nearly 1.86 lakh Uttar Pradesh teachers who have not passed the Teacher Eligibility Test (TET). With the Supreme Court of India setting a September 2027 deadline and the state government filing a review petition, the issue has become a major education policy debate. The controversy revolves around the implementation of the Right to Education Act 2009, TET qualification rules, and the future of primary teachers in Uttar Pradesh, making it a significant topic in Indian education news and CM Yogi administration updates.


















