CAG रिपोर्ट में खुलासा: कमजोर पटरियों और बिना स्पीड सर्टिफिकेट के चल रही लखनऊ मेट्रो
AIN NEWS 1: देश के तेजी से विकसित हो रहे मेट्रो नेटवर्क के बीच उत्तर प्रदेश की राजधानी में संचालित Lucknow Metro Rail Corporation को लेकर एक गंभीर रिपोर्ट सामने आई है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी Comptroller and Auditor General of India (CAG) द्वारा प्रस्तुत ऑडिट रिपोर्ट में लखनऊ मेट्रो परियोजना से जुड़ी कई तकनीकी और वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ है।
विधानसभा में वित्त मंत्री Suresh Khanna द्वारा पेश की गई इस रिपोर्ट में वर्ष 2017 से 2022 के बीच हुए कार्यों की समीक्षा की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, मेट्रो संचालन में कई ऐसे फैसले लिए गए, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरे साबित हो सकते हैं।
कमजोर पटरियों पर दौड़ रही मेट्रो
ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि मेट्रो की रेल पटरियों की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। पटरियों की तकनीकी जांच के लिए Indian Institute of Technology Kanpur की मदद ली गई थी।
जांच में पाया गया कि डिपो क्षेत्र में पटरियों की मजबूती 229 से 242 बीएचएन (ब्रिनेल हार्डनेस नंबर) के बीच थी, जबकि मुख्य लाइन पर यह 291 से 308 बीएचएन के बीच दर्ज की गई। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्तर भारतीय रेलवे द्वारा निर्धारित मानकों से कम है।
इसका सीधा असर यह हो सकता है कि ट्रेन के पहिए और पटरियां अपेक्षा से अधिक तेजी से घिसें, जिससे भविष्य में मरम्मत और रखरखाव पर अतिरिक्त खर्च का बोझ बढ़ सकता है।
मेट्रो के अंदर तय सीमा से ज्यादा शोर
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मेट्रो के अंदर ध्वनि स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों से अधिक पाया गया। उदाहरण के तौर पर मुंशीपुलिया स्टेशन पर खड़ी मेट्रो के भीतर शोर का स्तर 76 डेसिबल से अधिक रिकॉर्ड किया गया, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक 65 डेसिबल है।
जब मेट्रो ट्रेन मुंशीपुलिया से केडी सिंह बाबू स्टेडियम के बीच चल रही थी, तब यह स्तर 83 डेसिबल तक पहुंच गया, जबकि स्वीकार्य सीमा 75 डेसिबल मानी जाती है। लगातार उच्च ध्वनि स्तर यात्रियों के लिए असुविधाजनक होने के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाल सकता है।
स्पीड सर्टिफिकेट का नवीनीकरण नहीं
CAG की रिपोर्ट के अनुसार, मेट्रो संचालन के लिए आवश्यक अंतरिम गति प्रमाण पत्र का समय पर नवीनीकरण नहीं कराया गया। यह प्रमाण पत्र मार्च 2017 में जारी हुआ था और इसकी वैधता अवधि पांच वर्ष थी।
स्पीड सर्टिफिकेट यह सुनिश्चित करता है कि ट्रेन किस अधिकतम सुरक्षित गति से चलाई जा सकती है और उसके पहियों एवं अन्य उपकरणों में कितनी टूट-फूट हो रही है। इसके बावजूद प्रमाण पत्र की अवधि समाप्त होने के बाद भी मेट्रो का संचालन जारी रखा गया, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं।
महानगर स्टेशन को बिना अनुमति हटाया गया
लखनऊ मेट्रो परियोजना के पहले चरण में कुल 22.88 किलोमीटर लंबाई में 22 स्टेशनों का निर्माण प्रस्तावित था। परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (DPR) के अनुसार महानगर स्टेशन को प्रमुख स्टेशनों में शामिल किया गया था।
लेकिन बाद में Lucknow Metro Rail Corporation ने इसे परियोजना से बाहर कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव के लिए केंद्र सरकार से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई, जो परियोजना समझौते और वित्तीय अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है।
बिना अनुमति किया गया भूजल दोहन
ऑडिट में यह भी सामने आया कि मेट्रो परियोजना के लिए जलापूर्ति सुनिश्चित करने हेतु ट्यूबवेल लगाए गए, लेकिन इसके लिए संबंधित विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त नहीं किया गया।
वर्ष 2013 से 2023 के बीच भूजल विभाग और केंद्रीय प्राधिकरण के साथ पंजीकरण कराए बिना ही भूजल का उपयोग किया गया, जो नियमों के विपरीत है।
ठेकेदार को पहुंचाया गया आर्थिक लाभ
रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं की भी ओर इशारा किया गया है। सरकार के निर्देशानुसार ठेकेदार से अतिरिक्त परफॉर्मेंस गारंटी ली जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। लगभग 75.30 करोड़ रुपये की गारंटी नहीं ली गई।
इसके अलावा, मशीनों और उपकरणों के लिए 31.74 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि का भुगतान किया गया, जबकि परियोजना के पास पहले से ही आवश्यक मशीनें उपलब्ध थीं। अनुबंध की शर्तों को नजरअंदाज करते हुए 14.01 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान भी किया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि लगभग 15.75 करोड़ रुपये में पूरा होने वाला कार्य 51.40 करोड़ रुपये की लागत में पूरा किया गया, जिससे परियोजना की कुल लागत में भारी वृद्धि हुई।
सुरक्षा एजेंसी की नियुक्ति में भी गड़बड़ी
मेट्रो स्टेशनों, डिपो और कार्यालयों की सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा एजेंसी की नियुक्ति में भी नियमों का पालन नहीं किया गया। खुली निविदा प्रक्रिया अपनाने के बजाय सीधे नामांकन के आधार पर G4S को सुरक्षा का ठेका दे दिया गया।
इतना ही नहीं, एक बार ठेका देने के बाद इसे बार-बार नवीनीकृत किया गया। वर्ष 2016 से 2022 के बीच इस एजेंसी को कुल 76.04 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
CAG की इस रिपोर्ट ने लखनऊ मेट्रो परियोजना के संचालन और प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। तकनीकी कमियों से लेकर वित्तीय अनियमितताओं तक, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि परियोजना के कुछ पहलुओं में पारदर्शिता और मानकों का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया।
यात्रियों की सुरक्षा और सार्वजनिक धन के प्रभावी उपयोग को देखते हुए अब यह जरूरी हो जाता है कि संबंधित विभाग इन निष्कर्षों पर गंभीरता से विचार करें और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाएं।
The recent CAG Report on Lucknow Metro has raised major safety concerns regarding weak metro rail tracks, expired speed certification, high noise levels, contractor-related financial irregularities, and unauthorized groundwater usage by Lucknow Metro Rail Corporation (LMRC). The audit covering 2017–2022 highlights that metro operations continued without renewing mandatory speed safety certificates, posing potential risks to passenger safety and increasing long-term maintenance costs due to substandard rail infrastructure.


















