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अकबर नगर के विस्थापितों को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, SIR प्रक्रिया में शामिल होने की याचिका पर सुनवाई से इनकार!

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AIN NEWS 1: लखनऊ के अकबर नगर इलाके में हाल ही में कुकरैल नदी के किनारे किए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद बेघर हुए लोगों की परेशानियां अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई हैं। जिन परिवारों के मकान प्रशासनिक कार्रवाई के तहत गिराए गए थे, उनमें से 91 प्रभावित नागरिकों ने अब अपनी पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों को बचाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

इन लोगों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया में अपना नाम शामिल किए जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना है कि प्रशासन द्वारा मकान हटाए जाने के बाद उनके पास कोई स्थायी पता नहीं बचा है, जिसकी वजह से उन्हें मतदाता सूची के पुनरीक्षण से बाहर किया जा रहा है।

आखिर क्या है पूरा मामला?

दरअसल, लखनऊ के अकबर नगर क्षेत्र में कुकरैल नदी के किनारे बड़ी संख्या में मकान और अन्य निर्माण कार्य किए गए थे, जिन्हें प्रशासन ने अवैध घोषित करते हुए हटाने का फैसला लिया। इसके बाद भारी संख्या में बुलडोजर कार्रवाई के तहत इन निर्माणों को ध्वस्त कर दिया गया। इस कार्रवाई के चलते वहां रहने वाले सैकड़ों परिवार अचानक बेघर हो गए।

अब समस्या यह है कि जिन लोगों के घर टूटे हैं, उनके पास अपने निवास का कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं बचा है। ऐसे में जब चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई, तो इन विस्थापित लोगों को उसमें शामिल होने में कठिनाई आने लगी।

SIR प्रक्रिया से क्यों हो रहे बाहर?

मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने या उसे अपडेट करने के लिए आवेदक को अपने निवास स्थान का प्रमाण देना अनिवार्य होता है। लेकिन जिन लोगों के घर प्रशासनिक कार्रवाई में गिरा दिए गए, उनके पास अब न तो बिजली बिल है, न ही कोई रेंट एग्रीमेंट या अन्य दस्तावेज जो यह साबित कर सके कि वे किसी विशेष पते पर रहते हैं।

ऐसे में इन लोगों का कहना है कि वे न तो नए स्थान पर तुरंत दस्तावेज बनवा पा रहे हैं और न ही पुराने पते का उपयोग कर सकते हैं। यही कारण है कि उन्हें SIR प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है, जिससे उनका मतदान का अधिकार भी प्रभावित हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा गया?

प्रभावित लोगों की ओर से दायर याचिका में यह तर्क दिया गया कि केवल पते के अभाव में उन्हें मतदाता सूची के पुनरीक्षण से बाहर करना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि उन्हें विशेष परिस्थितियों को देखते हुए SIR प्रक्रिया में शामिल करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत का मानना था कि यह मामला सीधे तौर पर न्यायिक हस्तक्षेप की श्रेणी में नहीं आता और संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष उचित प्रक्रिया के तहत उठाया जा सकता है।

विस्थापितों की चिंता बढ़ी

अदालत से राहत न मिलने के बाद प्रभावित परिवारों की चिंता और बढ़ गई है। उनका कहना है कि पहले ही वे अपने घर खो चुके हैं और अब अगर उनका नाम मतदाता सूची से भी हट जाता है, तो वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से पूरी तरह कट जाएंगे।

कुछ स्थानीय निवासियों ने बताया कि वे वर्षों से उसी इलाके में रह रहे थे और वहां की मतदाता सूची में उनका नाम पहले से दर्ज था। लेकिन अब घर टूटने के बाद उनके सामने पहचान और पते से जुड़ी नई समस्या खड़ी हो गई है।

प्रशासन का क्या कहना है?

प्रशासन की ओर से पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि कुकरैल नदी के किनारे किए गए निर्माण पर्यावरणीय मानकों और नगर नियोजन नियमों का उल्लंघन कर रहे थे। इसलिए उन्हें हटाना जरूरी था। हालांकि, पुनर्वास और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर अभी भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

आगे क्या विकल्प?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रभावित लोग अब चुनाव आयोग या संबंधित जिला प्रशासन के समक्ष आवेदन देकर विशेष अनुमति की मांग कर सकते हैं। इसके अलावा, वे नए पते के साथ दस्तावेज तैयार कराकर पुनः मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया भी अपना सकते हैं।

फिलहाल, अकबर नगर के इन 91 परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नागरिक अधिकारों को बनाए रखने की है। घर टूटने के बाद अब पहचान और मतदान अधिकार को बचाने की लड़ाई उनके लिए उतनी ही अहम हो गई है जितनी कि सिर पर छत की व्यवस्था करना।

Residents displaced from Akbar Nagar in Lucknow after the Kukrail riverbank demolition have approached the Supreme Court seeking inclusion in the Special Intensive Revision (SIR) of the voter list. Due to lack of permanent address proof following eviction, many affected families were excluded from the voter registration process. The plea highlighted the challenges faced by displaced citizens in maintaining electoral identity and legal documentation after illegal construction removal drives in urban areas.

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