न्यायपालिका में AI का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी फैसलों पर दी सख्त चेतावनी
AIN NEWS 1: देश की न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। इसी सिद्धांत को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग और उसके संभावित दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि किसी न्यायिक आदेश में एआई द्वारा तैयार किए गए फर्जी या अस्तित्वहीन फैसलों का सहारा लिया जाता है, तो इसे केवल मानवीय भूल या तकनीकी त्रुटि नहीं माना जाएगा, बल्कि यह न्यायिक कदाचार (मिसकंडक्ट) की श्रेणी में आएगा।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे शामिल थे। यह मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह बात आई कि एक निचली अदालत ने अपने आदेश में ऐसे निर्णयों का उल्लेख किया था, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे और संभवतः एआई टूल की सहायता से तैयार किए गए थे।
अदालत की सख्त टिप्पणी
पीठ ने अपने 27 फरवरी के आदेश में स्पष्ट कहा कि “गैर-मौजूद या काल्पनिक निर्णयों के आधार पर आदेश पारित करना केवल निर्णय लेने में त्रुटि नहीं है। यह न्यायिक कदाचार है और इसके कानूनी परिणाम होंगे।” अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और विश्वसनीयता से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को केवल एक व्यक्तिगत गलती के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे एक व्यापक समस्या के रूप में लिया है, जो भविष्य में न्याय व्यवस्था की नींव को प्रभावित कर सकती है। अदालत ने कहा कि एआई जैसे आधुनिक उपकरण उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उनका प्रयोग सावधानी और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
नोटिस जारी, जवाब तलब
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने का क्या ढांचा होना चाहिए और भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए क्या दिशा-निर्देश बनाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस विषय पर विस्तृत सुनवाई करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि एआई के नाम पर न्यायिक प्रणाली में किसी तरह की लापरवाही या अनियमितता को बढ़ावा न मिले। अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की गई है।
क्यों अहम है यह मामला?
आज के समय में एआई टूल्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में इनका उपयोग शोध, लेखन और डेटा विश्लेषण के लिए किया जा रहा है। कानूनी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। वकील और शोधकर्ता केस लॉ खोजने, ड्राफ्ट तैयार करने और संदर्भ जुटाने के लिए एआई की मदद ले रहे हैं। लेकिन यदि बिना सत्यापन के एआई से प्राप्त जानकारी को न्यायिक आदेश का आधार बना दिया जाए, तो यह गंभीर परिणाम ला सकता है।
एआई सिस्टम कभी-कभी ऐसी जानकारियां भी उत्पन्न कर सकते हैं, जो वास्तविक नहीं होतीं। इन्हें तकनीकी भाषा में “हैलुसिनेशन” कहा जाता है। यदि कोई न्यायिक अधिकारी या वकील ऐसे काल्पनिक फैसलों को सही मानकर प्रस्तुत करता है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
न्यायपालिका की साख पर असर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्यायपालिका की अखंडता (इंटीग्रिटी) सर्वोपरि है। अदालतों के फैसले नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और अधिकारों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में यदि कोई आदेश फर्जी या गैर-मौजूद निर्णयों पर आधारित पाया जाता है, तो यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में भरोसे को कमजोर करने वाला कृत्य होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की लापरवाही को “मानवीय भूल” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह एक गंभीर मामला है और इसमें जवाबदेही तय की जाएगी।
आगे क्या हो सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में व्यापक दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। संभव है कि अदालत यह स्पष्ट करे कि एआई टूल्स का उपयोग किस सीमा तक और किन सावधानियों के साथ किया जा सकता है। साथ ही, न्यायिक अधिकारियों और वकीलों के लिए प्रशिक्षण और सत्यापन की अनिवार्य प्रक्रिया भी तय की जा सकती है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि वकीलों के आचरण और पेशेवर मानकों को तय करने की जिम्मेदारी उसी संस्था की है। यदि किसी वकील द्वारा जानबूझकर या लापरवाही से फर्जी एआई-जनित फैसलों का हवाला दिया जाता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
तकनीक और जिम्मेदारी का संतुलन
यह मामला केवल एआई के उपयोग का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और जवाबदेही का है। तकनीक एक साधन है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसान की होती है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात का संकेत है कि आधुनिक तकनीक को अपनाने के साथ-साथ नैतिकता और सावधानी भी उतनी ही जरूरी है।
न्यायालय का यह संदेश स्पष्ट है—न्यायिक आदेश तथ्यों और सत्यापित कानूनी आधार पर ही होने चाहिए। एआई की सहायता ली जा सकती है, लेकिन आंख मूंदकर उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायिक प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय के क्षेत्र में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। फर्जी या काल्पनिक एआई-जनित फैसलों पर आधारित आदेश अब केवल गलती नहीं, बल्कि न्यायिक कदाचार माने जाएंगे।
10 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इस विषय पर क्या व्यापक दिशा-निर्देश जारी करती है। फिलहाल इतना तय है कि न्यायपालिका तकनीक के उपयोग के साथ-साथ उसकी सीमाओं और जोखिमों को लेकर भी पूरी तरह सतर्क है।
The Supreme Court of India has issued a strong warning against the misuse of artificial intelligence in judicial proceedings, stating that AI-generated fake judgments or non-existent case laws cited in court orders will be treated as judicial misconduct rather than a simple error. The bench emphasized that the integrity of the Indian judiciary must be protected and has sought responses from the Attorney General, Solicitor General, and the Bar Council of India to frame accountability and guidelines regarding AI usage in courts.


















