गाजियाबाद में पुलिस और पत्रकारिता के रिश्तों पर उठे सवाल
AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिस प्रशासन और पत्रकारिता जगत के बीच नई बहस छेड़ दी है। यहां कोतवाली क्षेत्र में तैनात सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) उपासना पाण्डेय पर एक महिला पत्रकार की छवि खराब करने और साजिशन भ्रामक वीडियो वायरल कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इस पूरे मामले ने स्थानीय मीडिया जगत में हलचल मचा दी है।
एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन ट्रस्ट की अध्यक्ष और पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने अपने सहयोगी पत्रकारों के साथ मिलकर गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को एक विस्तृत शिकायत पत्र सौंपा है। इस शिकायत में ACP उपासना पाण्डेय पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने एक सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया और मीडिया ग्रुप्स में एक मानहानिकारक वीडियो वायरल करवाया।


वायरल वीडियो को लेकर बढ़ा विवाद
शिकायत के अनुसार वायरल किए गए वीडियो में एक अज्ञात महिला पत्रकार अपूर्वा चौधरी पर अवैध वसूली, ब्लैकमेलिंग और उगाही जैसे गंभीर आरोप लगाती दिखाई दे रही है। अपूर्वा चौधरी और पत्रकार संगठन का कहना है कि वीडियो में लगाए गए सभी आरोप झूठे, मनगढ़ंत और तथ्यों से परे हैं।
पत्रकार संगठन ने दावा किया है कि यह वीडियो मोबाइल नंबर 9643322906 से विभिन्न मीडिया ग्रुप्स और पत्रकारों को भेजा गया। शिकायतकर्ताओं ने वीडियो शेयर किए जाने के स्क्रीनशॉट और डिजिटल सबूत भी पुलिस कमिश्नर को सौंपे हैं।
पत्रकार संगठन ने क्या कहा?
एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक पत्रकार की छवि खराब करने का मामला नहीं है, बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता को दबाने का प्रयास भी है।
संगठन के अनुसार यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल कर किसी पत्रकार के खिलाफ बिना जांच के इस प्रकार का माहौल तैयार करता है, तो इससे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर खतरा पैदा होता है।
पत्रकारों ने आरोप लगाया कि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच करने के बजाय सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर मीडिया ट्रायल चलाने की कोशिश की गई।
शिकायत में किन धाराओं का उल्लेख?
पुलिस कमिश्नर को दिए गए प्रार्थना पत्र में कई कानूनी धाराओं का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ताओं ने दावा किया कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की कई धाराओं का उल्लंघन हुआ है।
धारा 356 — मानहानि
शिकायत में कहा गया कि बिना किसी कानूनी जांच या न्यायिक प्रक्रिया के किसी व्यक्ति की सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना मानहानि की श्रेणी में आता है।
धारा 61 — आपराधिक साजिश
पत्रकार संगठन का आरोप है कि पत्रकार अपूर्वा चौधरी को डराने, दबाव बनाने और उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रभावित करने के उद्देश्य से यह पूरी साजिश रची गई।
IT एक्ट की धारा 66D
शिकायतकर्ताओं ने कहा कि मोबाइल नंबर और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर भ्रामक सामग्री फैलाना और किसी व्यक्ति के खिलाफ गलत प्रचार करना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत गंभीर अपराध माना जाता है।
पुलिस आचरण नियमावली पर भी उठे सवाल
पत्रकार संगठन ने अपने शिकायत पत्र में यह भी कहा कि एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी का दायित्व निष्पक्ष जांच करना होता है। लेकिन यदि कोई अधिकारी स्वयं किसी पक्ष विशेष के समर्थन में सामग्री वायरल करता है, तो यह पुलिस सेवा आचरण नियमावली के खिलाफ माना जाएगा।
पत्रकारों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करती हैं।
साइबर जांच की मांग
अपूर्वा चौधरी और पत्रकार संगठन ने पुलिस कमिश्नर से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। इसके साथ ही उन्होंने मोबाइल नंबर 9643322906 के कॉल रिकॉर्ड, व्हाट्सएप गतिविधियों और डिजिटल ट्रेल की साइबर सेल से जांच कराने की मांग भी की है।
संगठन का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो वीडियो वायरल करने के पीछे शामिल लोगों की पहचान सामने आ सकती है।
पत्रकारों में नाराजगी
इस मामले को लेकर गाजियाबाद के पत्रकारों में काफी नाराजगी देखने को मिल रही है। कई पत्रकार संगठनों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया है। पत्रकारों का कहना है कि यदि निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों को इस प्रकार निशाना बनाया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
पत्रकार साथियों ने “पत्रकार एकता जिंदाबाद” के नारे के साथ इस पूरे मामले में एकजुटता दिखाई है। संगठन का कहना है कि वे इस मामले को अंत तक उठाते रहेंगे और पीड़ित पत्रकार को न्याय दिलाने की कोशिश करेंगे।
पुलिस प्रशासन के बयान का इंतजार
फिलहाल इस मामले में गाजियाबाद पुलिस प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पुलिस कमिश्नरेट अपने ही विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच किस प्रकार करता है।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। वहीं दूसरी ओर यदि आरोप गलत साबित होते हैं, तो शिकायतकर्ताओं को भी जवाब देना पड़ सकता है।
लोकतंत्र और पत्रकारिता के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। ऐसे में किसी पत्रकार की छवि खराब करने या दबाव बनाने के आरोप बेहद गंभीर माने जाते हैं। यह मामला केवल एक व्यक्ति या अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या निष्पक्ष पत्रकारिता आज सुरक्षित है?
गाजियाबाद का यह मामला अब धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में पुलिस जांच और प्रशासनिक कार्रवाई इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।
फिलहाल पत्रकार संगठन निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़ा हुआ है, जबकि आम लोगों की नजर पुलिस प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।
A major controversy has emerged in Ghaziabad after serious allegations were made against ACP Upasana Pandey for allegedly spreading a defamatory viral video targeting journalist Apoorva Chaudhary. The Active Journalist Association Trust has submitted a complaint to the Police Commissioner demanding a fair investigation, cyber cell probe, and action under BNS and IT Act provisions. The incident has sparked debate over press freedom, media safety, police conduct, and journalist protection in Uttar Pradesh.


















