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कांवड़ यात्रा और रावण का रहस्यमय संबंध: एक लोकगाथा से उपजी भक्ति परंपरा की अद्भुत कथा

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AIN NEWS 1 Kavad Yatra | सावन का महीना जब अपने पूरे शबाब पर होता है, तब भारत की सड़कों पर नारंगी वस्त्रधारी श्रद्धालुओं की टोलियाँ नजर आती हैं, जो कांधे पर कांवड़ उठाए, पैदल चलकर गंगाजल लाने और अपने आराध्य भगवान शिव का अभिषेक करने निकलते हैं। यह परंपरा कांवड़ यात्रा कहलाती है, जो अब सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जन-आस्था की अद्वितीय मिसाल बन चुकी है।

हालांकि यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या कांवड़ यात्रा का जिक्र किसी पौराणिक ग्रंथ में मिलता है? क्या रावण वाकई पहले कांवड़िया थे? इन सवालों का कोई एक निश्चित उत्तर नहीं, लेकिन सदियों से चली आ रही लोककथाएं, मान्यताएं और परंपराएं इस यात्रा को एक दिव्य रूप प्रदान करती हैं।

क्या है कांवड़ यात्रा?

कांवड़ यात्रा वह पवित्र यात्रा है जिसमें श्रद्धालु गंगा या किसी पवित्र जल स्रोत से जल भरकर उसे कांधे पर कांवड़ में लटकाकर शिवालय ले जाते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा अधिकतर सावन मास में होती है और उत्तर भारत में विशेष रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, बिहार और झारखंड में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है।

रावण का कांवड़ से क्या संबंध है?

लोककथाओं के अनुसार, रावण शिवभक्तों में सर्वोच्च माने जाते हैं। रावण संहिता में वर्णित कथाओं में यह उल्लेख मिलता है कि रावण ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था। मेरठ के पास स्थित पुरा महादेव मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि रावण ने वहीं शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। हालांकि पौराणिक ग्रंथों में इसकी स्पष्ट पुष्टि नहीं मिलती, लेकिन क्षेत्रीय मान्यताएं और जनश्रुतियाँ इसे प्राचीनतम कांवड़ यात्रा का स्वरूप मानती हैं।

भगवान परशुराम और कांवड़

दक्षिण भारत की परंपराओं में माना जाता है कि भगवान परशुराम, जो महाविष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, शिवजी के परम भक्त थे। उन्होंने कई स्थानों पर शिवलिंग की स्थापना की और समुद्र से कलश भरकर अभिषेक करते थे। केरल स्थित वडक्कूनाथ मंदिर की स्थापना परशुराम से जोड़ी जाती है। ऐसी कथाएं परशुराम को भी कांवड़ यात्रा की जड़ों से जोड़ती हैं।

रामायण में कांवड़ का उल्लेख

रामायण में भी ‘कांवड़’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जब राजा दशरथ ने गलती से श्रवण कुमार की हत्या कर दी थी। श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर तीर्थ यात्रा पर ले जा रहे थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि कांवड़ जैसी आकृति का प्रचलन प्राचीन भारत में तीर्थयात्राओं के लिए था।

लोक परंपराओं और मान्यताओं से उपजी यात्रा

कांवड़ यात्रा का सीधा उल्लेख किसी प्राचीन ग्रंथ में नहीं है, लेकिन स्कंद पुराण में ‘जलाशय से शिवालय तक पैदल यात्रा’ करने वालों की महिमा का वर्णन है। यही यात्रा आगे चलकर ‘कांवड़ यात्रा’ के रूप में विकसित हुई।

इसके अलावा ग्रामीण जीवन में सावन माह के दौरान खेती-किसानी की व्यस्तता कम होती है। यह समय पूजा-पाठ, व्रत, मनौती और तीर्थ यात्रा के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसी अवधि में गंगाजल लाकर शिवाभिषेक की परंपरा भी जोर पकड़ती है।

संत कनप्पा: सरल भक्ति का प्रतीक

संत कनप्पा, जो दक्षिण भारत के नयनार संतों में से एक थे, अपने अनोखे और सादे तरीके से शिव की आराधना करते थे। उन्होंने नदी से अपने मुंह में पानी भरकर शिवलिंग को स्नान कराया, हिरण का मांस चढ़ाया और वन फूलों की माला अर्पित की। उनकी सरल भक्ति से शिव प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि शिव केवल भावना और भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं।

स्कंद पुराण में जलाभिषेक की महिमा

स्कंद पुराण के माहेश्वरखंड में कहा गया है कि जो शिवालय की सफाई करता है, वह उनके गणों में शामिल हो जाता है। जो धूप-दीप चढ़ाते हैं, उन्हें अद्भुत पुण्य प्राप्त होता है। इस तरह से शिव की पूजा अत्यंत सरल और फलदायी मानी गई है।

आधुनिक युग में कांवड़ यात्रा

आधुनिक समय में कांवड़ यात्रा जन-जन की आस्था का प्रतीक बन चुकी है। हालांकि कुछ अराजक घटनाएं इस यात्रा को बदनाम कर देती हैं, लेकिन अधिकांश शिवभक्त पूर्ण अनुशासन, भक्ति और संयम के साथ यह यात्रा पूरी करते हैं। उनके लिए यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शिव से मिलने की यात्रा है।

कांवड़ यात्रा का उल्लेख भले ही किसी वेद या पुराण में न मिलता हो, लेकिन यह जनमानस की श्रद्धा, भक्ति और शिव के प्रति समर्पण से जन्मी एक अत्यंत शक्तिशाली धार्मिक परंपरा है। चाहे रावण हों या परशुराम, श्रवण कुमार हों या संत कनप्पा – सभी की कथाएं इस यात्रा को एक गूढ़ आध्यात्मिक रूप देती हैं।

आखिरकार, कांवड़ यात्रा एक ऐसी लीला है, जिसमें जल के एक कलश में समर्पण और भक्ति दोनों बंधे होते हैं। और शिव तो बस एक लोटा जल में ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए हर साल करोड़ों लोग ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष करते हुए इस भक्ति यात्रा में शामिल होते हैं।

The Kavad Yatra, a deeply spiritual pilgrimage undertaken by Shiva devotees, has mysterious roots often linked with Ravana, Lord Parshuram, and ancient saints like Kanappa. While there is no direct mention of this yatra in primary Hindu scriptures, the journey of carrying Ganga water to perform Shiva Abhishek during the sacred Shravan month is steeped in cultural significance, legends, and regional folklore. This article explores the mythological history, spiritual meaning, and regional beliefs that have shaped the vibrant tradition of Kavad Yatra across North and South India.

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