AIN NEWS 1: असम की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा ‘मिया’ समुदाय को लेकर दिए गए एक बयान ने राज्य में सियासी हलचल तेज कर दी है। इस बयान के बाद विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। खासकर ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने मुख्यमंत्री के बयान को अपमानजनक और विभाजनकारी करार दिया है।
यह पूरा विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे असम की जनसांख्यिकी, अवैध माइग्रेशन, पहचान की राजनीति और आगामी चुनावों की रणनीति जैसे कई बड़े सवाल जुड़े हुए हैं।
🔹 ‘मिया’ शब्द और उसका राजनीतिक अर्थ
‘मिया’ शब्द असम में बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय के लिए इस्तेमाल होता है। हालांकि कुछ लोग इसे सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोग इसे अपमानजनक और हाशिए पर डालने वाला शब्द मानते हैं। मुख्यमंत्री के हालिया बयान में इस शब्द के इस्तेमाल ने पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह शब्द सिर्फ भाषा का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके जरिए एक खास समुदाय को निशाने पर लेने का आरोप लगाया जा रहा है।
🔹 बदरुद्दीन अजमल की तीखी प्रतिक्रिया
AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि ऐसे बयान देने के बाद मुख्यमंत्री ने नैतिक अधिकार खो दिया है। उन्होंने कहा कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को भाषा और शब्दों को लेकर ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए।
अजमल का आरोप है कि यह बयान सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाला है और इससे समाज में नफरत का माहौल बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि असम की असली समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के मुद्दों को उछाला जा रहा है।
🔹 बीजेपी का पक्ष: अवैध माइग्रेशन पर चिंता
वहीं, बीजेपी और मुख्यमंत्री के समर्थकों का कहना है कि इस बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनका तर्क है कि मुख्यमंत्री अवैध माइग्रेशन और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर चिंता जता रहे थे, न कि किसी समुदाय का अपमान कर रहे थे।
बीजेपी नेताओं का कहना है कि असम लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या से जूझ रहा है और इस मुद्दे पर खुलकर बात करना जरूरी है। उनके मुताबिक, इसे सांप्रदायिक रंग देना गलत है।
🔹 पहचान की राजनीति और चुनावी गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद आगामी चुनावों से जुड़ा हुआ है। असम में पहचान की राजनीति हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में ‘मिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल चुनावी ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक ओर बीजेपी राष्ट्रवाद और अवैध माइग्रेशन के मुद्दे पर अपने कोर वोटर्स को साधना चाहती है, वहीं विपक्ष इसे अल्पसंख्यक समुदाय के अपमान के रूप में पेश कर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है।
🔹 समाज पर क्या असर पड़ेगा?
इस तरह के बयानों का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता। इससे आम लोगों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ता है। असम जैसे बहुसांस्कृतिक राज्य में भाषा और पहचान को लेकर संवेदनशीलता और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नेताओं को बयान देते समय यह सोचना चाहिए कि उसका असर ज़मीन पर रहने वाले आम लोगों पर क्या पड़ेगा।
🔹 क्या है जनता की राय?
इस पूरे विवाद पर जनता भी बंटी हुई नजर आ रही है। कुछ लोग इसे अवैध माइग्रेशन पर जायज़ चिंता मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि यह साफ तौर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति है। वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि मुद्दा जरूरी है, लेकिन भाषा गलत चुनी गई।
🔹 आगे क्या?
फिलहाल यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठा रहा है, जबकि बीजेपी अपने बयान पर कायम है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मामला सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहेगा या इसका असर चुनावी राजनीति और सामाजिक समीकरणों पर भी पड़ेगा।
Assam is witnessing intense political debate after Chief Minister Himanta Biswa Sarma’s controversial remark on the Miya community. The statement has triggered strong reactions from AIUDF chief Badruddin Ajmal and other Muslim leaders, raising concerns over identity politics, illegal migration, and communal polarization in Assam. As political parties exchange accusations, the controversy highlights the complex social and electoral dynamics shaping Assam politics ahead of crucial elections.


















