AIN NEWS 1: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले सियासी माहौल लगातार हिंसक होता जा रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं की गिरफ्तारी, हिरासत में मौतें और सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग के आरोप अब आम होते जा रहे हैं। ताजा मामला चौडांगा जिले से सामने आया है, जहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता शमसुज्जमान की सैन्य हिरासत में मौत हो गई। इस घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया है और विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर “राजनीतिक हत्या” करार दिया है।
हिरासत में मौत या सुनियोजित हत्या?
शमसुज्जमान को सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर चुनाव से पहले चल रहे अभियानों के दौरान हिरासत में लिया था। पुलिस और प्रशासन का दावा है कि हिरासत के दौरान उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा, जिससे उनकी मौत हो गई। लेकिन यह दावा मृतक के परिजनों और पार्टी कार्यकर्ताओं को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं है।
शमसुज्जमान की पत्नी जासमीन नाहर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनके पति पूरी तरह स्वस्थ थे और उन्हें किसी तरह की गंभीर बीमारी नहीं थी। उनका आरोप है कि हिरासत में उनके पति को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिसकी वजह से उनकी जान चली गई।
परिजनों के आरोपों से बढ़ी सरकार की मुश्किलें
परिजनों का कहना है कि मौत से पहले शमसुज्जमान को कई घंटों तक सैन्य हिरासत में रखा गया और उन्हें वकील या परिवार से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। जब शव परिजनों को सौंपा गया, तब उनके शरीर पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। इसी आधार पर बीएनपी नेताओं ने इसे “कस्टोडियल टॉर्चर” का मामला बताया है।
बीएनपी प्रवक्ताओं का कहना है कि यह कोई पहला मामला नहीं है। चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं को डराने और दबाने के लिए हिरासत में मौतों को हथियार बनाया जा रहा है।
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अवामी लीग नेता की जेल में मौत ने भी उठाए सवाल
इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना देता है अवामी लीग के नेता प्रलय चाकी की जेल में हुई मौत। हालांकि वह सत्तारूढ़ दल से जुड़े थे, लेकिन उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने यह संकेत दिया है कि बांग्लादेश की जेल और हिरासत प्रणाली खुद गंभीर संकट में है।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि चाहे पीड़ित किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो, हिरासत में मौत लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
चुनाव से पहले हिंसा का बढ़ता ग्राफ
बांग्लादेश में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार हालात कहीं ज्यादा चिंताजनक नजर आ रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार सुरक्षा बलों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध को कुचलने के लिए कर रही है।
देश के कई हिस्सों से गिरफ्तारी, झड़प और हिरासत में प्रताड़ना की खबरें सामने आ चुकी हैं। बीएनपी का दावा है कि उनके हजारों कार्यकर्ताओं को बिना ठोस आरोपों के जेलों में डाला गया है।
मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी बांग्लादेश की स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि चुनाव से पहले अगर राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा नहीं की गई, तो इसका असर चुनाव की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स का मानना है कि हिरासत में मौतें किसी भी लोकतांत्रिक देश में अस्वीकार्य हैं और इनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
सरकार की सफाई और विपक्ष का पलटवार
सरकार की ओर से कहा गया है कि सभी सुरक्षा एजेंसियां कानून के तहत काम कर रही हैं और किसी को भी जानबूझकर नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। अधिकारियों के मुताबिक, शमसुज्जमान की मौत एक “मेडिकल इमरजेंसी” थी।
लेकिन विपक्ष इस सफाई को “रटी-रटाई कहानी” बता रहा है। बीएनपी नेताओं का कहना है कि हर कस्टोडियल मौत के बाद सरकार दिल के दौरे की दलील देती है, जबकि सच्चाई कभी सामने नहीं आती।
जनता में डर और गुस्सा
चौडांगा समेत कई इलाकों में आम लोगों के बीच डर और गुस्सा दोनों है। लोग खुलकर बोलने से डर रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर राजनीतिक मतभेदों के कारण किसी की जान सुरक्षित नहीं है, तो चुनाव सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार हो रही हिरासत में मौतें बांग्लादेशी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं। निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं, जब विपक्ष को बराबरी का मौका मिले और सुरक्षा बल तटस्थ भूमिका निभाएं।
अगर सरकार इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच नहीं कराती, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि को भारी नुकसान हो सकता है।
आगे क्या?
बीएनपी ने शमसुज्जमान की मौत की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है। साथ ही, चुनाव से पहले सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई और सुरक्षा बलों की जवाबदेही तय करने की मांग भी तेज हो गई है।
अब यह देखना अहम होगा कि बांग्लादेश सरकार इन आरोपों से कैसे निपटती है और क्या आने वाले चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों पर खरे उतर पाते हैं या नहीं।
The custodial death of BNP leader Shamsuzzaman ahead of the Bangladesh elections has intensified concerns over political violence, human rights abuses, and police torture in Bangladesh. As opposition parties accuse the government of suppressing dissent through arrests and custodial deaths, questions are being raised about the credibility of the upcoming elections and the state of democracy in Bangladesh.


















