पुलिस स्टेशन में वीडियो रिकॉर्डिंग पर बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अब गुंडागर्दी नहीं चलेगी?

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AIN NEWS 1: भारत में पुलिस स्टेशन को लेकर आम नागरिकों के मन में हमेशा डर और असमंजस बना रहता है। थाने के भीतर क्या करना कानूनी है और क्या नहीं—इस पर अक्सर पुलिस की मनमानी देखने को मिलती है। कई बार शिकायत लेकर पहुंचे लोगों के साथ अभद्र व्यवहार होता है, धमकाया जाता है और कुछ मामलों में झूठे केस में फंसाने की चेतावनी तक दी जाती है। ऐसे माहौल में बॉम्बे हाई कोर्ट का एक हालिया फैसला आम लोगों के लिए राहत की बड़ी खबर बनकर सामने आया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला Subhash Rambhau Athare बनाम State of Maharashtra (2024) से जुड़ा है। इस केस में याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया था कि उसने पुलिस स्टेशन के अंदर बातचीत और घटनाओं की वीडियो रिकॉर्डिंग की, जो कि Official Secrets Act, 1923 के तहत अपराध है। पुलिस ने इसे “जासूसी” की श्रेणी में रखने की कोशिश की और एफआईआर दर्ज कर दी।

याचिकाकर्ता ने इस एफआईआर को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी और सवाल उठाया कि क्या वाकई पुलिस स्टेशन के अंदर रिकॉर्डिंग करना जासूसी माना जा सकता है?

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच करते हुए Official Secrets Act, 1923 की धाराओं को समझा और बेहद स्पष्ट टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि इस कानून में जिन जगहों को “प्रतिबंधित स्थान” (Prohibited Place) कहा गया है, उनमें पुलिस स्टेशन शामिल नहीं है। यानी कानून की नजर में पुलिस स्टेशन कोई गोपनीय सैन्य या संवेदनशील ठिकाना नहीं है, जहां रिकॉर्डिंग अपने-आप अपराध बन जाए।

Official Secrets Act की सच्चाई

Official Secrets Act का उद्देश्य देश की सुरक्षा से जुड़ी सूचनाओं को बचाना है—जैसे सैन्य ठिकाने, रक्षा प्रतिष्ठान, खुफिया एजेंसियों के कार्यालय आदि। यह कानून आम नागरिकों को डराने या पुलिस की आलोचना रोकने के लिए नहीं बनाया गया है।

हाई कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई नागरिक पुलिस स्टेशन में अपनी बातचीत या घटनाओं की रिकॉर्डिंग करता है, तो इसे जासूसी नहीं कहा जा सकता।

क्या पुलिस स्टेशन में वीडियो रिकॉर्डिंग पूरी तरह कानूनी है?

इस फैसले को लेकर एक बड़ी गलतफहमी सोशल मीडिया पर फैल रही है। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर स्थिति में और हर उद्देश्य से रिकॉर्डिंग करना पूरी तरह सुरक्षित है।

कोर्ट का स्पष्ट मतलब यह था कि:

❌ Official Secrets Act के तहत एफआईआर नहीं की जा सकती

पुलिस स्टेशन को “प्रतिबंधित स्थान” नहीं माना जाएगा

⚠️ लेकिन अगर रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किसी और अपराध के लिए किया गया हो, तो अन्य कानून लागू हो सकते हैं

किन परिस्थितियों में दिक्कत हो सकती है?

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर रिकॉर्डिंग के दौरान:

किसी अधिकारी को धमकाया गया हो

किसी महिला या पीड़ित की निजता भंग हुई हो

रिकॉर्डिंग को तोड़-मरोड़ कर वायरल किया गया हो

या कानून-व्यवस्था में बाधा पहुंची हो

तो IPC या अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई संभव है।

आम नागरिकों के लिए इस फैसले का मतलब

यह फैसला पुलिस की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अक्सर देखा गया है कि थानों में आम लोगों के साथ बदसलूकी होती है क्योंकि उन्हें डर रहता है कि “यहां जो होगा, वही सच माना जाएगा।”

अब इस फैसले के बाद:

नागरिक अपनी बातचीत का रिकॉर्ड सुरक्षित रख सकते हैं

पुलिस पर मनमानी करने का दबाव कम होगा

शिकायतकर्ता के पास सबूत मौजूद रहेगा

लेकिन व्यवहारिक सच्चाई क्या है?

कानून अपनी जगह है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग हो सकती है। कई बार पुलिस रिकॉर्डिंग से नाराज़ होकर फोन छीन सकती है या रिकॉर्डिंग बंद करने को कह सकती है।

ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि:

बहस में न पड़ें

शांति बनाए रखें

बाद में कानूनी रास्ता अपनाएं

वरिष्ठ अधिकारियों या अदालत का सहारा लें

क्या यह फैसला पूरे भारत में लागू है?

यह फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट का है, इसलिए यह महाराष्ट्र और उसके अधिकार क्षेत्र में सीधे लागू होता है। हालांकि, अन्य राज्यों की अदालतों में इसे नज़ीर (precedent) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला एक साफ संदेश देता है—कानून नागरिकों के साथ है, न कि डर और दमन के साथ। पुलिस स्टेशन कोई ऐसी जगह नहीं है जहां आम आदमी अपने अधिकार भूल जाए।

हालांकि, अधिकारों का इस्तेमाल समझदारी और जिम्मेदारी से करना भी उतना ही जरूरी है। यह फैसला पुलिस सुधार और पारदर्शिता की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।

The Bombay High Court in Subhash Rambhau Athare vs State of Maharashtra (2024) clarified that police stations are not considered prohibited places under the Official Secrets Act, 1923. This landmark judgment confirms that video recording or audio recording inside a police station does not amount to spying or an offence under the Act. The ruling strengthens citizens’ rights, increases police accountability, and sets an important legal precedent regarding the legality of recording police interactions in India.

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