AIN NEWS 1: गाजियाबाद से सामने आया फर्जी पासपोर्ट रैकेट का मामला न सिर्फ पुलिस और प्रशासन के लिए चौंकाने वाला है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। जिन गांवों का ज़मीन पर कोई अस्तित्व ही नहीं, उन्हीं गांवों के पते पर 22 पासपोर्ट जारी हो जाना किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की ओर इशारा करता है।

इस सनसनीखेज खुलासे में उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसमें एक दलाल, दस्तावेज़ तैयार करने वाले लोग और सरकारी तंत्र से जुड़ा एक लालची डाकिया भी शामिल है। पुलिस ने इस मामले में कुल पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
कैसे खुला फर्जी पासपोर्ट फैक्ट्री का राज?
गाजियाबाद पुलिस को खुफिया इनपुट मिला था कि जिले में संदिग्ध तरीके से कुछ लोगों के पासपोर्ट बने हैं। जांच शुरू हुई तो पता चला कि इन पासपोर्ट पर दर्ज पते ऐसे गांवों के हैं, जो गाजियाबाद जिले के रिकॉर्ड में कभी मौजूद ही नहीं रहे।
जब पुलिस ने गहराई से जांच की, तो सामने आया कि कुल 22 पासपोर्ट फर्जी पते और झूठे दस्तावेजों के आधार पर जारी किए गए थे। यही नहीं, सभी पासपोर्ट धारकों की पहचान भी संदिग्ध पाई गई।
डाकिया बना सिस्टम की सबसे कमजोर कड़ी
इस पूरे फर्जीवाड़े में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि एक सरकारी डाकिया, जिसे दस्तावेज़ों की डिलीवरी और सत्यापन की जिम्मेदारी दी गई थी, वही इस रैकेट का हिस्सा निकला।
पुलिस के मुताबिक आरोपी डाकिया हर फर्जी पासपोर्ट की डिलीवरी के बदले ₹2000 की रकम वसूल करता था। पासपोर्ट आवेदकों तक दस्तावेज़ पहुंचाने के साथ-साथ वह फर्जी पते की पुष्टि भी कर देता था, जिससे सिस्टम को यह भरोसा हो जाता था कि आवेदक वास्तव में उसी पते पर रहता है।
आधार से लेकर पुलिस वेरिफिकेशन तक कैसे पास हो गया सब कुछ?
इस केस में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पासपोर्ट बनवाने के लिए आधार कार्ड, पते का प्रमाण, स्थानीय पुलिस सत्यापन और LIU (लोकल इंटेलिजेंस यूनिट) की जांच अनिवार्य होती है, तो यह फर्जीवाड़ा आखिर कैसे सफल हो गया?
जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने फर्जी आधार कार्ड, नकली निवास प्रमाण पत्र और झूठे किरायानामे तैयार किए थे। इसके बाद दलालों के जरिए आवेदन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
स्थानीय स्तर पर होने वाले सत्यापन में डाकिया और अन्य सहयोगियों ने अहम भूमिका निभाई। दस्तावेज़ों की जांच केवल कागज़ों तक सीमित रह गई और ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस पड़ताल नहीं की गई।
क्या सिर्फ डाकिया दोषी है?
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मानना गलत होगा कि पूरा खेल सिर्फ एक डाकिया के भरोसे चल रहा था। जांच एजेंसियों को शक है कि इस रैकेट की जड़ें और भी गहरी हो सकती हैं।
अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि क्या इस मामले में पासपोर्ट कार्यालय, स्थानीय पुलिस या अन्य विभागों के किसी कर्मचारी की मिलीभगत भी रही है। सभी 22 पासपोर्ट की दोबारा जांच की जा रही है और जरूरत पड़ने पर उन्हें रद्द भी किया जा सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों है यह मामला खतरनाक?
पासपोर्ट केवल एक पहचान पत्र नहीं, बल्कि किसी भी नागरिक की अंतरराष्ट्रीय पहचान का दस्तावेज़ होता है। ऐसे में फर्जी पासपोर्ट का बनना देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
इन पासपोर्ट का इस्तेमाल अवैध यात्रा, मानव तस्करी, आतंकी गतिविधियों या किसी अन्य गैरकानूनी काम में भी किया जा सकता था। यही वजह है कि इस केस को पुलिस और खुफिया एजेंसियां बेहद गंभीरता से ले रही हैं।
आगे क्या?
गाजियाबाद पुलिस ने सभी आरोपियों से पूछताछ तेज कर दी है और यह जानने की कोशिश की जा रही है कि अब तक कितने और फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए गए हैं। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि कहीं यह रैकेट दूसरे जिलों या राज्यों तक तो नहीं फैला हुआ है।
पुलिस का कहना है कि दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा और सिस्टम में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए संबंधित विभागों को भी रिपोर्ट भेजी जाएगी।
A major fake passport scam in Ghaziabad has exposed serious loopholes in India’s passport verification system. In this case, 22 passports were issued using fake addresses linked to non-existent villages. The involvement of a postman, brokers, and forged documents has raised concerns about internal security, police verification failure, and misuse of Aadhaar-based identity checks. UP Police is investigating the extent of the fake passport racket and possible links to larger security threats.


















