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आईआईटी कानपुर में आत्महत्याओं का सिलसिला: छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत दबाव पर गहराता संकट!

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AIN NEWS 1: आईआईटी कानपुर एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में शुमार इस संस्थान में लगातार सामने आ रही आत्महत्या की घटनाओं ने न सिर्फ प्रशासन बल्कि पूरे शैक्षणिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। मंगलवार को आईआईटी कानपुर कैंपस में एक और रिसर्च स्कॉलर द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर सामने आई, जिसके बाद संस्थान का माहौल गमगीन और चिंताजनक हो गया।

यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते कुछ वर्षों में आईआईटी कानपुर सहित देश के अन्य प्रमुख संस्थानों से भी इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं। हर बार जांच बैठती है, बयान जारी होते हैं, लेकिन कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। सवाल यह है कि आखिर इन संस्थानों में पढ़ने वाले होनहार छात्र किस दबाव में इतना बड़ा कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं?

रिसर्च स्कॉलर्स पर बढ़ता मानसिक दबाव

आईआईटी जैसे संस्थानों में रिसर्च स्कॉलर होना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण सफर होता है। पीएचडी या रिसर्च प्रोग्राम के दौरान छात्रों पर अकादमिक प्रदर्शन, रिसर्च आउटपुट, गाइड की अपेक्षाएं और भविष्य की अनिश्चितता का भारी दबाव होता है। कई बार यह दबाव धीरे-धीरे मानसिक तनाव, अकेलेपन और अवसाद का रूप ले लेता है।

मंगलवार को हुई घटना में भी बताया जा रहा है कि मृतक छात्र लंबे समय से तनाव में था। हालांकि प्रशासन की ओर से आधिकारिक कारणों की पुष्टि अभी नहीं की गई है, लेकिन साथी छात्रों का कहना है कि रिसर्च स्कॉलर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा सहयोग बेहद सीमित है।

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संस्थान की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल

हर आत्महत्या के बाद संस्थान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाज़मी है। क्या छात्रों की समस्याएं समय रहते सुनी जाती हैं? क्या काउंसलिंग सिस्टम वास्तव में प्रभावी है या सिर्फ कागज़ों तक सीमित है? क्या गाइड और फैकल्टी को छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को समझने की ट्रेनिंग दी जाती है?

आईआईटी कानपुर में मौजूद काउंसलिंग सेल पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि कई बार मदद मांगने पर भी उन्हें औपचारिक जवाब ही मिलते हैं। कुछ छात्र तो यह भी कहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को अब भी कमजोरी के तौर पर देखा जाता है, जिससे छात्र खुलकर बात नहीं कर पाते।

अकेलापन और प्रतिस्पर्धा का दुष्चक्र

आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रतिस्पर्धा बहुत तीव्र होती है। यहां हर छात्र अपने-आप में असाधारण प्रतिभा लेकर आता है। लेकिन जब हर कोई सर्वश्रेष्ठ हो, तब तुलना का दबाव और अधिक बढ़ जाता है। अच्छे अंक, बेहतर रिसर्च, इंटरनेशनल पब्लिकेशन और प्लेसमेंट की दौड़ में कई छात्र खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस करने लगते हैं।

रिसर्च स्कॉलर्स के लिए यह स्थिति और कठिन हो जाती है, क्योंकि उनका काम अक्सर अकेलेपन में होता है। लैब, लाइब्रेरी और गाइड के बीच सीमित संवाद कई बार मानसिक दूरी को और बढ़ा देता है।

परिवार से दूरी और भावनात्मक सहारे की कमी

कई छात्र देश के अलग-अलग हिस्सों से आकर आईआईटी कानपुर में पढ़ाई करते हैं। परिवार से दूर रहना, सीमित सामाजिक दायरा और व्यस्त शेड्यूल छात्रों को भावनात्मक रूप से कमजोर बना सकता है। जब तनाव बढ़ता है और बात करने के लिए कोई भरोसेमंद व्यक्ति न हो, तो स्थिति गंभीर हो जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं होता, बल्कि यह लंबे समय तक चले मानसिक संघर्ष का परिणाम होती है।

हर घटना के बाद वही औपचारिकता

हर बार की तरह इस बार भी प्रशासन की ओर से संवेदना जताई गई, जांच की बात कही गई और काउंसलिंग सुविधाओं को मजबूत करने का आश्वासन दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम जमीन पर असर दिखा रहे हैं?

छात्र संगठनों का कहना है कि जब तक संस्थान मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देगा और अकादमिक दबाव को मानवीय दृष्टिकोण से नहीं देखेगा, तब तक ऐसी घटनाएं रुकना मुश्किल हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि

हर विभाग में नियमित मेंटल हेल्थ सेशन हों

गाइड और फैकल्टी को संवेदनशील बनाया जाए

रिसर्च स्कॉलर्स के लिए अलग सपोर्ट सिस्टम विकसित किया जाए

छात्रों के बीच संवाद और सामूहिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए

इसके साथ ही, छात्रों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है।

समाज और सिस्टम दोनों की जिम्मेदारी

आईआईटी कानपुर की यह घटना सिर्फ एक संस्थान की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है। जब देश के सबसे प्रतिभाशाली युवा भी खुद को असहाय महसूस करने लगें, तो यह सिस्टम की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

हर आत्महत्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक अधूरा सपना और टूटा हुआ भविष्य होती है। अब समय आ गया है कि संस्थान सिर्फ रैंकिंग और उपलब्धियों से आगे बढ़कर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही अहमियत दें।

The recent suicide of a research scholar at IIT Kanpur has once again highlighted the growing mental health crisis among students in premier institutions. Repeated IIT Kanpur suicide cases point towards immense academic pressure, research stress, and inadequate mental health support systems. Experts emphasize the urgent need for strong counseling mechanisms, sensitive faculty guidance, and a student-centric approach to prevent further loss of young lives in India’s top technical institutes.

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