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धनखड़ का कार्यकाल: किसान आंदोलन से सुप्रीम कोर्ट तक, वे मौके जब उन्होंने पार की संवैधानिक ‘लक्ष्मण रेखा’

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AIN NEWS 1 | भारत के उपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ का इस्तीफा जितना अचानक आया, उससे कहीं ज्यादा चर्चा उनके उस कार्यकाल की हो रही है जिसमें वे कई बार चर्चाओं और विवादों के केंद्र में रहे। संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले 21 जुलाई 2025 को उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसके पीछे उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया।

हालांकि, केवल स्वास्थ्य को जिम्मेदार ठहराना शायद पूरे घटनाक्रम की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। दरअसल, धनखड़ के छोटे कार्यकाल में कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने संवैधानिक सीमाओं को लांघते हुए बयान दिए, फैसले लिए या फिर सरकार से भिन्न राय रखी।

विपक्ष को नोटिस देकर चौंकाया

धनखड़ को जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए विपक्ष की ओर से प्रस्ताव का नोटिस मिला था। खास बात यह रही कि उन्होंने बीजेपी को बिना सूचना दिए इस नोटिस को स्वीकार कर लिया।

सरकार चाहती थी कि यह प्रस्ताव पहले लोकसभा में पारित हो, जिससे उसे राजनीतिक बढ़त मिल सके और न्यायपालिका को एक सख्त संदेश भी दिया जा सके। लेकिन धनखड़ ने विपक्ष को ही पहल करने का मौका दे दिया। इस घटना को सरकार के साथ उनकी बढ़ती असहजता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

किसानों के मुद्दे पर सरकार से तीखी बहस

किसान आंदोलन, जो 2020 से शुरू होकर कई महीनों तक चला, उसके बाद 2024 में भी दोबारा शुरू हुआ। दिसंबर 2024 में एक सार्वजनिक मंच से बोलते हुए उन्होंने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से सीधे सवाल दागे।

धनखड़ ने पूछा—”MSP को लेकर क्या वादा किया गया था? और वह अब तक क्यों पूरा नहीं हुआ?” यह बयान तब आया जब सरकार आंदोलन को संभालने की कोशिश कर रही थी और उपराष्ट्रपति का इस तरह खुला बयान देना असामान्य माना गया।

सुप्रीम कोर्ट पर भी उठाए सवाल

धनखड़ ने खुले मंच से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जब संसद के दोनों सदनों ने मिलकर एक कानून पारित किया, तो उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कैसे किया जा सकता है?

यह बयान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर एक नई बहस को जन्म देने वाला था। इसके अलावा, हाल ही में उन्होंने नकदी बरामदगी के एक मामले में आपराधिक जांच की मांग करते हुए भी कोर्ट की भूमिका पर प्रश्न उठाए थे।

राघव चड्ढा का निलंबन हटाया, सरकार हुई नाराज

आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा को अगस्त 2023 में राज्यसभा से निलंबित कर दिया गया था, उन पर सदन की प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने का आरोप था। लेकिन उपराष्ट्रपति के रूप में धनखड़ ने उनका निलंबन समाप्त कर दिया, जिससे सरकार की नाराजगी सामने आई।

बाद में राघव चड्ढा इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे थे, लेकिन धनखड़ के इस फैसले को उनकी निष्पक्षता और संवैधानिक विवेक का उदाहरण भी माना गया — कुछ लोगों के अनुसार।

‘पक्षपात’ का आरोप और अविश्वास प्रस्ताव

धनखड़ पर कई बार सत्तापक्ष के पक्ष में झुकाव रखने के आरोप लगे। विपक्ष ने 2024 में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया था। लेकिन इसके बाद उनके व्यवहार में बदलाव भी देखा गया, जहां उन्होंने कई बार सरकार को सार्वजनिक रूप से घेरा।

उनका यह नया रवैया कहीं न कहीं सत्ता और उनके बीच की दरार का संकेत दे रहा था।

अब सवाल उठते हैं: क्या इस्तीफा सिर्फ स्वास्थ्य कारणों से?

कांग्रेस और विपक्षी दलों का मानना है कि स्वास्थ्य कारण सिर्फ एक बहाना हैं। असल कारण शायद राजनीतिक दबाव या अंदरूनी टकराव हैं।

धनखड़ जैसे अनुभवी व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णय को सिर्फ “स्वास्थ्य” तक सीमित करना जनता की बुद्धिमता का अपमान होगा। उनके कार्यकाल में कई बार ऐसा महसूस हुआ कि वे सत्ता और संस्थानों के बीच की ‘लक्ष्मण रेखा’ को चुनौती दे रहे थे — चाहे बात न्यायपालिका की हो, किसान आंदोलन की या विपक्ष को दिए गए मौके की।

Jagdeep Dhankhar’s tenure as the Vice President of India saw multiple flashpoints where he questioned government decisions, raised eyebrows at the Supreme Court’s NJAC verdict, and supported opposition motions. His controversial remarks on the farmers’ protest, the Raghav Chadha case, and his unexpected approval of a judicial removal notice without government consent suggest he often crossed constitutional boundaries. These events may explain why his resignation was more than just a health-related decision.

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