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RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR पर कर्नाटक हाईकोर्ट की अंतरिम रोक!

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RSS नेता प्रभाकर भट्ट के खिलाफ दर्ज FIR पर कर्नाटक हाईकोर्ट की अंतरिम रोक

AIN NEWS 1: कर्नाटक हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता प्रभाकर भट्ट को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज FIR की जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह मामला पुत्तूर के एक कॉलेज में दिए गए उनके भाषण से जुड़ा है, जिसे बाद में एक यूट्यूब चैनल के जरिए सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया था।

अदालत ने यह राहत सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों और सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में FIR दर्ज करने के संबंध में जारी दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए दी। अदालत ने साफ कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसारित भाषणों या पोस्ट के आधार पर बिना पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया अपनाए कार्रवाई नहीं की जा सकती।

क्या है पूरा मामला?

प्रभाकर भट्ट ने पुत्तूर टाउन पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इन धाराओं में मुख्य रूप से धर्म, जाति या भाषा के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, धार्मिक भावनाओं को आहत करने, सार्वजनिक शांति भंग करने और सामान्य आशय के तहत अपराध करने जैसे आरोप शामिल हैं।

राज्य सरकार का आरोप है कि प्रभाकर भट्ट के भाषण में ऐसे तत्व थे जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच नफरत या विभाजन की भावना पैदा कर सकते हैं। सरकार का यह भी कहना है कि इस प्रकार के भाषणों से युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

बचाव पक्ष की दलील

सुनवाई के दौरान प्रभाकर भट्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरुणा श्याम ने अदालत में जोरदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सोशल मीडिया पोस्ट या भाषणों के मामलों में केवल कठोर या आलोचनात्मक राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर FIR दर्ज नहीं की जानी चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से ‘तेलंगाना राज्य बनाम नल्ला बालू’ मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों को बरकरार रखा था। इन दिशा-निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी बयान से प्रथम दृष्टया हिंसा, सार्वजनिक अव्यवस्था या घृणा फैलाने का स्पष्ट और ठोस आधार न हो, तो केवल आपत्तिजनक या तीखी भाषा के कारण आपराधिक मामला दर्ज करना उचित नहीं है।

इसके साथ ही बचाव पक्ष ने ‘सतेंद्र कुमार अंटिल बनाम सीबीआई’ मामले का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सख्त निर्देश दिए थे और कहा था कि गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि शुरुआती कदम।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला एक ऐसे भाषण से जुड़ा है, जिसे बाद में सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में कार्रवाई करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत आरोपी को पहले नोटिस जारी कर उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत के समक्ष यह स्वीकार किया गया कि वर्तमान मामले में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

इसी आधार पर अदालत ने अगली सुनवाई तक प्रभाकर भट्ट के खिलाफ आगे की जांच पर अंतरिम रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी को निर्धारित की गई है।

कानूनी संदर्भ: क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले?

इस पूरे प्रकरण में जिन फैसलों का उल्लेख हुआ, वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

‘केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल सरकार या किसी व्यवस्था की आलोचना करना देशद्रोह या वैमनस्य फैलाने के बराबर नहीं है, जब तक कि उससे हिंसा या सार्वजनिक अशांति भड़काने का सीधा खतरा न हो।

इसी तरह ‘श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66A को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है और केवल आपत्तिजनक या अप्रिय अभिव्यक्ति को अपराध नहीं माना जा सकता।

इन फैसलों का सार यही है कि कानून का इस्तेमाल सोच-समझकर और संतुलित तरीके से किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का पक्ष

हालांकि राज्य सरकार ने प्रभाकर भट्ट की याचिका का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि भाषण में ऐसे तत्व मौजूद थे जो समुदायों के बीच तनाव पैदा कर सकते हैं। सरकार ने अदालत से आग्रह किया कि जांच जारी रहने दी जाए ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।

सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक मंच से दिए गए भाषणों का प्रभाव व्यापक होता है, खासकर जब वे सोशल मीडिया के जरिए हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में सतर्कता जरूरी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

यह मामला एक बार फिर उस बहस को सामने लाता है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बात होती है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। यदि कोई बयान समाज में हिंसा, नफरत या अशांति को बढ़ावा देता है, तो कानून हस्तक्षेप कर सकता है।

हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देता है कि अदालतें सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में प्रक्रिया और संवैधानिक सिद्धांतों को गंभीरता से ले रही हैं।

अब सबकी नजर 11 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां यह तय होगा कि FIR रद्द होगी या जांच आगे बढ़ेगी। फिलहाल प्रभाकर भट्ट को जांच से अस्थायी राहत मिल गई है, लेकिन मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है।

The Karnataka High Court has granted an interim stay on the investigation into an FIR registered against RSS leader Prabhakar Bhat in connection with a speech delivered in Puttur and later circulated on social media. Referring to recent Supreme Court judgments, including the Satender Kumar Antil case and guidelines upheld from the Telangana High Court regarding social media FIRs, the court emphasized that arrests and criminal proceedings in alleged hate speech cases must follow due process and cannot be initiated mechanically without prima facie evidence of incitement to violence or public disorder.

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