AIN NEWS 1 | मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी को भी हिंदू देवी-देवताओं का अपमानजनक चित्रण करने का अधिकार नहीं है। यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर के साथ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी पोस्ट की गई थी।
यह मामला फेसबुक पर डाले गए एक पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें भगवान कृष्ण की तस्वीर के साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। पोस्ट में लिखा था – “कृष्ण जयंती ऐसे व्यक्ति का उत्सव है, जो नहाती हुई लड़कियों के कपड़े छिपाता था।” इस पोस्ट पर तमिल में दो और टिप्पणियां भी की गईं, जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली थीं।
पुलिस की कार्रवाई पर कोर्ट की नाराज़गी
शिकायतकर्ता पी. परमसिवन ने इस पोस्ट के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। लेकिन फरवरी में तमिलनाडु पुलिस ने एक नकारात्मक रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि फेसबुक की पैरेंट कंपनी Meta से पोस्ट करने वाले यूजर की जानकारी नहीं मिल पाई। मार्च में ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए केस को “अनडिटेक्टेड” घोषित कर बंद कर दिया।
मद्रास हाईकोर्ट ने 4 अगस्त को इस मामले पर सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्यशैली को बेहद लापरवाह बताया। जस्टिस के. मुरली शंकर की बेंच ने कहा कि पुलिस ने केवल फेसबुक से डिटेल पाने की कोशिश की, लेकिन आरोपी को ट्रेस करने के लिए उसकी प्रोफाइल में उपलब्ध व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल नहीं किया। यह जांच गंभीरता और समर्पण के साथ नहीं की गई।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट कहा –
“हिंदू भगवान को अपमानजनक तरीके से चित्रित करना और जानबूझकर करोड़ों लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाना किसी भी हाल में उचित नहीं है। ऐसे कृत्य समाज में नफरत, धार्मिक आक्रोश और सांप्रदायिक तनाव फैला सकते हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए न हो।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के प्रति लोगों में गहरी श्रद्धा होती है। इस प्रकार का कोई भी अपमान समाज के बड़े हिस्से को दुखी कर सकता है और सामाजिक अशांति का कारण बन सकता है।
भगवान कृष्ण की कहानी पर कोर्ट की व्याख्या
हाईकोर्ट ने इस मामले में भगवान कृष्ण से जुड़ी ‘गोपियों के कपड़े छिपाने’ की कथा का संदर्भ देते हुए कहा कि इस घटना को प्रतीकात्मक रूप में देखा जाता है। इसकी कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं, जिनमें से एक यह है कि यह गोपियों की भक्ति की परीक्षा थी — क्या वे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठ सकती हैं।
कोर्ट ने कहा कि यह कहानी आध्यात्मिक खोज और वैराग्य के महत्व को दर्शाती है, इसलिए इसका अपमानजनक चित्रण करना धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक भावनाओं के खिलाफ है।
जांच दोबारा करने का आदेश
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को आदेश दिया कि वह इस मामले की पुनः जांच करे और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करे। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों को संवेदनशीलता और गंभीरता से निपटाना चाहिए, क्योंकि ये समाज की एकता और धार्मिक सद्भाव को प्रभावित कर सकते हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम धार्मिक भावनाएं
कोर्ट ने संतुलन पर जोर देते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन यह अधिकार सीमाओं के भीतर है। जब कोई अभिव्यक्ति दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए और समाज में तनाव फैलाए, तो यह संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के दायरे से बाहर हो जाता है।
यह मामला सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट का विवाद नहीं, बल्कि यह सवाल है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सम्मान के बीच सही संतुलन कैसे कायम रखा जाए। मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला संकेत देता है कि भारतीय न्यायपालिका धार्मिक भावनाओं के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है, और ऐसी घटनाओं में लापरवाही बरतने वाली एजेंसियों को बख्शा नहीं जाएगा।
The Madras High Court has strongly criticized the Tamil Nadu Police for negligence in handling a case involving an offensive Facebook post about Lord Krishna. The court, led by Justice K. Murali Shankar, ordered a fresh investigation within three months and stressed the importance of protecting religious sentiments while ensuring that freedom of speech is not misused to hurt faith. The case originated from a post that made derogatory remarks about Krishna Janmashtami, which the court said could disrupt communal harmony and offend millions of Hindus across India.



















