AIN NEWS 1 | नसीमुद्दीन सिद्दीकी: उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच कांग्रेस पार्टी को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया। खास बात यह है कि यह निर्णय उन्होंने अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार के साथ लिया है।
इस घटनाक्रम के सामने आते ही प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस के भीतर जहां इसे एक गंभीर राजनीतिक नुकसान माना जा रहा है, वहीं विपक्षी दलों की नजर अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अगले कदम पर टिक गई है।
अचानक नहीं था यह फैसला
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कांग्रेस छोड़ने का फैसला अचानक लिया गया कदम नहीं है। इसके पीछे लंबे समय से चल रही आंतरिक असंतुष्टि को बड़ी वजह बताया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, वह पार्टी की कार्यप्रणाली, संगठनात्मक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें यह महसूस हो रहा था कि—
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उनकी राजनीतिक अनुभव और वरिष्ठता का सही उपयोग नहीं किया जा रहा
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जमीनी मुद्दों पर उनकी राय को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा
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प्रदेश संगठन में संवाद की कमी लगातार बढ़ रही है
इन्हीं कारणों ने धीरे-धीरे उन्हें पार्टी से दूरी बनाने के लिए मजबूर किया।
कांग्रेस नेतृत्व से नाराज़गी
पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं। संगठन में बदलाव की मांग, चुनावी रणनीति और जमीनी सक्रियता को लेकर पार्टी के भीतर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी।
बताया जा रहा है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी को यह महसूस होने लगा था कि पार्टी केवल चुनावी समय में सक्रिय होती है, जबकि नियमित राजनीतिक संघर्ष और जनसंपर्क पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।
यह असंतोष समय के साथ इतना गहराता चला गया कि अंततः उन्होंने अलग होने का मन बना लिया।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने क्या कहा?
कांग्रेस छोड़ने की खबरों के बाद खुद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मीडिया से बातचीत में संयमित प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा—
“मैंने कोई जल्दबाज़ी में फैसला नहीं लिया है। अपने समर्थकों, साथियों और शुभचिंतकों से लगातार बातचीत चल रही है। सभी की राय जानने के बाद ही आगे की राजनीतिक दिशा तय की जाएगी।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी भी पार्टी में शामिल होने को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
उनके इस बयान से यह साफ हो गया है कि राजनीतिक विकल्पों पर मंथन जारी है, लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है।
यूपी राजनीति में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कद
नसीमुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय चेहरा रहे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।
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बहुजन समाज पार्टी (BSP) में वे एक प्रभावशाली नेता रहे
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मायावती सरकार में मंत्री पद भी संभाल चुके हैं
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बाद में कांग्रेस में शामिल होकर पार्टी को सामाजिक समीकरण मजबूत करने में मदद देने की कोशिश की
दलित और अल्पसंख्यक वर्गों में उनकी पहचान और पकड़ मानी जाती रही है। यही कारण था कि कांग्रेस को उनसे बड़ी राजनीतिक उम्मीदें थीं।
हालांकि, पार्टी को वह राजनीतिक मजबूती नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
कांग्रेस को क्यों माना जा रहा है यह बड़ा नुकसान?
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस पहले ही सीमित राजनीतिक प्रभाव से जूझ रही है। ऐसे समय में किसी वरिष्ठ नेता का पार्टी छोड़ना केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह संगठनात्मक कमजोरी को भी उजागर करती है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि—
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कांग्रेस को लगातार नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ रहा है
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जमीनी कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ रही है
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बड़े नेताओं को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी नहीं मिल पा रही
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जाना इन्हीं समस्याओं की ओर इशारा करता है।
समर्थकों के बीच भी मंथन तेज
इस फैसले के बाद उनके समर्थकों में भी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। कई समर्थक चाहते हैं कि वह ऐसा राजनीतिक रास्ता चुनें जिससे उनकी आवाज मजबूत बनी रहे।
कई जगहों पर बैठकों और विचार-विमर्श की खबरें भी सामने आ रही हैं। समर्थकों का मानना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का अनुभव और जनाधार किसी भी राजनीतिक मंच पर प्रभाव डाल सकता है।
किस पार्टी का रुख कर सकते हैं?
हालांकि अभी किसी पार्टी का नाम आधिकारिक रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं।
कुछ संभावनाएं सामने आ रही हैं—
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किसी क्षेत्रीय दल में शामिल हो सकते हैं
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पुराने राजनीतिक समीकरणों को फिर से जोड़ सकते हैं
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या फिर स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका अपनाने पर भी विचार संभव है
हालांकि उन्होंने साफ किया है कि सही समय आने पर ही कोई घोषणा की जाएगी।
आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का अगला कदम केवल व्यक्तिगत राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर—
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आगामी चुनावी समीकरणों
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सामाजिक गठजोड़
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और दलों की रणनीति
पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि अब प्रदेश की राजनीति की निगाहें उनके अगले फैसले पर टिकी हुई हैं।
कांग्रेस के लिए चेतावनी संकेत
इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए एक चेतावनी के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि समय रहते संगठनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो ऐसे और झटके पार्टी को भविष्य में भी लग सकते हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां मुकाबला पहले से ही कड़ा है, वहां नेतृत्व की एकजुटता सबसे अहम मानी जाती है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कांग्रेस छोड़ना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। फिलहाल सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में उनका अगला फैसला राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म देगा।
अब देखना यह होगा कि वह किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं —
किसी नए दल की ओर, पुराने राजनीतिक मंच की ओर, या फिर पूरी तरह नई राजनीतिक भूमिका की तरफ।



















