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सऊदी अरब को पाकिस्तान देगा परमाणु तकनीक? रक्षा समझौते पर बड़ा बयान

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AIN NEWS 1 | सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए रक्षा समझौते ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा था कि क्या पाकिस्तान अपनी परमाणु तकनीक सऊदी अरब के साथ साझा करेगा? इस पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने साफ शब्दों में कहा है – “हमारे पास जो भी क्षमताएं हैं, उन्हें सऊदी अरब के साथ साझा किया जाएगा।”

उनका यह बयान इस डील की गंभीरता और रणनीतिक महत्व को दर्शाता है। साथ ही यह भी संकेत देता है कि इस समझौते से भविष्य में और अरब देशों के लिए भी रास्ते खुल सकते हैं।

पाकिस्तान का बयान और सऊदी अरब की उम्मीदें

सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं पर नजर रखे हुए है। रियाद मानता है कि इस्लामाबाद का न्यूक्लियर प्रोग्राम उसके लिए एक सुरक्षा कवच साबित हो सकता है। अब ख्वाजा आसिफ के बयान से सऊदी अरब की उम्मीदों को और मजबूती मिली है।

पाकिस्तान दुनिया में उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिसके पास परमाणु हथियारों का जखीरा है। आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, इस समय पाकिस्तान के पास लगभग 170 परमाणु हथियार मौजूद हैं। वहीं भारत के पास लगभग 172 हथियार हैं।

भले ही पाकिस्तान भारत की संख्या से थोड़ा पीछे है, लेकिन सऊदी अरब जैसे देश के लिए यह बड़ी बात है कि उसे इस्लामाबाद का सहयोग मिल रहा है। इससे उसकी रक्षा नीति और क्षेत्रीय रणनीति को नई दिशा मिल सकती है।

पाकिस्तान का दावा – यह समझौता किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

इस डील को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय सवाल उठने लगे। खासकर पश्चिमी देशों ने इसे लेकर चिंता जताई। लेकिन पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि यह समझौता किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है।

विदेश कार्यालय के प्रवक्ता शफकत खान ने कहा – “सऊदी अरब के साथ हुआ यह परस्पर रक्षा समझौता, दोनों देशों की सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगा। यह कदम क्षेत्र और दुनिया में शांति व स्थिरता को बढ़ावा देने का काम करेगा।”

यानी पाकिस्तान ने यह संकेत देने की कोशिश की कि यह डील केवल सुरक्षा सहयोग और साझेदारी के लिए है, न कि किसी दुश्मन देश के खिलाफ।

समझौते की मुख्य बातें

17 सितंबर 2025 को हुए इस समझौते में यह तय किया गया कि:

  1. यदि किसी भी देश (पाकिस्तान या सऊदी अरब) पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।

  2. दोनों देश रक्षा सहयोग बढ़ाने और संयुक्त सुरक्षा को सुनिश्चित करने पर काम करेंगे।

  3. समझौते का दायरा भविष्य में अन्य अरब देशों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

  4. दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, खुफिया जानकारी और सैन्य प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी साझेदारी होगी।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और हालिया घटनाएं

यह डील ऐसे समय में हुई जब कतर में हमास नेतृत्व पर इजरायली हमला हुआ था। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका लंबे समय से सऊदी अरब और कतर का बड़ा सहयोगी रहा है। ऐसे में पाकिस्तान-सऊदी गठबंधन को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंताएं स्वाभाविक हैं।

दूसरी तरफ, यह समझौता चीन और रूस जैसे देशों के लिए भी रुचि का विषय है। माना जा रहा है कि यह डील मध्य-पूर्व की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।

भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने इस डील पर सीधी आलोचना तो नहीं की, लेकिन चिंता जरूर जताई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस समझौते के असर का गहराई से अध्ययन करेगा।

भारत ने साफ किया कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय शांति और वैश्विक स्थिरता से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखकर आगे की रणनीति तय करेगा।

भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम पहले से ही भारत के खिलाफ सुरक्षा संतुलन बनाने के लिए तैयार किया गया था। अब यदि इसमें सऊदी अरब की भागीदारी बढ़ती है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा नीतियों पर पड़ सकता है।

क्या बढ़ेगी परमाणु प्रसार की आशंका?

पाकिस्तान का बयान भले ही कूटनीतिक शब्दों में आया हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस समझौते से परमाणु तकनीक और हथियारों के प्रसार की आशंका बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान सऊदी अरब को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराता है, तो यह वैश्विक गैर-प्रसार संधि (NPT) और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है।

हालांकि पाकिस्तान NPT का हिस्सा नहीं है, लेकिन फिर भी अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब का यह रक्षा समझौता आने वाले समय में खाड़ी और दक्षिण एशिया की राजनीति को गहराई से प्रभावित करेगा।

एक तरफ जहां पाकिस्तान इसे सुरक्षा सहयोग बताकर शांतिपूर्ण पहल करार दे रहा है, वहीं दूसरी ओर उसका बयान सऊदी अरब को परमाणु तकनीक देने की दिशा में इशारा करता है।

अब देखना यह होगा कि इस समझौते का प्रभाव भारत, अमेरिका और अन्य वैश्विक शक्तियों की रणनीति पर कैसा पड़ता है।

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