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समाजवादी पार्टी से निष्कासित पूजा पाल का खुला पत्र: अखिलेश यादव पर गंभीर आरोप और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर सवाल

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AIN NEWS 1 | उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से संघर्ष, जातीय समीकरण और सत्ता की होड़ से प्रभावित रही है। इसी संदर्भ में समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल का हालिया खुला पत्र चर्चा में है। इस पत्र में उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और सपा की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

पूजा पाल का यह पत्र केवल व्यक्तिगत पीड़ा का बयान नहीं है, बल्कि लंबे समय से सपा के चरित्र, नीतियों और न्याय संबंधी सवालों को भी उजागर करता है।

पूजा पाल कौन हैं?

पूजा पाल उत्तर प्रदेश की तीन बार निर्वाचित हुई जानी-मानी विधायक हैं। उन्होंने राजनीति में कदम उस समय रखा जब उनके पति रंजन पाल की हत्या कर दी गई।

पति की हत्या के बाद पूजा पाल ने न केवल न्याय की लड़ाई लड़ी, बल्कि राजनीति में खुद को स्थापित भी किया। दो बार उन्होंने बिना किसी बड़े दल के समर्थन के विधायक का पद जीता। बाद में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की सलाह पर उन्होंने समाजवादी पार्टी ज्वाइन की और तीसरी बार विधायक बनीं।

उनकी पहचान एक संघर्षशील महिला, अति पिछड़े समाज की बेटी और न्याय की लड़ाई लड़ने वाली नेता के रूप में है।

पति की हत्या और न्याय की लड़ाई

पूजा पाल के पत्र में उनके पति की हत्या का दर्दनाक विवरण है। प्रयागराज की सड़कों पर उनके पति का पीछा किया गया और हत्या कर दी गई। अस्पताल ले जाने के बाद भी उन पर फिर से AK-47 से गोलीबारी हुई। पूजा पाल का आरोप है कि उस समय की सपा सरकार ने अपराधियों को संरक्षण दिया और न्याय दिलाने में कोई मदद नहीं की।

उन्होंने लिखा कि “मेरे पति का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए भी समय पर नहीं दिया गया। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण बेटी शायद ही आज़ाद भारत में दूसरी हो।”

सपा से उम्मीद और फिर निराशा

पूजा पाल का कहना है कि उन्होंने सपा इसलिए ज्वाइन की क्योंकि उन्हें भरोसा था कि अखिलेश यादव अपराधियों के खिलाफ खड़े होंगे। लेकिन उनके अनुसार—

  • सपा में दलित, पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता।

  • पार्टी में मुस्लिम नेताओं को प्राथमिकता दी जाती है, चाहे उनके खिलाफ आरोप ही क्यों न हों।

  • उनके पति के हत्यारों को सजा दिलाने में सपा ने कोई मदद नहीं की।

भाजपा और सपा की तुलना

पत्र में पूजा पाल ने भाजपा और सपा की नीतियों की तुलना की। उनका दावा है कि भाजपा सरकार में अपराधियों को, चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों, सजा मिलती है। इसी वजह से उन्हें और प्रदेश की जनता को भरोसा हुआ कि भाजपा अपराधियों को संरक्षण नहीं देती। उनके पति के हत्यारों को सजा भी भाजपा शासन में मिली।

निष्कासन पर सवाल

पूजा पाल को सपा से इसलिए निष्कासित किया गया क्योंकि उन्होंने कथित रूप से भाजपा प्रत्याशी को वोट दिया। लेकिन उन्होंने कई सवाल उठाए—

  • अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव ने भी कई बार भाजपा या अन्य दलों को समर्थन दिया।

  • सपा नेतृत्व ने अपने कार्यों को गुनाह नहीं माना, लेकिन वही काम पूजा पाल ने किया तो उन्हें सजा दी गई।

उन्होंने लिखा, “आपके लिए यह गुनाह नहीं होता जब आप भाजपा को वोट देते हैं, लेकिन जब मैं करती हूँ, तो मुझे निष्कासित कर दिया जाता है।”

सोशल मीडिया और धमकियां

निष्कासन के बाद सपा के कार्यकर्ताओं की ओर से सोशल मीडिया पर उन्हें गालियां और हत्या की धमकियां मिलीं। पूजा पाल ने आशंका जताई कि जैसे उनके पति की हत्या हुई, उसी तरह उनकी भी हत्या हो सकती है। उन्होंने साफ कहा कि अगर ऐसा हुआ तो जिम्मेदार सपा और अखिलेश यादव होंगे।

जनता पर भरोसा

पूजा पाल ने पत्र का समापन विश्वास के साथ किया। उन्होंने कहा कि सपा से निष्कासन उनके लिए बड़ा दर्द नहीं है क्योंकि उन्होंने इससे भी बड़े दर्द झेले हैं। उन्हें भरोसा है कि उत्तर प्रदेश की जनता, खासकर पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित समाज, उनके साथ खड़ा होगा।

राजनीतिक विश्लेषण

  1. जातीय समीकरण पर असर
    सपा लंबे समय से यादव-मुस्लिम समीकरण पर आधारित रही है। पूजा पाल के आरोप पिछड़ा और दलित वर्ग की असंतुष्टि को उजागर करते हैं।

  2. महिला नेतृत्व और सम्मान
    अगर संघर्षशील महिला नेताओं को सम्मान नहीं मिलता, तो आम महिला कार्यकर्ताओं के लिए यह संदेश नकारात्मक होगा।

  3. भाजपा के लिए अवसर
    पत्र में भाजपा के प्रति सकारात्मक रुख नजर आता है, जो पिछड़े और दलित समाज में भाजपा की पकड़ मजबूत कर सकता है।

  4. अखिलेश यादव की छवि पर असर
    पत्र ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या अखिलेश यादव वास्तव में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं या केवल एक वर्ग विशेष की राजनीति कर रहे हैं।

पूजा पाल का यह खुला पत्र केवल व्यक्तिगत दर्द नहीं, बल्कि सपा के भीतर की राजनीति और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करता है। दलित, पिछड़े और महिला नेताओं की भूमिका को अनदेखा करना किसी भी पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है।

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