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प्रयागराज का नैनी ब्रिज: 160 साल पुराना पुल, इंजीनियरिंग का चमत्कार और रहस्यमयी किस्सों का केंद्र!

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The Legendary Naini Bridge of Prayagraj: History, Engineering Marvel, and Haunted Legends

प्रयागराज का नैनी ब्रिज: इंजीनियरिंग का अजूबा और रहस्यमयी कहानियों का केंद्र

AIN NEWS 1: प्रयागराज, जिसे ऐतिहासिक रूप से इलाहाबाद भी कहा जाता है, तीन नदियों—गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती—के संगम पर बसा एक महानगर है। यहां अंग्रेजों के ज़माने में बनाए गए तीन लोहे के पुल हैं जो रेलवे संपर्क के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं में से एक है नैनी ब्रिज, जो न सिर्फ इंजीनियरिंग की एक मिसाल है, बल्कि इतिहास और रहस्यों से भी जुड़ा हुआ है।

🛠️ ब्रिज की रचना और विशेषताएं

नैनी ब्रिज एक डबल डेक स्टील ट्रस ब्रिज है, जो प्रयागराज के मुख्य भाग को नैनी से जोड़ता है। इसका ऊपरी हिस्सा रेलवे लाइन के लिए है और निचला भाग सड़क यातायात के लिए उपयोग होता है। यह ब्रिज दिल्ली-हावड़ा रेल रूट का हिस्सा है, जो देश का सबसे व्यस्त मार्ग माना जाता है।

इस पुल का निर्माण 1859 में शुरू हुआ और 15 अगस्त 1865 को इसे ट्रेन संचालन के लिए खोल दिया गया। इसे अलेक्जेंडर मीडोज रेंडेल और उनके पिता जेम्स मीडोज रेंडेल ने डिजाइन किया था, और ब्रिटिश इंजीनियर मिस्टर सिवले ने निर्माण कार्य की अगुवाई की थी।

📏 आंकड़ों में नैनी ब्रिज

लंबाई: 3150 फीट

निर्माण लागत: 44 लाख 46 हजार 300 रुपये

निर्माण अवधि: 6 साल

ईंट और गारे की मात्रा: 30 लाख क्यूबिक

पिलर्स की संख्या: 17

प्रमुख स्पैन की लंबाई: 13 स्पैन – 61 मीटर (200 फीट)

अन्य स्पैन: 2 स्पैन – 12.20 मीटर, 1 स्पैन – 9.18 मीटर

लोहे का उपयोग: 4300 टन

पिलर का आकार: हाथी पांव या शू शेप (जूते के आकार का)

🕌 इतिहास से जुड़ी परतें

इस पुल के निर्माण में प्रयागराज की जामा मस्जिद के पत्थरों का उपयोग हुआ, जिसे 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने ध्वस्त कर दिया था। यह मस्जिद अकबर द्वारा बनवाई गई थी और 10 हजार लोगों की एक साथ नमाज की क्षमता रखती थी। मस्जिद के पत्थरों को पुल के पिलर में लगाया गया, जो आज भी उसकी कहानी कहता है।

🧱 13 नंबर पिलर की चुनौती

नैनी ब्रिज के सभी पिलर लगभग 1862 तक बन चुके थे, लेकिन पिलर नंबर 13 को बनाने में सबसे ज्यादा परेशानी हुई। यह यमुना के उस हिस्से में बनना था जहां बहाव बहुत तेज था। दिनभर की मेहनत रात होते-होते पानी में बह जाती थी। ब्रिटिश इंजीनियर मिस्टर सिवले ने अपनी डायरी में लिखा कि यह पिलर उनकी नींद और शांति छीन चुका था।

एक रात उन्होंने सपना देखा कि उनकी पत्नी ऊँची हिल वाली सैंडल पहनकर उसी तेज बहाव वाले पानी में खड़ी है और पानी उसकी सैंडल के चारों ओर से निकल रहा है। उन्होंने उसी डिज़ाइन पर आधारित एक पिलर तैयार कराया जो आज “हाथी पांव” या “जूते के आकार” में प्रसिद्ध है।

इस विशेष पिलर को बनाने में 20 महीने का समय लग गया और इसकी डिज़ाइन आज भी इंजीनियरिंग की दुनिया में अनोखी मानी जाती है।

🩸 मानव बलि की किंवदंती

स्थानीय कथाओं के अनुसार, पिलर नंबर 13 को बनाने के लिए एक मानव बलि दी गई थी। कहा जाता है कि जब तक यह बलि नहीं दी गई, तब तक पिलर बार-बार गिरता रहा। यमुना के जल स्तर को 9 फीट नीचे कर एक कुआं खोदा गया, जहां बलि दी गई और इसके बाद ही पिलर की नींव जम पाई।

👻 रहस्यमयी कहानियां और भूतिया दास्तानें

पुल से जुड़े इलाके में भूत-प्रेत से जुड़ी कई कहानियां भी प्रचलित हैं:

कहा जाता है कि बलिदान दिया गया व्यक्ति रात के समय हाथी पांव आकार के पिलर पर बैठा देखा जा सकता है।

पुल के पास स्थित इलाहाबाद डिग्री कॉलेज के पास एक हंटेड हाउस है, जिस पर डिस्कवरी चैनल ने कई एपिसोड्स बनाए हैं।

पास में स्थित एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट में कई बार लोगों के गायब होने की खबरें आ चुकी हैं।

नैनी रेलवे स्टेशन, जो इसी पुल से जुड़ा हुआ है, उसे भी एक भूतहा स्टेशन माना जाता है जहां रात के समय उस बलिदान दिए व्यक्ति की आत्मा देखे जाने की बात कही जाती है।

The Naini Bridge in Prayagraj is one of India’s oldest and longest steel truss bridges, built during the British era over the Yamuna River. Known for its unique engineering, especially the iconic “elephant foot” pillar number 13, this historical railway bridge connects the bustling Delhi-Howrah route. Beyond its structural marvel, Naini Bridge is also wrapped in haunted legends and ghost stories, making it a mysterious landmark. Tourists and history lovers often visit this iconic bridge to explore its architecture, deep myths, and ghostly tales near the haunted Naini Railway Station and Agriculture Institute.

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