AIN NEWS 1: प्रयागराज में चल रहे पावन माघ मेले से शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दुखी मन के साथ विदा लेने का ऐलान कर दिया है। यह निर्णय न सिर्फ उनके लिए, बल्कि संत समाज और लाखों श्रद्धालुओं के लिए भी भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाला है। बुधवार सुबह आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य ने बेहद शांत लेकिन पीड़ा से भरे स्वर में कहा कि वह पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ माघ मेला में आए थे, लेकिन हालात ऐसे बन गए कि उन्हें बिना गंगा स्नान किए ही वापस लौटने का फैसला करना पड़ा।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि प्रयागराज की धरती को वे हमेशा से शांति, विश्वास और सनातन परंपराओं की जीवंत प्रतीक मानते आए हैं। यह वही नगरी है, जहां साधु-संतों का समागम होता है, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम भारतीय संस्कृति की आत्मा को दर्शाता है। ऐसे पवित्र स्थान से इस तरह लौटना उनके लिए बेहद कष्टदायक है।
उन्होंने बताया कि माघ मेला में स्नान करना उनके लिए केवल एक धार्मिक परंपरा या रस्म नहीं था, बल्कि यह उनकी गहरी आस्था और आत्मिक शुद्धि से जुड़ा विषय था। शंकराचार्य के शब्दों में, “माघ मेला में स्नान आत्मा को शांति देने वाला कर्म होता है, लेकिन दुर्भाग्यवश परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि इस आस्था को पूर्ण नहीं किया जा सका।”
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शंकराचार्य ने किसी व्यक्ति विशेष या संस्था पर सीधा आरोप नहीं लगाया, लेकिन यह जरूर कहा कि माघ मेला में एक ऐसी घटना घटी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। उन्होंने कहा कि उसी घटना ने उनके मन को भीतर तक व्यथित कर दिया और उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि ऐसे माहौल में रुकना उचित नहीं होगा।
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उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह निर्णय उन्होंने किसी आवेश में नहीं, बल्कि गहन आत्ममंथन के बाद लिया है। शंकराचार्य ने कहा, “मैं यहां किसी विवाद या टकराव के लिए नहीं आया था। मेरी उपस्थिति का उद्देश्य केवल आस्था, साधना और सनातन परंपराओं के पालन तक सीमित था। लेकिन जब वातावरण ही अनुकूल न रहे, तो साधु के लिए पीछे हट जाना ही बेहतर होता है।”
शंकराचार्य के इस फैसले के बाद संत समाज में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। कई संतों और अखाड़ों के महंतों ने इस घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। ऐसे आयोजन में किसी भी संत का दुखी होकर लौटना गंभीर सवाल खड़े करता है।
श्रद्धालुओं में भी इस खबर को लेकर निराशा देखी जा रही है। कई लोगों का कहना है कि शंकराचार्य जैसे प्रतिष्ठित धर्मगुरु की उपस्थिति से माघ मेले की गरिमा और बढ़ जाती है। उनके बिना स्नान किए लौटने की खबर ने आम भक्तों के मन में भी पीड़ा पैदा कर दी है।
हालांकि, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि उनका यह निर्णय सनातन परंपराओं के प्रति उनकी निष्ठा को कम नहीं करता। उन्होंने कहा कि आस्था केवल किसी एक स्थान या आयोजन तक सीमित नहीं होती। सच्ची श्रद्धा मन और कर्म में होती है, और वही हमेशा बनी रहेगी।
उन्होंने प्रयागराज की जनता और श्रद्धालुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि इस पवित्र नगरी के प्रति उनके मन में सदैव आदर रहेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में माघ मेला फिर उसी शांति, मर्यादा और आध्यात्मिक वातावरण के साथ आयोजित होगा, जिसके लिए यह विश्वभर में प्रसिद्ध है।
शंकराचार्य के इस निर्णय ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों में व्यवस्थाओं और माहौल की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। जब आस्था के केंद्र में असहजता पैदा हो, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है।
फिलहाल, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रयागराज से विदा ले चुके हैं, लेकिन उनका यह मौन संदेश लंबे समय तक चर्चा में बना रहेगा। संत समाज और प्रशासन दोनों के लिए यह आत्मचिंतन का विषय बन गया है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।
Shankaracharya Avimukteshwaranand’s decision to leave the Prayagraj Magh Mela without taking a holy dip has sparked widespread discussion among saints and devotees. The incident has brought renewed focus on Magh Mela arrangements, Sanatan traditions, and the spiritual significance of Prayagraj as a major religious center in India.






