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‘आरोपी होकर पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकते हैं?’: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ‘मोहम्मद’ दीपक को लगाई कड़ी फटकार!

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AIN NEWS 1: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार से जुड़े एक विवादित मामले में खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताने वाले जिम मालिक दीपक कुमार की याचिका पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति खुद एक मामले में आरोपी है, वह पुलिस सुरक्षा की मांग कैसे कर सकता है। कोर्ट ने इस तरह की मांग को न केवल अनुचित बताया बल्कि इसे जांच पर दबाव बनाने की कोशिश भी करार दिया।

अदालत की कड़ी टिप्पणी

यह मामला गुरुवार (19 मार्च) को हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने दीपक कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की तरफ से किए गए कुछ अनुरोध पूरी तरह अनावश्यक और अनुचित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिकाएं अक्सर जांच एजेंसियों पर दबाव बनाने के लिए दाखिल की जाती हैं।

पीठ ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि दीपक कुमार ने अपनी याचिका में पुलिस सुरक्षा की मांग की है, जबकि वह खुद इस मामले में संदिग्ध आरोपी हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि “जब कोई व्यक्ति खुद जांच के घेरे में है, तो उसे सुरक्षा देने का औचित्य क्या है?”

मामला क्या है?

यह पूरा मामला कोटद्वार में 26 जनवरी को हुई एक घटना से जुड़ा है। आरोप है कि दीपक कुमार का विवाद बजरंग दल के कुछ सदस्यों और एक मुस्लिम दुकानदार के बीच हुआ था। विवाद की वजह दुकान के नाम को लेकर बताया गया है।

जानकारी के मुताबिक, एक मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद ने अपनी दुकान का नाम ‘बाबा’ रखा था, जिस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। इसी दौरान विवाद बढ़ गया और मामला मारपीट तक पहुंच गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद पुलिस ने दीपक कुमार के खिलाफ दंगा, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के आरोपों में FIR दर्ज कर ली।

FIR रद्द करने की मांग

दीपक कुमार ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस FIR को रद्द करने की मांग की है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी मांग की कि कथित तौर पर घृणा फैलाने वाले लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 के तहत कार्रवाई की जाए।

याचिका में एक और महत्वपूर्ण मांग यह थी कि दीपक और उनके परिवार को पुलिस सुरक्षा दी जाए। साथ ही, उन्होंने कुछ पुलिस अधिकारियों पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ विभागीय जांच की मांग भी की।

कोर्ट ने क्यों जताई आपत्ति?

अदालत ने इन मांगों को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जब जांच अभी जारी है, तब इस तरह की मांग करना जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्तर पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करना भी उचित नहीं है, क्योंकि अभी तक आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है।

जांच अधिकारी ने भी अदालत को बताया कि दीपक कुमार को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। इस पर कोर्ट ने और भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि सुरक्षा की मांग पूरी तरह से बेबुनियाद लगती है

💬 “यह जांच को प्रभावित करने की कोशिश है”

सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि इस तरह की याचिकाएं अक्सर जांच को प्रभावित करने और मामले को सनसनीखेज बनाने के उद्देश्य से दायर की जाती हैं। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल इस तरह से नहीं किया जाना चाहिए।

दान राशि पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। अदालत के संज्ञान में यह बात लाई गई कि घटना के बाद दीपक कुमार को उनके समर्थकों से आर्थिक मदद मिली थी।

जब कोर्ट ने इस पर सवाल किया तो दीपक ने बताया कि उन्हें करीब 80,000 रुपये दान के रूप में मिले थे। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि बाद में उन्होंने अपने खाते की गतिविधियां बंद कर दीं।

अन्य FIR का मामला

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि दीपक कुमार की शिकायत के आधार पर दो अन्य FIR भी दर्ज की गई हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि यदि इस संबंध में कोई ठोस शिकायत है, तो उसे भी अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए।

अदालत का सख्त संदेश

इस पूरे मामले में हाई कोर्ट का रुख साफ तौर पर सख्त नजर आया। अदालत ने यह संदेश देने की कोशिश की कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पक्ष का हो, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं कर सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने से पहले इस तरह की राहत मांगना उचित नहीं है और इससे न्यायिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

कोटद्वार विवाद से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आरोपी अपने बचाव के लिए न्यायालय का इस्तेमाल दबाव बनाने के रूप में कर सकते हैं। हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत इस तरह के प्रयासों को गंभीरता से ले रही है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई में यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत क्या रुख अपनाती है और जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।

The Uttarakhand High Court strongly criticized Mohammad Deepak (Deepak Kumar) for seeking police protection while being an accused in the Kotdwar dispute case. The court questioned the legality of such a plea and termed it an attempt to influence the ongoing investigation. The case, linked to a viral video involving a Bajrang Dal dispute and a shop naming controversy, has raised serious concerns about misuse of legal processes, FIR cancellation pleas, and judicial intervention in India.

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