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एएसआई संदीप लाठर की कहानी: दो गोलियां, 8 लाख का कर्ज और एक ऐसा सच जिसने हिला दिया पुलिस तंत्र को!

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AIN NEWS 1: रोहतक के एएसआई संदीप लाठर की आत्महत्या ने पूरे हरियाणा पुलिस सिस्टम को झकझोर दिया है। एडीजीपी वाई पूरण कुमार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने के बाद संदीप ने खुद को गोली मार ली थी। लेकिन उनकी कहानी केवल एक आत्महत्या की घटना नहीं है — यह एक ऐसे पुलिसकर्मी की दास्तान है जिसने दो बार गोलियां खाईं, कर्ज से जूझा, परिवार की जिम्मेदारियों में डूबा और आखिरकार व्यवस्था की कठोर सच्चाई से हार गया।

 दो बार मुठभेड़ में लगी गोली, फिर भी ड्यूटी पर लौटे संदीप

संदीप लाठर का करियर संघर्षों से भरा था। उनके चचेरे भाई बचपन सिंह लाठर बताते हैं कि संदीप पहले गुरुग्राम पुलिस में तैनात थे। एक बार मुठभेड़ के दौरान उनके पैर में गोली लगी थी। कुछ समय के बाद जब वे रोहतक में ट्रांसफर होकर आए, तब भी एक मुठभेड़ में बोहर इलाके में हुए हमले के दौरान दूसरी गोली उनके दूसरे पैर में लगी।

इन दोनों घटनाओं के बावजूद, संदीप ने कभी ड्यूटी छोड़ने या डरने का नाम नहीं लिया। घायल होने के बाद भी उन्होंने खुद को संभाला और फिर से पुलिस की वर्दी पहनकर मैदान में उतर आए। सहकर्मियों के अनुसार, संदीप कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे।

आठ लाख का कर्ज और परिवार की चिंता

संदीप के दोस्त भूप सिंह बताते हैं कि उनकी मौत के बाद परिवार पर लगभग आठ लाख रुपये का कर्ज रह गया है। उनकी पत्नी संतोष और बच्चों पर अब इस कर्ज को चुकाने की जिम्मेदारी आ गई है। संदीप का पैतृक घर जुलाना में है, जहां उनके पास 80 गज का छोटा-सा मकान है।

भूप सिंह के मुताबिक, आत्महत्या से दो दिन पहले संदीप जुलाना आए थे। यहां वे एक पंचायत में शामिल हुए थे जो पैसों के लेनदेन के विवाद को लेकर बुलाई गई थी। पूरे समय वे पीछे बैठकर चुपचाप सब सुनते रहे। गांव के बुजुर्गों ने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि संदीप अपने जीवन के अंतिम दिनों में सबका आशीर्वाद लेने आए हैं।

संदीप का आखिरी दिन — एक सामान्य दिन जैसा

भूप सिंह बताते हैं कि उस दिन संदीप ने कभी ऐसा संकेत नहीं दिया कि वे आत्महत्या करने जा रहे हैं। पंचायत खत्म होने के बाद वे कार में बैठकर रोहतक लौट आए। रास्ते में चार घंटे तक साथ रहे, बातचीत भी हुई, लेकिन कहीं से भी यह नहीं लगा कि संदीप अंदर से टूट चुके हैं।

उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि “एडीजीपी वाई पूरण कुमार वाले मामले को गलत तरीके से जातिगत रंग दिया जा रहा है।” जब भूप सिंह ने पूछा कि क्या तुम्हारा इस पूरे मामले से कोई लेना-देना है? संदीप चुप रहे — बस यही खामोशी शायद सबसे बड़ा संकेत थी कि भीतर कुछ गहरा चल रहा है।

साइबर सेल में महारत, लेकिन अंदर था तनाव

संदीप तकनीकी रूप से बहुत सक्षम पुलिसकर्मी थे। उनके दोस्त बताते हैं कि उन्होंने साइबर सेल के अपने साथी सुरेंद्र से साइबर जांच की बारीकियां सीखी थीं और खुद मेहनत करके एक्सपर्ट बन गए थे। वे मामलों को सुलझाने में निपुण थे और कई बार अपने वरिष्ठों से भी आगे निकल जाते थे।

लेकिन उनकी यही दक्षता शायद कई लोगों को अखरने लगी थी। जब उन्होंने एडीजीपी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, तो विभाग के भीतर माहौल बदल गया। उन्हें मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा, और धीरे-धीरे वे अंदर से टूटते चले गए।

गढ़मुक्तेश्वर में प्रवाहित हुई अस्थियां

संदीप की अस्थियों को शुक्रवार को उनके परिवार ने गढ़मुक्तेश्वर स्थित गंगा में प्रवाहित किया। दीपावली के बाद मुख्यमंत्री के ओएसडी वीरेंद्र बड़खालसा के परिवार से मिलने आने की संभावना है। पत्नी संतोष उनसे मिलकर संदीप के बच्चों के भविष्य और नौकरी के लिए आवेदन करेंगी।

परिवार के अनुसार, संदीप हमेशा अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए चिंतित रहते थे। लेकिन जो हालात बने, उन्होंने उन्हें निराशा की कगार पर पहुंचा दिया।

 क्या होगी निष्पक्ष जांच?

संदीप की आत्महत्या के बाद सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि जांच एसआईटी करेगी या नहीं। फिलहाल केस सदर थाने के प्रभारी इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह के पास है। वे सारे साक्ष्य जुटा रहे हैं।

संदीप के विसरा (viscera) को जांच के लिए मधुबन फॉरेंसिक लैब में भेजा गया है।

जन संगठनों का प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट से जांच की मांग

रोहतक में कई जन संगठनों ने इस पूरे प्रकरण पर गुस्सा जताया और सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। संगठनों ने राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपते हुए मांग की कि इस पूरे मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराई जाए।

प्रदर्शन से पहले मानसरोवर पार्क में बैठक हुई, जिसमें वक्ताओं ने कहा कि जब पुलिस जैसे विभाग में अधिकारी खुदकुशी करने लगें, तो यह पूरे शासनतंत्र की नाकामी का प्रमाण है। लोगों ने प्रदेश में बढ़ती भ्रष्टाचार प्रवृत्ति और जातीय राजनीति की भी निंदा की।

सिस्टम पर सवाल और समाज के लिए संदेश

संदीप लाठर की मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं —

क्या ईमानदारी आज भी पुलिस विभाग में सजा बन गई है?

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना आत्मघाती कदम साबित हो रहा है?

और क्या हमारी व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि एक ईमानदार अफसर की चुप्पी हमेशा के लिए सन्नाटा बन जाए?

संदीप की कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की है जिसमें ईमानदारी के लिए जगह छोटी पड़ती जा रही है।

संदीप लाठर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे छोड़े गए सवाल अभी भी ज़िंदा हैं। शायद उनकी आत्मा को सच्ची शांति तभी मिलेगी जब उनके परिवार को न्याय और सुरक्षा दोनों मिलें।

ASI Sandeep Lathar’s tragic story reveals the deep-rooted problems within the Haryana Police system. Despite surviving two gunshot injuries and carrying an 8 lakh rupee debt, he continued to serve with dedication. However, after accusing ADGP Puran Kumar of corruption, Sandeep faced immense pressure and took his own life. His death has sparked public outrage, with demands for a Supreme Court-monitored investigation. This case highlights issues of corruption, mental stress, and accountability in the Indian police force.

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