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बंदरों के बढ़ते आतंक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगी ठोस कार्ययोजना और कार्रवाई रिपोर्ट

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AIN NEWS 1 | उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रहे बंदरों के आतंक और मानव-बंदर संघर्ष के गंभीर होते हालात को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। इस मुद्दे पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने राज्य सरकार से केवल भविष्य की योजनाओं पर आश्वासन देने के बजाय जमीन पर उठाए गए वास्तविक कदमों का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

यह मामला समाज में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं से जुड़ा हुआ है, क्योंकि प्रदेश के कई शहरों और कस्बों में बंदरों के हमले, लोगों को घायल करने की घटनाएं और सार्वजनिक जीवन में बाधा बनने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

जनहित याचिका में उठाया गया गंभीर मुद्दा

यह जनहित याचिका विनीत शर्मा एवं प्रजाक्ता सिंहल द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी। याचिका में बताया गया कि प्रदेश के कई जिलों में बंदरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे आम नागरिकों का जीवन प्रभावित हो रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और बाजारों में आने-जाने वाले लोग लगातार खतरे का सामना कर रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय को अवगत कराया कि प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान की कमी के कारण समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।

खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई

मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी एवं माननीय न्यायमूर्ति कुनाल रवि सिंह की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस विषय को केवल स्थानीय समस्या न मानते हुए इसे जनसुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा बताया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता पवन कुमार तिवारी और आकाश वशिष्ठ ने प्रभावी ढंग से पक्ष रखा और अदालत को विभिन्न जिलों में बंदरों से जुड़ी घटनाओं की जानकारी दी।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल न्यायालय में उपस्थित हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि रीसस मकाक (Rhesus Macaque) प्रजाति के बंदरों की वास्तविक संख्या, उनके सक्रिय क्षेत्रों (हॉटस्पॉट) तथा मानव-बंदर संघर्ष की स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत सर्वेक्षण किया जाना आवश्यक है।

सरकार ने यह भी बताया कि इस सर्वेक्षण को पूरा करने में लगभग एक वर्ष का समय लग सकता है। इसके साथ ही एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर दिया गया है, जो वर्तमान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुसार कार्य कर रही है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख

हालांकि न्यायालय ने सरकार द्वारा प्रस्तुत भविष्य की योजना को नोट किया, लेकिन केवल प्रस्तावित कार्ययोजना पर संतोष व्यक्त नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि समस्या वर्तमान में गंभीर है और तत्काल प्रभाव से उठाए गए कदमों की जानकारी देना आवश्यक है।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि जिला स्तर पर अब तक किए गए ठोस कार्यों का विवरण शपथपत्र (Affidavit) के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए।

विशेष रूप से गाजियाबाद और मथुरा जिलों में बंदरों की समस्या अधिक होने के कारण वहां किए गए उपायों की विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष रखने को कहा गया है।

सभी जिलों से मांगी गई कार्रवाई रिपोर्ट

अदालत ने केवल चुनिंदा क्षेत्रों तक ही निर्देश सीमित नहीं रखे, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के संदर्भ में विस्तृत एक्शन प्लान मांगा है। न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि:

  • वर्तमान एसओपी के तहत क्या कार्रवाई हुई

  • बंदरों की रोकथाम के लिए कौन-कौन से उपाय अपनाए गए

  • जिला प्रशासन द्वारा क्या व्यवस्थाएं की गईं

  • भविष्य में समस्या रोकने के लिए क्या रणनीति बनाई गई

इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट और तथ्यात्मक रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले प्रस्तुत की जाए।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर जोर

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि बंदरों की बढ़ती संख्या का सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि बिना वैज्ञानिक डेटा के स्थायी समाधान तैयार करना कठिन है।

इसी कारण सरकार द्वारा प्रस्तावित सर्वेक्षण को महत्वपूर्ण बताया गया, लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण पूरा होने तक प्रशासन निष्क्रिय नहीं रह सकता।

जनता की सुरक्षा बनी प्राथमिक चिंता

प्रदेश के कई शहरी और धार्मिक क्षेत्रों में बंदरों के कारण लोगों को रोजमर्रा की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मंदिरों, बाजारों और रिहायशी इलाकों में बंदरों के झुंडों द्वारा खाद्य सामग्री छीनने, घरों में घुसने और लोगों पर हमला करने की घटनाएं आम हो चुकी हैं।

न्यायालय की टिप्पणी से स्पष्ट संकेत मिला कि प्रशासनिक जवाबदेही तय करना अब आवश्यक हो गया है।

अगली सुनवाई की तारीख तय

मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है। तब तक राज्य सरकार को विस्तृत शपथपत्र के माध्यम से अपनी कार्रवाई रिपोर्ट और भविष्य की रणनीति अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।

प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश केवल बंदरों की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर केवल योजनाएं नहीं, बल्कि वास्तविक कार्रवाई आवश्यक है।

यदि राज्य सरकार प्रभावी कदम उठाती है, तो इससे प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए एक स्थायी मॉडल विकसित हो सकता है।

ऑफिसियल ऑर्डर पढ़ें

 

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