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इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: भीड़ हिंसा को बताया कानून की विफलता, पुलिस पर झूठे केस दर्ज करने के आरोप!

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AIN NEWS 1: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बढ़ती भीड़ हिंसा और गौ-रक्षा के नाम पर हो रहे उत्पीड़न को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आजकल भीड़ हिंसा, लिंचिंग और “विजिलेंटिज्म” (स्वयंभू न्याय) सामान्य बात हो गई है, जो सीधे तौर पर कानून के शासन की विफलता को दर्शाती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब पुलिस और प्रशासन पीड़ितों की मदद करने की बजाय, उन्हीं के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर रहे हैं — जो न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

 मामला क्या था

यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका राहुल यादव नामक व्यक्ति की थी, जिसकी बोलेरो गाड़ी में नौ गोवंशीय पशु मिले थे। पुलिस ने तुरंत ही उस पर “गोहत्या रोकथाम कानून” के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया।

लेकिन जब अदालत ने रिकॉर्ड देखा तो पाया कि न तो पशु मरे हुए थे, न ही यह साबित हुआ कि उन्हें किसी अवैध काम के लिए ले जाया जा रहा था। वाहन राज्य की सीमा के भीतर था और उसका चालक वही व्यक्ति नहीं था जिस पर आरोप लगाया गया था।

कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानून के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है। जजों ने कहा कि ऐसे मुकदमे न केवल न्याय की भावना को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि “कानून की साख” को भी गिराते हैं।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में कहा —

 “Mob violence, lynching and vigilantism have become the order of the day, reflecting a failure of rule of law.”

(भीड़ हिंसा, लिंचिंग और स्वयंभू न्याय अब आम बात हो गई है, जो कानून के शासन की असफलता को दर्शाती है।)

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार और पुलिस को यह समझना होगा कि “कानून का उद्देश्य लोगों की रक्षा करना है, न कि किसी वर्ग या व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना।”

 गौ-हत्या कानून का दुरुपयोग

कोर्ट ने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश गोहत्या निवारण अधिनियम, 1955 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका गलत उपयोग किया जा रहा है। कई मामलों में सिर्फ पशु परिवहन या व्यापार को भी “गौहत्या की कोशिश” बताकर मुकदमे बना दिए जाते हैं।

अदालत ने इसे “फ्रिवलस एफआईआर” (अर्थात् निरर्थक या मनगढ़ंत एफआईआर) कहा और कहा कि यह प्रवृत्ति खतरनाक है।

 सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) मामले का हवाला दिया, जिसमें लिंचिंग और भीड़ हिंसा से निपटने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक उन दिशा-निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया है।

अदालत ने प्रदेश के गृह सचिव और डीजीपी से व्यक्तिगत हलफनामा (affidavit) मांगा है कि उन्होंने इस दिशा में अब तक क्या कदम उठाए हैं।

 प्रशासन की भूमिका पर सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन का रवैया चिंताजनक है। जिन लोगों को सुरक्षा मिलनी चाहिए, वही लोग अक्सर गलत तरीके से अभियुक्त बना दिए जाते हैं। अदालत ने कहा कि इससे न केवल निर्दोषों का जीवन बर्बाद होता है, बल्कि आम जनता में न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर होता है।

जजों ने टिप्पणी की कि यदि पुलिस अपनी भूमिका निष्पक्षता से नहीं निभाती, तो “कानून का शासन” केवल किताबों में रह जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून को हथियार की तरह नहीं, बल्कि ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

 क्या कहा कोर्ट ने आगे के लिए

अदालत ने आदेश दिया कि राज्य सरकार एक विस्तृत रिपोर्ट दे कि उसने सुप्रीम कोर्ट के लिंचिंग संबंधी दिशा-निर्देशों को लागू करने के लिए क्या किया है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया कि गौ-रक्षा के नाम पर झूठे मामलों की जांच और कार्रवाई की निगरानी कौन कर रहा है।

कोर्ट ने कहा कि सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि भीड़ हिंसा और झूठे मुकदमों को रोकने के लिए अलग से स्पेशल टास्क फोर्स या निगरानी समिति गठित की जाए।

 सामाजिक संदेश

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। यह संकेत देती है कि “भीड़ न्याय” और “राजनीतिक संरक्षण” के चलते आम नागरिकों के अधिकार खतरे में हैं। अदालत ने साफ कहा कि “राज्य की निष्क्रियता” इस स्थिति को और गंभीर बना रही है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख न्याय और लोकतंत्र के हित में बेहद अहम है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में भीड़ को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पुलिस और प्रशासन का काम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि उन्हें डराना या झूठे मामलों में फंसाना।

अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस पर क्या ठोस कदम उठाती है और क्या वास्तव में भीड़ हिंसा पर नकेल कसने के लिए कोई प्रभावी नीति बनाई जाती है या नहीं।

The Allahabad High Court strongly criticized the Uttar Pradesh government over increasing mob violence and misuse of the cow slaughter law. The court said that vigilantism, lynching, and false FIRs have become common in UP, indicating a complete failure of the rule of law. It also highlighted that the UP Police are filing false cases against victims instead of protecting them. The court demanded affidavits from the Home Secretary and DGP on implementing Supreme Court’s Tehseen Poonawalla guidelines against mob lynching. This judgment underscores the urgent need for legal accountability and police reform in India.

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