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एसीबी जांच में चौंकाने वाला खुलासा — एफआईआर से लेकर एफआर तक पुलिस ने बना रखी थी रिश्वत की ‘रेट लिस्ट’

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AIN NEWS 1 जयपुर। राजस्थान में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की जांच ने पुलिस विभाग के अंदर फैले घूसखोरी के गहरे जाल को उजागर कर दिया है। पिछले डेढ़ साल में की गई एसीबी ट्रैप कार्रवाइयों की पड़ताल से सामने आया कि राज्यभर में पुलिसकर्मियों ने अपने-अपने स्तर पर ‘रेट कार्ड’ बना रखे हैं — जहां हर काम की एक तय कीमत है।

चाहे एफआईआर दर्ज करवानी हो, केस में एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगवानी हो, गिरफ्तारी रुकवानी हो या किसी आरोपी का नाम हटवाना हो, हर काम की अपनी कीमत तय है। इन रेट्स की रकम ₹1,000 से लेकर ₹5 लाख तक जाती है, यह इस पर निर्भर करता है कि मामला कितना गंभीर या फायदेमंद है।

‘सच बेधड़क’ की विशेष पड़ताल के अनुसार, जनवरी 2022 से अब तक एसीबी ने 100 से अधिक पुलिसकर्मियों को रिश्वत लेते हुए पकड़ा है। इन गिरफ्तारियों में कांस्टेबल से लेकर एडिशनल एसपी तक के अधिकारी शामिल हैं। यह खुलासा न केवल सिस्टम की सच्चाई सामने लाता है, बल्कि यह बताता है कि आम जनता का भरोसा कैसे पैसों के लेन-देन पर टिका हुआ है।

कैसे उजागर हुआ भ्रष्टाचार का नेटवर्क

एसीबी की कार्रवाईयों में यह पाया गया कि ज्यादातर मामलों में पुलिसकर्मी शिकायतकर्ताओं से “सुविधा शुल्क” के नाम पर रिश्वत मांगते थे। किसी केस की गंभीरता और उससे मिलने वाले लाभ के अनुसार घूस की राशि तय की जाती थी।

  • जमीन या प्रॉपर्टी विवाद जैसे मामलों में घूस की रकम सबसे ज्यादा पाई गई।

  • वहीं महिला अपराध या धोखाधड़ी के मामलों में भी रकम प्रकरण की गंभीरता के हिसाब से बढ़ जाती थी।

एसीबी की जांच रिपोर्ट बताती है कि पुलिसकर्मी केवल केस दर्ज या बंद करने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अवैध धंधों, शराब के ठेकों और बारों के संचालन में भी मंथली वसूली कर रहे थे।

यह है ‘घूस का रेट कार्ड’ (ACB Findings)

काम रिश्वत की राशि
एफआईआर दर्ज कराने के लिए ₹5,000 से ₹20,000
एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगाने के लिए ₹20,000 से ₹1,00,000
किसी आरोपी को गिरफ्तार न करने के लिए ₹50,000 से ₹1,00,000
केस से नाम हटवाने के लिए ₹3,000 से ₹30,000
मुकदमे में नामजद न करने के लिए ₹50,000 तक
चालान पेश न करने के लिए ₹1,00,000 तक
जमीन विवाद सुलझाने के लिए ₹50,000 से ₹5,00,000
पासपोर्ट वेरिफिकेशन ₹500 से ₹2,000
शराब के ठेके चलाने की अनुमति मंथली ₹10,000 तक
तय समय के बाद बार चलाने मंथली ₹50,000 तक
अवैध कामों में सहयोग ₹10,000 से ₹1,00,000
अवैध पार्किंग चलाने ₹10,000 से ₹20,000
ट्रैफिक उल्लंघन में ढील ₹100 से ₹2,000 तक

कांस्टेबल से लेकर अफसर तक, सब शामिल

एसीबी की रिपोर्ट यह बताती है कि रिश्वतखोरी किसी एक स्तर तक सीमित नहीं है। थानों के कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, इंस्पेक्टर, डीएसपी, और यहां तक कि एडिशनल एसपी तक कई अधिकारी इसमें पकड़े जा चुके हैं।
ज्यादातर मामलों में एसीबी ने ट्रैप लगाकर कार्रवाई की — यानी जब पीड़ित ने शिकायत की, तो एसीबी टीम ने रिश्वत लेते हुए पुलिसकर्मी को रंगे हाथों पकड़ लिया।

इनमें से कई मामलों में यह भी पाया गया कि रिश्वत का पैसा थाने में नहीं, बल्कि घर या किसी अन्य स्थान पर लिया जा रहा था, ताकि पकड़े जाने का खतरा कम रहे।

‘मंथली सिस्टम’ में बंधे अवैध धंधे

जयपुर, जोधपुर, अजमेर और अलवर जैसे बड़े शहरों में मंथली वसूली सिस्टम सबसे अधिक पाया गया। अवैध शराब, पार्किंग, और सट्टे के कारोबार से जुड़े लोग हर महीने पुलिस को तय रकम देते थे, ताकि उनका धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहे।
एसीबी के अधिकारियों का कहना है कि यह एक संगठित रिश्वत तंत्र बन चुका है, जहां थाने से लेकर सर्किल ऑफिस तक सबकी हिस्सेदारी तय है।

जनता में बढ़ा अविश्वास

ऐसे मामलों ने आम जनता के बीच पुलिस पर से भरोसा कम कर दिया है। अब लोग किसी शिकायत को लेकर थाने जाने से पहले यह सोचने पर मजबूर हैं कि बिना पैसे के उनका काम होगा भी या नहीं।
कानून-व्यवस्था की रक्षा करने वाली संस्था अगर खुद कानून तोड़े, तो न्याय व्यवस्था की नींव कमजोर हो जाती है।

एसीबी का सख्त रुख

राजस्थान एसीबी ने हाल ही में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को और तेज करने का फैसला लिया है। विभाग ने हर जिले में एक “हेल्पलाइन” और व्हाट्सएप नंबर जारी किया है, ताकि कोई भी नागरिक रिश्वत मांगने की स्थिति में तुरंत शिकायत कर सके।
एसीबी अधिकारियों ने कहा है कि रिश्वत लेने या देने दोनों अपराध हैं और दोनों पर कार्रवाई होगी।

विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि अब वे “रिश्वत की दर तय करने वालों” पर सख्त कानूनी कार्रवाई करेंगे, ताकि ऐसे नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जा सके।

यह खुलासा दिखाता है कि सिस्टम के अंदर भ्रष्टाचार कितनी गहराई तक फैला हुआ है। लेकिन उम्मीद की किरण यह है कि एसीबी जैसी संस्थाएं ईमानदारी से काम कर रही हैं और जनता को न्याय दिलाने की कोशिश में जुटी हैं।
अगर ऐसे अभियानों को निरंतरता दी गई, तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थान की पुलिस एक बार फिर अपने मूल सिद्धांत — “जन सेवा” — की ओर लौटेगी।

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