AIN NEWS 1: मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले से पुलिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां की लौर और नईगढ़ी थाना पुलिस ने कानून की मूल भावना को दरकिनार करते हुए ऐसा काम किया है, जिसे सुनकर आम नागरिक से लेकर कानून के जानकार तक हैरान हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, इन दोनों थानों में दर्ज 1000 से अधिक मामलों में केवल 6 लोगों को ही सरकारी गवाह बनाया गया।
यह खुलासा तब हुआ जब CCTNS (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम) पोर्टल के आंकड़ों की गहन जांच की गई। आंकड़ों ने साफ कर दिया कि पुलिस ने निष्पक्ष गवाही की बजाय कुछ चुनिंदा व्यक्तियों के नामों को बार-बार दर्ज किया, जिससे पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
500 मामलों में थाने का रसोइया और ड्राइवर गवाह!
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन लोगों को सैकड़ों मामलों में सरकारी गवाह बनाया गया, उनमें से कुछ थाने में रसोइये और ड्राइवर के रूप में कार्यरत हैं। जानकारी के मुताबिक, एक ही रसोइए और एक ड्राइवर ने लगभग 500 मामलों में गवाही दी है। सवाल यह उठता है कि क्या ये लोग हर अपराध स्थल पर मौजूद थे? क्या इनका हर मामले से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था?
कानून के जानकारों का कहना है कि सरकारी गवाह वही व्यक्ति हो सकता है, जो घटना का प्रत्यक्षदर्शी हो या जांच में किसी तरह से शामिल रहा हो। ऐसे में थाने के कर्मचारियों को इस तरह से बार-बार गवाह बनाना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह पूरे केस को कमजोर भी करता है।
CCTNS पोर्टल ने खोली पोल
यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब CCTNS पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस पोर्टल पर देशभर में दर्ज अपराधों और जांच की डिजिटल जानकारी उपलब्ध होती है। मऊगंज जिले के आंकड़ों में एक ही नाम बार-बार सरकारी गवाह के रूप में दर्ज पाए गए।
सूत्रों के अनुसार, कुछ नाम ऐसे हैं जो 200 से 500 मामलों तक में गवाह बनाए गए हैं। वहीं, हजार से ज्यादा मामलों में केवल 6 गवाहों का इस्तेमाल किया जाना अपने आप में एक बड़ा सवाल है।
न्याय प्रक्रिया पर सीधा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की लापरवाही या जानबूझकर की गई गड़बड़ी का सीधा असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है। जब किसी केस में गवाह ही संदिग्ध हो जाए, तो आरोपी को सजा दिलाना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में तो ऐसे केस अदालत में टिक ही नहीं पाते और आरोपी कानूनी खामियों का फायदा उठाकर छूट जाते हैं।
वकीलों का कहना है कि एक ही व्यक्ति का दर्जनों या सैकड़ों मामलों में गवाह होना अदालत में केस को कमजोर करता है। बचाव पक्ष इसे पुलिस की मनगढ़ंत कहानी बताकर पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला सकता है।
क्या यह जानबूझकर किया गया फर्जीवाड़ा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सब महज लापरवाही है या फिर जानबूझकर किया गया फर्जीवाड़ा? जानकारों का कहना है कि कई बार जांच प्रक्रिया को आसान और तेज दिखाने के लिए पुलिस इस तरह के रास्ते अपनाती है। थाने में मौजूद कर्मचारी आसानी से उपलब्ध होते हैं, इसलिए उन्हें गवाह बना दिया जाता है।
हालांकि, ऐसा करना कानून और संविधान दोनों की भावना के खिलाफ है। इससे न केवल निर्दोष लोगों को नुकसान हो सकता है, बल्कि असली अपराधी भी बच सकते हैं।
स्थानीय लोगों में नाराजगी
मऊगंज जिले में इस खुलासे के बाद आम लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर पुलिस ही नियमों का पालन नहीं करेगी, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करेगा। लोगों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की है।
कुछ सामाजिक संगठनों ने इसे पुलिस सुधार की आवश्यकता का बड़ा उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियां न हों।
वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी
इस मामले पर अभी तक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कोई ठोस और स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, अंदरखाने चर्चा है कि मामले की जांच के आदेश दिए जा सकते हैं। अगर जांच होती है और आरोप सही पाए जाते हैं, तो कई पुलिसकर्मियों पर गाज गिर सकती है।
सिस्टम में सुधार की जरूरत
यह मामला सिर्फ मऊगंज जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की पुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को उजागर करता है। सरकारी गवाहों की नियुक्ति और इस्तेमाल को लेकर सख्त नियम और निगरानी की आवश्यकता है। डिजिटल सिस्टम होने के बावजूद अगर इस तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं, तो यह चिंता का विषय है।
मऊगंज पुलिस का यह कथित कारनामा एक गंभीर चेतावनी है। अगर समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आम जनता का पुलिस और न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ सकता है। जरूरत है पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी की, ताकि कानून का राज सही मायनों में कायम रह सके।
यह मामला आने वाले दिनों में क्या मोड़ लेता है, इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।
A shocking case of police irregularities has emerged from Mauganj district in Madhya Pradesh, where official records reveal that only six government witnesses were repeatedly used in more than 1000 criminal cases. According to CCTNS portal data, police cooks and drivers were made witnesses in hundreds of cases, raising serious concerns about police transparency, misuse of authority, and the credibility of investigations. The Mauganj police witness scam highlights deep flaws in the justice delivery system and has triggered demands for an independent inquiry into government witness manipulation and police corruption in India.


















